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राहुल गांधी की अंग्रेज़ी पर ज्ञान देने वाली पत्रकार तवलीन सिंह खुद किस भाषा में लिखती हैं?

Two speakers in a debate: a man with a white polo points angrily while a woman in a blue sari gestures with her hands into a microphone on a panel set up.

कोटा में छात्रों के बीच राहुल गांधी के भाषण के बाद शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य पर चर्चा होने के बजाय बहस उनकी भाषा पर केंद्रित हो गई है। वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमिस्ट तवलीन सिंह ने सवाल उठाया कि हिंदी भाषी क्षेत्र कोटा में राहुल गांधी ने अंग्रेज़ी में संबोधन क्यों किया। उनके अनुसार, छात्रों से संवाद के लिए हिंदी अधिक उपयुक्त भाषा हो सकती थी।

लेकिन तवलीन सिंह की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने पलटकर उनसे ही सवाल पूछना शुरू कर दिया। आलोचकों का कहना है कि तवलीन सिंह स्वयं दशकों से अंग्रेज़ी पत्रकारिता करती रही हैं। उनके अधिकांश लेख, कॉलम और सार्वजनिक टिप्पणियां अंग्रेज़ी में प्रकाशित होती रही हैं। ऐसे में किसी दूसरे व्यक्ति की भाषा को लेकर सवाल उठाने का नैतिक आधार क्या है?

सोशल मीडिया पर लोगों ने लिखा कि अगर अंग्रेज़ी में संवाद करना गलत है तो यह सवाल केवल राहुल गांधी से ही क्यों? अंग्रेज़ी मीडिया में लंबा करियर बनाने वाले पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और कॉलमिस्टों पर यह कसौटी लागू क्यों नहीं होती? कई यूज़र्स ने तर्क दिया कि लोकतांत्रिक विमर्श में महत्वपूर्ण यह होना चाहिए कि कोई व्यक्ति क्या कह रहा है, न कि केवल यह कि वह किस भाषा में कह रहा है।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, युवाओं पर बढ़ते मानसिक दबाव और शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को उठाया था। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था को “रिजेक्शन सिस्टम” बताते हुए छात्रों को पारंपरिक करियर विकल्पों की सीमाओं से बाहर सोचने की सलाह दी थी।

आलोचकों का कहना है कि राहुल गांधी के तर्कों और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर बहस करने के बजाय भाषा को मुद्दा बनाना मूल विषय से ध्यान भटकाने जैसा है। उनका सवाल है कि जब देश के बड़े हिस्से में अंग्रेज़ी शिक्षा, अंग्रेज़ी मीडिया और अंग्रेज़ी प्रशासनिक व्यवस्था को सामान्य रूप से स्वीकार किया जाता है, तब केवल राजनीतिक विरोधियों के मामले में भाषा को बहस का विषय क्यों बनाया जाता है?

कुल मिलाकर, तवलीन सिंह की टिप्पणी ने एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल अब सिर्फ राहुल गांधी की भाषा का नहीं रह गया है, बल्कि यह भी उठ रहा है कि क्या सार्वजनिक जीवन में भाषा को लेकर अपनाए जाने वाले मानदंड सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, या फिर यह बहस भी राजनीतिक और वैचारिक पसंद-नापसंद के आधार पर तय होती है।

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