Connect with us

Hi, what are you looking for?

सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार विनय यादव और दिलबर सिंह बिष्ट का निधन!

Portrait of a man in a light blue shirt standing in front of a Dainik Jagran banner with a sun logo in the background.

सोनू-

अत्यंत दुखद

दैनिक जागरण गाजीपुर टीम के अभिन्न अंग फोटोग्राफर विनय यादव जी का आज आकस्मिक निधन हृदय विदारक है। कल गाजीपुर ऑफिस में घंटों साथ काम किया गया। हंसी ठिठोली हुई। घर जाते समय इन्होंने मुझसे कहा कि आज सोनू तुम्हीं साहब हो, मुझे कल के लिए छुट्टी दो। क्या पता था कि आज के बाद कभी विनय जी से मुलाकात नहीं होगी। ॐ शांति। ईश्वर श्री चरणों में जगह दें।


परम मित्र विनय प्रकाश सिंह यादव दैनिक जागरण के छायाकार का हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। हम सभी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।
-कमलेश यादव

Man in a blue shirt and brown vest stepping off a red train car, holding the door railing.

-सूर्यकांत त्रिपाठी

कभी सोचा भी नहीं था कि विनय जी इस तरह अचानक हम सबको छोड़कर चले जाएंगे। उनका मुस्कुराता चेहरा उनकी सहजता उनका अपनापन और उनका मुझे वीरकांत कहकर पुकारना हमेशा याद रहेगा।

विनय जी जब कार्यालय आते थे तो जैसे पूरा कार्यालय चहक उठता था। उनकी हंसी उनकी बातें और उनका अपनापन पूरे माहौल में एक अलग ही ऊर्जा भर देता था। जिस दिन वह कार्यालय नहीं आते थे सच कहूं तो किसी का मन ही नहीं लगता था।

सबके लिए फोन करने वाले ने अपने लिए एक बार भी फोन नहीं किया।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।


बहुत ही हृदयविदारक.. नहीं रहे दैनिक जागरण गाजीपुर के लोकप्रिय छायाकार विनय प्रकाश यादव..
-जितेंद्र यादव


खबरों की तलाश में जिंदगी खपा देने वाले पत्रकार दिलबर सिंह बिष्ट का निधन, पीछे छूटा ‘मान्यता’ का अधूरा सपना

Man in a magenta kurta with blue sleeves gathering white flowers in a garden.

रुद्रप्रयाग: पहाड़ की दुर्गम पगडंडियों से लेकर जिला मुख्यालय तक खबरों की तलाश में जिंदगी खपा देने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलबर सिंह बिष्ट अब नहीं रहे। सोमवार रात रुद्रप्रयाग जिले की बच्चणस्यू पट्टी के सिप्री गांव की पहाड़ियों में उनका निधन हो गया। 90 के दशक से ग्रामीण पत्रकारिता कर रहे दिलबर सिंह बिष्ट ने सीमित संसाधनों के बावजूद दशकों तक पहाड़ की आवाज को समाचार पत्रों के जरिए सामने पहुंचाया।

स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब गांव के दूसरे युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे थे, तब दिलबर ने गांव छोड़ने के बजाय पत्रकारिता को अपना रास्ता चुना। मेरठ से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों से उन्होंने ग्रामीण पत्रकारिता की शुरुआत की। इसके बाद रुद्रप्रयाग की समस्याओं और घटनाओं को कई छोटे-बड़े समाचार पत्रों तक पहुंचाते रहे।

10-15 किलोमीटर पैदल चलकर जुटाते थे खबरें

दिलबर बिष्ट के लिए पत्रकारिता महज पेशा नहीं, बल्कि जुनून थी। संसाधनों के अभाव में वह कई बार रोजाना 10-15 किलोमीटर तक पैदल चलकर खांखरा पहुंचते और वहां से रुद्रप्रयाग जिला मुख्यालय जाते थे। दिनभर खबरों की जानकारी जुटाने के बाद दोपहर बाद तक उन्हें संबंधित समाचार पत्रों तक भेजते और फिर रात में पैदल ही गांव लौटते थे।

डिजिटल दौर में भी उनके गांव में मोबाइल नेटवर्क की सुविधा नहीं थी। ऐसे में वह सुबह-सुबह पहाड़ की ऊंची चोटियों पर पहुंच जाते थे। कड़ाके की ठंड और जंगली जानवरों के खतरे के बीच घंटों चोटी पर बैठकर मोबाइल नेटवर्क तलाशते, प्रदेश और देश की खबरों से खुद को अपडेट करते और अपने साथी पत्रकारों तक भी सूचनाएं पहुंचाते थे।

पत्रकार की पहचान का रहा मलाल

दिलबर बिष्ट की सबसे बड़ी कसक उनकी सरकारी पत्रकार मान्यता को लेकर थी। जिला सूचना कार्यालय उन्हें ‘कवर पत्रकार’ के तौर पर पहचानता था, लेकिन सूचना विभाग की मान्यता हासिल करने के लिए जरूरी वेतन पर्ची या बैंक चेक उनके पास नहीं था।

जिन समाचार पत्रों के लिए उन्होंने वर्षों तक काम किया, उनसे नियमित भुगतान नहीं मिल पाने के कारण वह मान्यता की औपचारिक शर्त पूरी नहीं कर सके। इसके बावजूद पत्रकार के तौर पर पहचान हासिल करने की उनकी उम्मीद कभी खत्म नहीं हुई।

वह अक्सर कहते थे, “जब तक इस सांस में सांस है, अपने आप को सूचना विभाग की नजरों में पत्रकार साबित करके रहूंगा।”

लेकिन सोमवार रात उनकी जिंदगी का यह संघर्ष हमेशा के लिए थम गया। अपने पीछे वह मान्यता का अधूरा सपना और एक ऐसा परिवार छोड़ गए, जिसके लिए उनकी मौजूदगी ही सबसे बड़ा सहारा थी।

तीन बच्चों के सिर से उठा पिता का साया

दिलबर सिंह बिष्ट के निधन के बाद उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनकी दो बेटियां और एक बेटा अभी पढ़ाई कर रहे हैं। अब उनके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया है।

दुर्गम पहाड़ों में खबरों की तलाश में अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा खपा देने वाले दिलबर बिष्ट भले ही सरकारी कागजों में ‘मान्यताप्राप्त पत्रकार’ का दर्जा हासिल नहीं कर पाए, लेकिन रुद्रप्रयाग की ग्रामीण पत्रकारिता में उनकी मेहनत और समर्पण की कहानी लंबे समय तक याद की जाएगी।

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन