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जो माफ़ीनामा धर्मेंद्र प्रधान को लिखना चाहिए था वो उनकी बेटी लिखने से नहीं हिचकिचाई!

मेधाविनी मोहन-

जब धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा, तो भुवनेश्वर से भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की बिटिया अर्चिता ने इस ख़ुशी में इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी लगाई। फिर एक और स्टोरी लगाकर यह आशंका भी ज़ाहिर की कि पार्टी की तरफ़ से उनकी माँ से कहा जाएगा कि वे अर्चिता पर यह स्टोरी हटाने के लिए दबाव डालें। हुआ भी यही। पार्टी के कई नेताओं ने इसे अनुशासन के ख़िलाफ़ बताया और सांसद माँ ने भी बहुत कोशिश की, लेकिन अर्चिता अड़ी रहीं और उन्होंने वो स्टोरी नहीं हटाई।

गुवाहाटी में असम कैबिनेट मंत्री केशव महंता की बिटिया दिबिसा ने भी प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ खूब नारे लगाए। उनका वीडियो वायरल हुआ। इसके लिए, उनके पिता को बहुत ट्रोल किया गया। हालांकि, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यह कहकर उनका बचाव किया कि बच्चों की ऐसी हरकतों के लिए माँ-बाप को ज़िम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए…जब मैं दिबिसा से मिलूँगा, तो उसे समझाने की कोशिश करूँगा।

Man in a black outfit stands beside a young woman in a plaid scarf outdoors; bottom news banner reads about Dharmendra Pradhan's daughter, Instagram, and online backlash over US LLM studies.

उधर धर्मेंद्र प्रधान की बिटिया नैमिषा जंतर-मंतर पर हो रहे आंदोलन के दौरान अवसाद में चली गई थीं और अपना इंस्टा अकाउंट डीएक्टिवेट कर दिया था, क्योंकि देश भर से स्टूडेंट्स उन्हें मेसेज कर-करके पूछ रहे थे कि आपके पिता इस्तीफ़ा क्यों नहीं दे देते? ज़ाहिर है, और भी ऐसी बातें उन्हें पढ़ने को मिल रही होंगी जो कोई बेटी अपने बाप के बारे में कभी नहीं पढ़ना चाहेगी। इस्तीफ़े के बाद उन्होंने अपना अकाउंट फिर से एक्टिवेट किया और एक स्टोरी लगाकर कहा- “आज मेरे पिता ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली है।

हाल की घटनाओं से प्रभावित छात्रों और उनके परिवारों की ओर से मुझे कई संदेश मिले हैं। छात्रों के सामने आई कठिनाइयों, उनकी चिंताओं और उनके भविष्य का हमेशा सम्मान किया जाना चाहिए। उनका यह निर्णय जवाबदेही और सार्वजनिक सेवा में विश्वास के महत्त्व को दिखाता है। इन घटनाओं से प्रभावित सभी छात्रों और उनके परिवारों से मैं दिल से माफ़ी मांगती हूँ। उनके द्वारा झेले गए दर्द, निराशा और हताशा के लिए। छात्रों के अच्छे भविष्य के लिए प्रार्थना करती हूँ।”

नैमिषा ने वो कह दिया जो अभी की परिस्थितियों में कहा जाना बहुत ज़रूरी था, लेकिन न ही अपने त्याग-पत्र और न ही युवाओं के नाम लिखे पत्र में भूतपूर्व शिक्षा मंत्री इसे कह पाए थे। जो माफ़ीनामा उन्हें लिखना चाहिए था वो उनकी बेटी लिखने से नहीं हिचकिचाई, न ही पुरानी पीढ़ी के पिता की तरह सही बात कहने में कोई ईगो उनके आड़े आया। क्या अब कहने वाले अपने प्रिय नेताओं की इन बेटियों के लिए भी यही कहेंगे कि ये राष्ट्रविरोधी हैं या इन्हें कोई भड़का-बहका रहा है?

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