सरकारी खर्च से लाखों लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना और फिर शामिल होने के लिए प्रयास करना कितने मानव घंटे का काम है और क्या जीडीपी इससे भी बढ़ती है? आखिर कोई देख, सुन, समझ क्यों नहीं रहा है। रुक क्यों नहीं रहा है। सरकार ऐसी कैसे हो सकती है? इसके लिए जरूरी है कि खबर बने लेकिन यह खबर भी आज पहले पन्ने पर नहीं है।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 में से आठ अखबारों की लीड सत्य निकेतन में इमारत गिरने से संबंधित खबर है। कलकत्ता से प्रकाशित द टेलीग्राफ और लंदन से भी प्रकाशित होने वाले दि एशियन एज को छोड़ कर बाकी सब में यह खबर लीड है। इन दो अखबारों में एक, द टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक है, बिल्डिंग गिरने से मरने वाले सात हुए, बचाव अभियान पूरा हुआ। दि एशियन एज का शीर्षक भी लगभग यही है लेकिन शीर्षक में यह भी बताया गया है कि पीजी मालिक को गिरफ्तार कर लिया गया है। उपशीर्षक है, एमसीडी के 5 अधिकारी निलंबित, हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिए तथा मुख्यमंत्री ने सभी अवैध पांच मंजिली बिल्डिंग को सील करने के आदेश दिए। जाहिर है, इस घटना के बाद की खबर यह नहीं है कि सरकार कार्रवाई कर रही है या सरकार ने की है। यह तो जरूरी है और होना ही चाहिए।
देश भर में जब स्कूलों की खराब हालत की चर्चा है, दिल्ली विश्वविद्यालय में हॉस्टल और कोचिंग की सुरक्षित जगह नहीं होने से हादसों की खबर है तब सड़कें बन रही हैं, पुराने सरकारी भवन तोड़कर नए बनाए जा रहे हैं। शिकायत करने वालों को प्रधानमंत्री नाराज फूफा और दिमागी नक्सल कह चुके हैं तब देशबन्धु और दूसरे अखबारों में खबर है, रक्षा खरीद परिषद की बैठक हुई। इसमें 1.10 लाख करोड़ के रक्षा सौदों को मंजूरी दी गई। इससे उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर, ट्रॉल टैंक और टोही विमान खरीदें जाएंगे।
जाहिर है यह सरकार की प्राथमिकता का मामला है और सरकारी खर्च की बात हो तो एसआईआर के नाम पर जो हो रहा है उसकी भी चर्चा करनी पड़ेगी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने आरोप लगाया है कि तेलंगाना में एक करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश की गई है और एसआईआर के नाम पर भाजपा विरोधी वोटों को हटाने की कोशिश हो रही है। जाहिर है यह एक ऐसे सिस्टम का मामला है जो दल विशेष के सत्ता में बने रहने के उपाय सरकारी खर्चों से कर रहा है। और दल विशेष की अथाह कमाई पर कोई रोक या निगरानी नहीं है।
आज खबर यह होती कि ऐसी ही बिल्डिंग में और कितने पीजी चल रहे हैं या अब कोई नहीं बचा या सब को सील करने की कार्रवाई शुरू कर दी गई। अखबारों और खबरों की भाषा में इसे फॉलो अप कहते हैं। फॉलो अप यह नहीं होता है कि फलां कार्रवाई हुई। फॉलो अप यह होता है कि कार्रवाई नहीं हुई या घोषणा के बावजूद कुछ नहीं हुआ या सिर्फ घोषणा हुई या घोषणा भी नहीं हुई या ये घोषणाएं नहीं हुईं। मेरे दस के 10 अखबारों में किसी ने फॉलो अप नहीं किया है, अब नहीं के बराबर होता है और फॉलो अप यह भी हो सकता था कि इस मामले में घिरी सरकार ने अनजानी पार्टियों को 4000 करोड़ रुपए से ज्यादा का चंदा मिलने की जांच शुरू करवाई। सरकार इस मामले से ध्यान हटाने के लिए ऐसी कार्रवाई कर सकती थी। लेकिन भाजपा सरकार में ऐसा भी नहीं होता है।
उल्टे कल तृणमूल कांग्रेस के एक मुस्लिम सांसद के सात-आठ ठिकानों पर ईडी की रेड पड़ी है। मकसद तो इसका भी ध्यान बंटवाना ही है लेकिन अपेक्षाकृत छोटे मामले में तृणमूल कांग्रेस को परेशान करने के लिए है। बहुचर्चित ऑपरेशन लोटस लगभग नाकाम मान लिया गया है। इसलिए दिल्ली में इसके प्रचार की जरूरत नहीं है। तृणमूल कांग्रेस को परेशान करना जारी रहने की खबर से गलत संदेश जाएगा सो अलग। वरना भाजपा अभी भी वही सब कर रही है, बताने के लिए पहले पन्ने पर हो सकती थी और नाराज फूफा या दिमागी नक्सल कहने जैसी खबरों से गंभीर तो है ही।
खबरों के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 7 सितंबर 2026 को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सांसद मोहम्मद नदीमुल हक से जुड़े परिसरों पर छापेमारी की है। यह कार्रवाई कोलकाता, दिल्ली और रांची समेत कुल 7 से 8 ठिकानों पर एक साथ की गई है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, नदीमुल हक उर्दू दैनिक समाचार पत्र ‘अखबार-ए-मशरिक’ के निदेशक हैं। ईडी की यह कार्रवाई इसी अखबार से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) के आरोपों के तहत की गई है। ईडी की जांच में कुछ नहीं मिलने या चार्ज शीट भी न दायर होने के पुराने उदाहरण हैं।
आम आदमी पार्टी के नेता सत्येन्द्र जैन को बार-बार परेशान करने और जेल भेजने की कार्रवाई होती रही है। द प्रिंट के अनुसार, टीएमसी नेता के खिलाफ इस कार्रवाई के विरोध में सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा है और आरोप लगाया है कि मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए विपक्ष और उनके धार्मिक पहचान को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि पत्रकार और टीएमसी सांसद बहुत पैसे वाले हैं और जांच में कुछ न कुछ मिल जाने की उम्मीद होगी। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के राज्यसभा सांसद द्वारा निर्वाचन आयोग को दिए गए चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनकी कुल संपत्ति तीन करोड़ 40 लाख घोषित की गई है। जो पहले के डेढ़ करोड़ से बढ़कर अब इतनी है।
जहां तक फॉलो अप वाली खबर की बात है, द हिन्दू में आज पहले पन्ने पर छपी खबर को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि यह हाईकोर्ट का निर्देश भी है लेकिन असम सरकार की करनी का फल भी है। खबर के अनुसार, हाई कोर्ट ने असम सरकार को जबरन बांग्लादेश भेजी गई महिला के परिवार को दो लाख रुपये देने का निर्देश दिया। आज ऐसी ही एक और खबर दि इंडियन एक्सप्रेस में है। यह खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है और इस खबर का अपना महत्त्व है। आप जानते हैं कि अप्रैल में हुए नोएडा के मजदूरों के प्रदर्शन के सिलसिले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की डीएम के वेतन से पांच लाख रुपए काट कर छात्रा आकृति चौधरी को देने के आदेश दिए हैं। उसपर एनएसए लगाया गया था और अदालत ने माना कि उसके खिलाफ कहानी गढ़ी हुई है।
आप यह भी जानते हैं कि संबंधित डीएम मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं। आज खबर है कि हाईकोर्ट ने डीएम के सेवा रिकार्ड में ‘नाखुशी’ दर्ज करने का भी आदेश दिया है और कहा है कि आरोपी को 5 लाख रुपए की क्षतिपूर्ति डीएम और अन्य अधिकारियों के वेतन से काटकर दिया जाए। आज पहले पन्ने की एक और खबर इंडियन एक्सप्रेस तथा दूसरे अखबारों में है जो विज्ञापन के कारण कम जगह वाले अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। खाली बची जगह में सिर्फ सरकार के प्रचार की खबर (रें) हैं। खबरों के अनुसार, मणिपुर के एक संगीतकार चोंगथम विक्रम सिंह (55) को लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला क्योंकि उन्होंने अपने घर के बाहर शोर का विरोध किया था।
अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी, हादसे के लिए डीयू-एमसीडी भी जिम्मेदार। फ्लैग शीर्षक है, एमसीडी उपायुक्त व 4 इंजीनियर सस्पेंड। पीजी मालिक, पत्नी और बेटा गिरफ्तार। एक खबर यह भी है, सभी पीजी का होगा ऑडिट। मुझे याद नहीं है कि दक्षिण दिल्ली में कुछ महीने पहले एक बिल्डिंग गिरने और एक होटल में आग लगने के बाद जो घोषणाएं हुई थीं उनसे संबंधित कोई फॉलो अप छपा या दिखा हो। फिर भी एक सरकारी सुझाव है, सरकार बोली – मौत को सनसनीखेज न बनाएं और इसके नीचे तीन कॉलम का पर छोटी खबर का छोटे फौन्ट में शीर्षक है, भिवाड़ी से दबोचा…. हरिराम दंपति को 14 दिन की न्यायिक हिरासत।
इसी खबर में बताया गया है कि दबोचे गए हरिराम गुप्ता 81 साल के हैं। खबर बताती है कि पीजी का बिजली कनेक्शन हरिराम के नाम पर था जबकि बेटा प्रबंधन देख रहा था। संपत्ति की रजिस्ट्री उर्मिला यानी हरिराम की पत्नी के नाम पर थी। इनका अपराध यही है कि ये एक पुरानी बिल्डिंग के मालिक है और उसमें रहने की मजबूरी नहीं थी। दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट है – दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्याप्त हॉस्टल नहीं, पीजी माफिया कर रहा कमाई। मुख्य शीर्षक है – “हर जगह डिब्बे जैसे कमरों में रहने को मजबूर छात्र, ऐसा हादसा फिर हो सकता है : कोर्ट”।
अमर उजाला के खास अंशों के अलावा यहां हाईलाइट किया गया हिस्सा है 1) एलजी बोले – पीजी हब का होगा स्ट्रक्चरल ऑडिट और 2) सीएम ने कहा पांच मंजिल वाले भवन होंगे सील। देशबन्धु की लीड का फ्लैग शीर्षक है – सत्य निकेतन हादसे पर हाईकोर्ट सख्त। मुख्य शीर्षक है – मकान मालिक ही नहीं, अफसर भी जिम्मेदार। उपशीर्षक है, एक सप्ताह में सेफ्टी ऑडिट के आदेश, डीयू-एमसीडी को ठहराया जिम्मेदार। नवोदय टाइम्स में विज्ञापन बहुत ज्यादा है। केवल हादसे से संबंधित खबरें ही हैं। जो नया है उसमें मुख्य शीर्षक भी है – सत्य निकेतन हादसा : 5 अफसर निलंबित, और सख्ती के आसार । उपशीर्षक है – लगातार दूसरे दिन मुख्य मंत्री रेखा गुप्ता पहुंचीं घटनास्थल। इंट्रो है – सार्वजनिक उपयोग वाले भवनों के लिए नई सुरक्षा नीति जल्द।
अंग्रेजी अखबारों में दो की चर्चा पहले कर चुका हूं। बाकी के शीर्षक में भी कुछ खास नहीं है और लगभग वही सारी बातें हैं जो हिन्दी अखबारों में प्रमुखता से छपी हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया अपवाद है। शीर्षक रूटीन से कुछ अलग है। यहां मुख्य शीर्षक है, दो और शव मिले, छात्रों का हॉस्टल ढहने से मरने वाले 7 हुए। अखबार में पहले पन्ने पर एक और खबर है जो दूसरे अखबारों में भी हो सकती थी और उसमें भी जिसमें पहले पन्ने पर एक ही खबर है। इस खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल के नए या भाजपाई मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने पूजा आयोजकों से कहा है, सनातनी परंपराओं को ठेस न पहुंचाएं। मुझे नहीं पता कि पश्चिम बंगाल में (दुर्गा) पूजा जैसे होती आई है और जो लोग करते रहे हैं वही, वैसे पूजा करें तो सनातनी परंपराओं को ठेस कैसे लगेगी या यह आशंका क्यों है।
जाहिर है, मामला कुछ और है तथा बंगाल की पूजा को भी बिहार और उत्तर प्रदेश की पूजा जैसा बनाने की कोशिश चल रही है और यह अनेकता में एकता या बंगाल में दुर्गा पूजा की विशेषता को खत्म करने की शुरुआत हो सकती है। खबरों से समझना मुश्किल है लेकिन खबर ही न हो तो मामला समझ कैसे आएगा? इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं है इसलिए खबरें ज्यादा हैं। इनमें एक खबर ब्रिक्स सम्मेलन पर और दूसरी उत्तर प्रदेश चुनाव पर भी है। ये दोनों खबरें या ऐसी खबरों की पठनीयता हादसे के बाद सरकार क्या करेगी और कोर्ट ने क्या कहा उससे ज्यादा होगी और कायदे से ऐसी खबरों को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
हिन्दुस्तान टाइम्स में छह कॉलम की लीड का शीर्षक है, पीजी मालिक गिरफ्तार अफसरों के खिलाफ कार्रवाई। इंट्रो है, रिटायर आईएएफ सार्जेन्ट और उनके भाई ने बिल्डिंग की बुनियाद के लिए जोखिम होने से वाकिफ होने के बावजूद चार अवैध मंजिलें बनाईं। पहले दिन दैनिक भास्कर की लीड थी, बेसमेंट खोदने से गिरी बिल्डिंग। अब उसकी चर्चा नहीं है। यह भी नहीं कि बिल्डिंग सील की गई थी तो फिर कैसे खुल गई। इन दो महत्वपूर्ण तथ्यों का फॉलो अप नहीं है और अगर अवैध मंजिलें बन गईं तो जाहिर है जिनकी जिम्मेदारी थी, जिन्हें अनुमति देनी थी वे भी जिम्मेदार हैं। और यह सब एक दिन में नहीं हो गया होगा खबर उसपर होनी चाहिए थी।
ऐसी खबर पहले पन्ने पर होती तो मतलब था। पहले ऐसी खबरें अपने आप आ जाती थीं रिपोर्टर परेशान रहते थे। अरुण शौरी ने लिखा था, तमाम खोजी खबरों के दस्तावेज लोग रिसेप्शन पर छोड़ जाते हैं और फोन करके बताते हैं कि फलां खबर की फाइल छोड़ आया हूं। अब खबरें नहीं आतीं हैं तो क्यों – समझना मुश्किल नहीं है। ना खाउंगा ना खाने दूंगा – भी एक कारण हो सकता है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


