विकास कुमार-
Gen Z प्रोटेस्ट और इंडियन मीडिया…
इस लेख का शीर्षक मैंने पहले ‘Gen Z प्रोटेस्ट और मीडिया’ रखा था। लेकिन बाद में मीडिया के आगे ‘इंडियन मीडिया’ लिखना पड़ा। इसकी वजह साफ़ है। दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुए हालिया Gen Z प्रोटेस्ट के दौरान भारतीय टीवी और कुछ अख़बारी मीडिया ने वह किया, जो दुनिया के किसी दूसरे मुल्क में देखने को नहीं मिला।
भारतीय मीडिया ने पहले दिन से छात्रों की माँग, उनके ग़ुस्से और उनकी हताशा को जगह देने के बजाय सरकारी बयानों, सरकार के इशारों और सत्ताधारी पार्टी के कुतर्कों को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर प्राथमिकता दी।
याद कीजिए, CJI के ‘कोकरोच’ वाले बयान के बाद जब अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर Cockroach Janta Party (CJP) बनाई, तो टीवी मीडिया ने उसके बढ़ते सोशल मीडिया फ़ॉलोअर्स को प्रमुखता से दिखाया। हर दिन बताया जाता था कि आज CJP के कितने फ़ॉलोअर्स बढ़े, कल कितने बढ़े थे, आदि-आदि।
लेकिन जब CJP के बैनर तले जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग को लेकर प्रदर्शन शुरू हुआ, तो वहीं से टीवी और कुछ अख़बारी मीडिया का रुख़ बदलना शुरू हो गया। पहले उन्होंने इस आंदोलन को ख़ारिज किया। फिर, जिस तरह सरकार इसे अनसुना कर रही थी, उसी तरह टीवी मीडिया ने भी जंतर-मंतर की इस हलचल को बड़े पैमाने पर अनसुना किया। लेकिन उन्हें यह अंदाज़ा नहीं था कि इस प्रोटेस्ट ने अपने लिए अपना अलग मीडिया तैयार कर लिया है।
फिर 20 जुलाई को पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। प्रदर्शनकारियों की तरफ़ से भी हिंसा हुई, लेकिन दिल्ली पुलिस के कुछ जवानों ने उस दिन हिंसा को मानो नए सिरे से परिभाषित कर दिया। इतना सब कुछ होने के बाद भी टीवी मीडिया दिल्ली पुलिस की प्रेस रिलीज़ और उसकी PR टीम से मिल रही सूचनाओं के आधार पर ही ख़बरें चलाता रहा।
प्राइम टाइम एंकरों ने आंदोलनकारी छात्रों को विदेशी फ़ंडिंग के ज़रिए देश को अस्थिर करने की साज़िश का हिस्सा तक बताया। किसी एक टीवी चैनल ने भी दिल्ली पुलिस के अधिकारियों से वे सवाल नहीं पूछे, जो लाखों छात्रों के मन में थे। कोई और पीढ़ी होती, तो शायद यह सब देखकर निराश हो जाती।
लेकिन इस पीढ़ी के पास अपना एक हथियार था—मोबाइल।
इन लोगों ने 20 जुलाई की घटना को लेकर अपने अंदाज़ में पुलिसवालों से सवाल पूछने शुरू कर दिए। वे नाचते हुए, हँसते हुए और व्यंग्य करते हुए पुलिस अधिकारियों से जवाब माँगने लगे। और आख़िरकार तीस दिन बाद उनकी सबसे बड़ी माँग पूरी हुई।
1974 में जब जेपी आंदोलन हुआ था, तब दूरदर्शन पर सरकार का नियंत्रण था। लेकिन अख़बारों ने उस आंदोलन को व्यापक कवरेज दी थी। Indian Express के मालिक रामनाथ गोयनका के घर पर जेपी और संघ के बीच बातचीत भी हुई थी।
2012-13 में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हज़ारे का आंदोलन हुआ, तो निजी टीवी चैनलों और अख़बारों ने उसे भरपूर जगह दी। टीवी के बड़े-बड़े एंकर आंदोलन के पक्ष में रिपोर्टिंग करते थे और सरकार से सवाल पूछते थे। जंतर-मंतर पर लगभग सभी टीवी चैनलों के कैमरे पहले दिन से लेकर आख़िरी दिन तक मौजूद रहे।
लेकिन 2026 में इसी जंतर-मंतर से शुरू हुए Gen Z प्रोटेस्ट को कथित मेनस्ट्रीम मीडिया ने पहले नज़रअंदाज़ किया और अंत में उसे बदनाम करने की भी कोशिश की। टीवी और अख़बारों के समर्थन के बिना भी इस प्रोटेस्ट ने सरकार को झुकाया। इसने प्रधानमंत्री को रात के बारह बजे इंस्टाग्राम पर मोबाइल से रिकॉर्ड किया हुआ, या मोबाइल कैमरे जैसी फ़्रेमिंग वाला वीडियो जारी करने के लिए मजबूर किया।
इस प्रोटेस्ट ने केवल सरकार को ही झुकने पर मजबूर नहीं किया। इसने खुद को मेनस्ट्रीम मान चुके टीवी और अख़बारों से भी कहा—”आपके बिना भी हम अपनी आवाज़ उठा सकते हैं।” इसने देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज को भी यह याद दिलाया कि सार्वजनिक जीवन में कही गई हर बात का जवाब भी देना पड़ सकता है।


