नई दिल्ली। टीवी रेटिंग प्रणाली में प्रस्तावित बदलावों से जुड़े चर्चित लैंडिंग पेज रेटिंग विवाद की सुनवाई अब 19 जून को होगी। केरल हाईकोर्ट ने मामले को मूल निर्धारित तारीख पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। इससे पहले केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से मामले की जल्द सुनवाई की मांग की गई थी।
दरअसल, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तत्काल याचिका के बाद इस मामले की सुनवाई की तारीख पहले 19 जून से आगे बढ़ाकर 8 जून कर दी गई थी। हालांकि 8 जून को इस पर सुनवाई नहीं हो सकी और बाद में इसे 15 जून के लिए सूचीबद्ध किया गया। लेकिन 15 जून को भी अदालत में इस मामले पर सुनवाई नहीं हो पाई। अब यह मामला 19 जून को सुना जाएगा।
यह विवाद ऑल इंडिया डिजिटल केबल फेडरेशन (AIDCF) और DEN Networks द्वारा दायर उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026 के क्लॉज 5.4.1 के प्रावधान को चुनौती दी है। इस प्रावधान के तहत लैंडिंग पेज से मिलने वाली दर्शक संख्या को टीवी रेटिंग में शामिल नहीं करने का प्रस्ताव रखा गया है।
इससे पहले 22 मई को केरल हाईकोर्ट ने इस प्रावधान के अमल पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी थी। अदालत के इस अंतरिम आदेश के चलते BARC India द्वारा प्रस्तावित लैंडिंग पेज रेटिंग सुधार फिलहाल ठप पड़ा हुआ है।
क्या है लैंडिंग पेज विवाद?
टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026 के अनुसार, ब्रॉडकास्टर और डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म प्रचार-प्रसार के लिए लैंडिंग पेज का इस्तेमाल जारी रख सकेंगे, लेकिन ऐसे प्लेसमेंट के जरिए मिलने वाली दर्शक संख्या को रेटिंग का हिस्सा नहीं माना जाएगा।
लैंडिंग पेज वह पहला चैनल या स्क्रीन होती है, जो दर्शक के सेट-टॉप बॉक्स ऑन करते ही दिखाई देती है। खासकर न्यूज चैनलों के लिए यह लंबे समय से दृश्यता और टीआरपी हासिल करने का अहम जरिया रही है।
BARC ने नई व्यवस्था लागू करने के लिए परिचालन दिशानिर्देश भी तैयार कर लिए थे। प्रस्तावित नियमों के तहत यदि किसी सत्र की शुरुआत में वाटरमार्क लगा कोई चैनल लैंडिंग पेज के रूप में दिखाई देता और वही पहला देखा गया चैनल होता, तो उस व्यूअरशिप को रेटिंग गणना से बाहर रखा जाता। हालांकि, यदि दर्शक बाद में अपनी पसंद से उसी चैनल को दोबारा देखते, तो उस व्यूअरशिप को रेटिंग में शामिल किया जाता।
AIDCF का क्या है तर्क?
AIDCF का कहना है कि लैंडिंग पेज सेट-टॉप बॉक्स चालू करते ही दर्शकों के सामने आने वाला पहला चैनल या स्ट्रीम होता है। ऐसे में उसे गैर-दर्शक संख्या मानना वास्तविक उपभोक्ता व्यवहार के अनुरूप नहीं है।
फेडरेशन का यह भी तर्क है कि लैंडिंग पेज से मिलने वाली दर्शक संख्या को पूरी तरह बाहर कर देने से मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (MSOs) की एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक संपत्ति कमजोर हो जाएगी।
केंद्र सरकार का पक्ष
वहीं, केंद्र सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026 का बचाव किया है। सरकार का कहना है कि यह सुधार टीवी ऑडियंस मापन प्रणाली में पारदर्शिता, विश्वसनीयता, जवाबदेही और स्वतंत्रता बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया है।
सरकार के मुताबिक, लैंडिंग पेज और बूट-अप स्क्रीन दर्शकों की वास्तविक पसंद नहीं, बल्कि चैनलों की प्लेसमेंट के कारण मिलने वाली निष्क्रिय दर्शक संख्या पैदा करती हैं, जिससे रेटिंग विकृत होती है। इसलिए ऐसी व्यूअरशिप को वास्तविक टीवी उपभोग नहीं माना जाना चाहिए।
केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई नीति के तहत लैंडिंग पेज पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा रहा है। ब्रॉडकास्टर, डिस्ट्रीब्यूशन प्लेटफॉर्म और एमएसओ प्रचार और मार्केटिंग के लिए इनका इस्तेमाल पहले की तरह जारी रख सकेंगे।
सरकार ने केरल हाईकोर्ट में लंबित इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लंबित लैंडिंग पेज विवाद से अलग बताया है। केंद्र का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामला TRAI के नियामकीय ढांचे और चैनल प्लेसमेंट से जुड़ा है, जबकि टीवी रेटिंग पॉलिसी 2026 का मामला ऑडियंस मापन की कार्यप्रणाली से संबंधित है।
ऐसे में 19 जून को होने वाली सुनवाई पर टीवी न्यूज उद्योग, ब्रॉडकास्टर्स, एमएसओ और विज्ञापन जगत की नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि इस फैसले का असर भविष्य की टीआरपी व्यवस्था और न्यूज चैनलों की रेटिंग रणनीति पर पड़ सकता है।


