बृजभूषण मार्कंडेय-
15 जाने लेने के बाद अब चलेगा बाबा का बुलडोजर! एलडीए ने 2016 में इस इमारत को अवैध बताकर नोटिस जारी किया था किंतु 2 महीने बाद वापस ले लिया यानी कि होता रहा खेल!
इमारत का निर्माण आवासीय बताकर किया गया था किंतु व्यवसायिक कार्य होते रहे और नगर निगम लेता रहा आवासीय टैक्स! अर्थात भवन निर्माण के समय से ही नगर निगम अपना चेहरा बिगाड़ता रहा!
अग्निशमन ने कभी कोई जाँच नहीं किया ना ही अग्निशमन के उपकरण ही लगाए गए थे, जाहिर सी बात है कि अग्निशमन अधिकारी इस खेल में शुरू से शामिल रहे!
अब लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भवन ढहाने की नोटिस जारी किया है! क्या सीएम योगी का बुलडोजर इन जिम्मेदार अधिकारियों की अकूत संपत्ति से निर्मित आलीशान और अवैधानिक भवनों पर भी चलेगा? क्या इनके ऊपर हत्या का मुकदमा दर्ज होगा? दिवंगत आत्माओं को विनम्र श्रद्धांजलि!
लखनऊ के भीषण अग्निकांड के ये तथ्य कितने डरावने हैं! किस तरह अपने समाज में ‘निर्माण’ और ‘विकास’ हो रहा है और यह कैसी तबाही ला रहा है!
-उर्मिलेश, वरिष्ठ पत्रकार
गौरव गुलमोहर-
लखनऊ के अग्निकांड का पूरा मामला कुछ इस तरह है-
लखनऊ की जिस बिल्डिंग में आग लगी थी वह अलीगंज के पुरनिया चौराहे के पास पॉश इलाके में थी।

इस बिल्डिंग में नीचे पेट शॉप और उसके ऊपर गेमिंग सेंटर चल रहा था। जहां नौजवान एनिमेशन का काम सीखते हैं।
जिस समय बिल्डिंग में आग लगी उस समय गेमिंग सेंटर में तकरीबन दो दर्जन बच्चे मौजूद थे। जिनकी उम्र अठारह वर्ष से पच्चीस वर्ष तक थी।
बिल्डिंग में आग लगने की सटीक जानकरी अभी तक नहीं आई है लेकिन शार्ट सर्किट से आग लगने का अधिक चांस है। क्योंकि उस बिल्डिंग में दसियों स्प्लिट AC नज़र आ रही थी।
बिल्डिंग सीतापुर रोड के एक चौड़ी लिंक रोड के ठीक बगल थी। यानी बिल्डिंग देखने में लग सकता है कि एकदम खुली जगह में है।
लेकिन जिस बिल्डिंग में आग लगी उसमें एक लोचा है, वह बिल्डिंग आगे से तो खुली है लेकिन दोनों बगल और पीछे से पूरी तरह पैक है।
बिल्डिंग के दोनों बगल और पीछे से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। इस बिल्डिंग से बाहर सिर्फ सामने से निकल सकते थे।
यही कारण है कि बिल्डिंग में फंसे लोगों की बचाव की हर कोशिश नाकाम रही। कुछ ही बच्चे आगे की तरफ आकर बिल्डिंग से एक वायर के माध्यम से कूद सके। जो बिल्डिंग में पीछे थे वे आग की डर से सामने की ओर नहीं आ सके।
यही वजह थी, बचाव के लिए स्थानीय लोग, दमकल और बचावकर्मी अंदर नहीं जा सके।
इसीलिए मृतकों की बॉडी निकालने के लिए पड़ोसी की छत पर चढ़ कर बिल्डिंग की दीवार तोड़नी पड़ी।
भारत के हर शहर में लगभग 80 फीसदी घर इसी तरह बने हैं जिसमें कोई एग्जिट गेट नहीं होता है। जिस रास्ते से आप अंदर जाते हैं उसी से बाहर आने का रास्ता होता है।
वहीं AC का प्रचलन बढ़ने के बाद गुफा नुमा जगहों में भी प्रोफेशनल काम होने लगे हैं। एसी के भरोसे ही गुफाओं में कोचिंग, ट्रेनिंग सेंटर, जिम और होटल में किराए पर रूम चल रहे हैं।
कम से कम ऐसी जगहों पर भीड़-भाड़ वाले काम नहीं ही होने चाहिए। लेकिन कमीशन के दम पर कहीं भी कोचिंग, ट्रेनिंग सेंटर, जिम और होटल धड़ल्ले से चल रहे हैं।
यह हाल सिर्फ लखनऊ का नहीं है। यही हाल भारत के लगभग सभी शहरों में है। अभी तक पंद्रह बच्चों की मौत की ख़बर है और पांच बच्चे घायल हैं।
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
मौत के ‘लाक्षागृह’ और सिस्टम की सरपरस्ती भ्रष्टाचार की जड़ों में मट्ठा क्यों नहीं डालती सरकार?
‘हत्या’ के मुकदमों से विकास प्राधिकरणों के अफसरों को छूट क्यों?
अगर कोई व्यक्ति सड़क पर किसी की जान ले ले, तो उस पर हत्या (धारा 302) या गैर-इरादतन हत्या (धारा 304) का मुकदमा दर्ज होता है। लेकिन जब एक सरकारी अफसर चंद रुपयों के लालच में फायर सेफ्टी और बिल्डिंग बायलॉज की धज्जियां उड़वाकर 15 लोगों की सामूहिक कब्र तैयार करवाता है, तो उसे सिर्फ ‘विभागीय कार्रवाई’ का कागज़ी दंड क्यों दिया जाता है? जब तक अवैध निर्माण को संरक्षण देने वाले इंजीनियरों, जोनल अफसरों और टाउन प्लानर्स को सह-आरोपी बनाकर जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक इस भ्रष्ट व्यवस्था में खौफ पैदा नहीं होगा।
लखनऊ का अलीगंज अग्निकांड भी महज एक हादसा नहीं है; यह विकास प्राधिकरण (LDA) के भ्रष्टाचार की वेदी पर 15 होनहार युवाओं की दी गई एक ‘संस्थागत बलि और हत्या’ है। लेवाना, एसएसजे इंटरनेशनल और विराट होटल की राख अभी पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई थी कि भ्रष्टाचार की नींव पर खड़े एक और ‘लाक्षागृह’ ने निर्दोषों को निगल लिया।
हर ऐसे भयावह अग्निकांड के बाद एक रटा-रटाया सरकारी नाटक शुरू होता है—मुआवजे का ऐलान, एक जांच कमेटी का गठन, भवन मालिक की गिरफ्तारी और दिखावे के लिए निचले स्तर के एक-दो कर्मचारियों का निलंबन। लेकिन सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह है कि सरकार कभी भी उस ‘जड़’ पर सीधा प्रहार क्यों नहीं करती, जहां से इन मौतों की पटकथा लिखी जाती है? सरकार विकास प्राधिकरण के उन वरिष्ठ अफसरों और इंजीनियरों पर कानून का बुलडोजर क्यों नहीं चलाती, काली कमाई से ख़ुशियाँ ख़रीदने के बाद जिनकी कलम और चुप्पी से ये मौत की इमारतें तनकर खड़ी हो जाती हैं?
‘निलंबन’ का दिखावा और ब्यूरोक्रेसी का सुरक्षा कवच
हादसे के बाद सरकार का सबसे ‘सख्त’ एक्शन क्या होता है? निलंबन (Suspension)। लेकिन सरकारी तंत्र में निलंबन कोई सजा नहीं है, बल्कि यह जनता के आक्रोश को शांत करने का एक ‘कूलिंग पीरियड’ (Cooling Period) है। जो इंजीनियर इन अवैध इमारतों को पास करते हैं, वे चंद महीनों बाद बहाल होकर किसी दूसरे जोन में मलाई काट रहे होते हैं और फिर किसी नए लाक्षागृह की नींव रखवा रहे होते हैं। जब तक ब्यूरोक्रेसी अपने भ्रष्ट साथियों को यह सुरक्षा कवच पहनाना बंद नहीं करेगी, तब तक ऐसे हादसे नहीं रुकेंगे। इस कड़वे सच और सरकार की इस ‘चुप्पी’ के पीछे कई गहरे कारण और कड़वे विश्लेषण छिपे हैं:
ऊपर तक बहती है काले धन की पाइपलाइन
एक दिन या एक रात में कोई तीन मंजिला कमर्शियल बिल्डिंग नहीं खड़ी हो जाती। जब सेटबैक की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं, तब इलाके का जूनियर इंजीनियर (JE), सहायक अभियंता (AE) और जोनल अफसर क्या मोतियाबिंद का शिकार थे? हकीकत यह है कि यह ‘अंधापन’ खरीदा जाता है। अवैध निर्माणों से वसूली गई करोड़ों की यह रकम केवल नीचे के बाबुओं की जेब तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इस काले धन की पाइपलाइन का बहाव ऊपर बैठे सफेदपोशों, उच्चाधिकारियों और सत्ता के गलियारों तक होता है। जड़ पर वार करने का मतलब है इस मलाईदार और स्थापित तंत्र को ध्वस्त करना, जिस पर हाथ डालने की हिम्मत राजनैतिक इच्छाशक्ति नहीं जुटा पाती।
‘नोटिस’ का खेल: कार्रवाई का नहीं, ‘कमीशन’ का हथियार
अलीगंज के जिस गेमिंग सेंटर में यह हादसा हुआ, उसे आवासीय भूखंड पर बहुमंजिला व्यावसायिक कांप्लेक्स बनाने पर 2016 में एलडीए ने नोटिस दिया था। लेकिन यह नोटिस अवैध निर्माण रोकने के लिए नहीं दिया जाता है। विकास प्राधिकरणों में नोटिस भेजना दरअसल ‘सुविधा शुल्क’ (रिश्वत) की दरें तय करने का एक निमंत्रण पत्र होता है। एक बार टेबल के नीचे से लिफाफा पहुंच गया, तो फाइलें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं और 100 प्रतिशत कवरेज व 90 प्रतिशत अवैध बेसमेंट का निर्माण बेखौफ जारी रहता है। सरकार इस ‘नोटिस-वसूली सिंडिकेट’ को खत्म नहीं करना चाहती क्योंकि यह प्राधिकरण की अघोषित आय का सबसे बड़ा स्रोत बन चुका है।
ये इमारतें अचानक आग नहीं पकड़तीं; इन्हें विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार का बारूद पहले ही संवेदनशील बना चुका होता है। अलीगंज का वह तीन मंजिला भवन ईंट-गारे से नहीं, बल्कि एलडीए के भ्रष्ट तंत्र की बेशर्मी से बना था।
अगर सरकार वाकई में जनता के जीवन की परवाह करती है और ‘जीरो टॉलरेंस’ के नारों को धरातल पर उतारना चाहती है, तो उसे केवल भवन मालिकों को मोहरा बनाने के बजाय विकास प्राधिकरण के उन सफेदपोश हत्यारों की गिरेबान पकड़नी होगी। जिस दिन एक भी जोनल अधिकारी या चीफ इंजीनियर ऐसे हादसों के लिए बर्खास्त होकर उम्रकैद काटने लगेगा, उस दिन से शहरों में अवैध ‘लाक्षागृहों’ का निर्माण खुद-ब-खुद बंद हो जाएगा। वरना, आज अलीगंज राख हुआ है, कल कोई और इलाका होगा, और हम सिर्फ मौतों का आंकड़ा गिनने को मजबूर होंगे।



