संजय कुमार सिंह
राहुल गांधी ने एंटी-पेपर लीक बिल पर चर्चा के दौरान बुधवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर देश की शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली को नष्ट करने का सीधा आरोप लगाया। विपक्ष के नेता ने बच्चों और छात्रों के कॉक्रोच आंदोलन के दौरान पुलिस बर्बरता की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की। आज ये दोनों खबरें अखबारों के पहले पन्ने पर नहीं के बराबर हैं। देशबन्धु की लीड है, अब शाह को हटाने की मांग पर अड़े राहुल गांधी। द टेलीग्राफ ने दोनों बातें बताई है और लीड का फ्लैग शीर्षक है, छात्रों पर हमले के लिए गृहमंत्री पर और शिक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी के लिए आरएसएस पर आरोप लगाए गए। नवोदय टाइम्स ने इसे लोक सभा में क्रॉस फायर कहा है। राहुल गांधी के हवाले से उपशीर्षक है, छात्रों पर बर्बरता हुई लेकिन भाजपा का जवाब है और उसे भी उपशीर्षक बनाया गया है, विपक्ष के नेता झूठ बोलते हैं। भाजपा को और जगह दी गई है तथा उसकी ओर से मैदान में नए उतारे गए जितेन्द्र सिंह ने कहा है, राहुल गांधी को सार्वजनिक जीवन और प्रशासनिक प्रणाली की बुनियादी जानकारी नहीं है। इसके साथ ही यह भी खबर है कि राहुल गांधी को स्पीकर ने 11 बार, रिजिजू ने 7 बार टोका। खबर में बताया गया है, स्पीकर ने कहा कि वे सदन में इस प्रकार के (इडियट और अंधभक्त) शब्दों का उपयोग नहीं कर सकते हैं। …. बार-बार टोकने पर राहुल गांधी ने कहा, अगर आप चाहते हैं कि देश में सिर्फ बीजेपी ही बोले तो मैं चुप होकर बैठ जाता हूं। राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया गया और अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, राहुल के बोल पर भारी बवाल। अमर उजला में दो उपशीर्षक है। पहला, आरोप : छात्रों पर गोली चलाने का आदेश गृहमंत्री ने दिया था। दूसरा, न गोलियां चलीं, न पैलेट गन राहुल (गांधी) सबूत दें या माफी मांगे। बाद में अपनी प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी ने कहा (एबीपी लाइव), ‘मैने अमित शाह का नाम लिया था। छात्रों पर बर्बरता के लिए अमित शाह जिम्मेदार हैं। मैं बीजेपी और आरएसएस से माफी नहीं मांगूगा। छात्रों पर पैलेट गन चलाए गए और यही मुद्दा मैं संसद में उठाना चाह रहा था, लेकिन मुझे बोलने नहीं दिया गया।’
भाजपा के जवाब के तहत अमर उजाला ने यह भी लिखा है – आरोप लगाकर भागना राहुल की पुरानी आदत है। राहुल गांधी के आरोप के साथ लिखा है, हंगामे के चलते लोकसभा की कार्यवाही दो बार स्थगित हुई। मुद्दा यह है कि हंगामा भाजपा वालों ने किया और जिस मुद्दे पर किया उसकी चर्चा बड़े फौन्ट में नहीं है। वैसे भी, जो हुआ वह यही कि राहुल गांधी को इडियट और अंधभक्त जैसे दो शब्दों का उच्चारण करने से रोक दिया गया। अगर उसकी बात नहीं की जाए तो तथ्य यह भी है कि उसी संसद में निशिकांत दुबे को गांधी-नेहरू परिवार के बारे में अपशब्द बोलने पर कोई रोक नहीं है। यह सब लोकसभा अध्यक्ष का अधिकार और विवेक हो सकता है लेकिन खबर हमेशा संतुलित नहीं होती है और न संतुलित करने की कोशिश दिखती है। नवोदय टाइम्स ने भाजपा के कथन, एलओपी झूठ बोलते हैं को उपशीर्षक बनाया है। यह राहुल गांधी के आरोप, छात्रों पर बर्बरता हुई के जवाब में है और इस तथ्य के बावजूद है कि राहुल गांधी ने पेलेट गन के छर्रे से शिकार व्यक्ति को प्रेस कांफ्रेंस में पेश किया था और एक अलग प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि आंदोलनकारियों पर कैसी बर्बरता हुई। तमाम वीडियो आम हैं – इसके बावजूद भाजपा ने कहा और नवोदय टाइम्स ने इसी आधार पर लीड का शीर्षक रखा है, लोकसभा में क्रॉस फायर। तथ्य यह है कि भाजपा की फायरिंग एक्सपायर टीयर गैस शेल वाली है। खबर यह भी है कि पुलिस ने जो गोले दागे वे फटे नहीं क्योंकि उनकी मियाद निकल चुकी थी। ऐसे समय और शासन में दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक है, “छात्रों पर पेलेट गन किसने चलवाई : राहुल; आरोप झूठे, कोई गोली नहीं चली : भाजपा। इस मुख्य शीर्षक के साथ फ्लैग शीर्षक है, लोकसभा – राहुल के बयान पर सदन में हंगामा कांग्रेस की एक तो भाजपा की दो प्रेस कांफ्रेंस। जाहिर है, लोकसभा में राहुल गांधी को बोलने नहीं दिया गया और राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी बात रखी तो भाजपा ने एक के मुकाबले दो प्रेस कांफ्रेंस की और राहुल गांधी पर झूठ बोलने का झूठा आरोप लगाया। यही नहीं, यह भी कहा कोई गोली नहीं चली।
दैनिक भास्कर में यह लीड है जबकि बिहार में तो एक47 से गोलियां चलाने की भी खबर है। राहुल गांधी जब गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं तो जाहिर है वे सिर्फ दिल्ली की बात नहीं कर रहे थे और कहा जा सकता है कि दिल्ली में गोली नहीं चली थी, छर्रे चले थे पर राहुल गांधी जो कह रहे हैं वह स्पष्ट है। भाजपा उसे तकनीकी शब्दावली में उलझाना चाहती हो तो अखबार उसकी मदद कर रहे हैं। पैसा उसके पास है तो प्रेस कांफ्रेंस हो ही सकती है, खबरें भी उसकी ही छपती हैं। सबके बावजूद जनता के बीच सच्चाई पहुंच ही रही होगी। फिर भी भाजपा यह सब कर रही है तो जाहिर है, उसे यकीन है कि उसके वोट सुरक्षित है। यह यकीन क्यों और कितना है वह अलग मुद्दा है लेकिन खबर तो उसपर भी हो सकती थी और आज का दिन भी ऐसी किसी खबर के लिए अच्छा था। इसमें सरकार को सुप्रीम कोर्ट का सहयोग भी रेखांकित करने लायक है। कॉक्रोच जनता पार्टी से सरकार का समझौता हुआ था कि वह आंदोलनकारी छात्रों के खिलाफ मुकदमे वापस लेगी। पहले तो उसने समझौते का उल्लंघन किया फिर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा आदेश दिया कि मामला उलझ गया है और बच्चों को परेशान किया जा रहा है। डराया जा रहा है पर यह सब अलग मामले हैं। अपनी सरकार, देश समाज और बच्चों यानी भविष्य से संबंधित है लेकिन इसकी खबरें पहले पन्ने लायक नहीं हैं। अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ की चर्चा शुरू में कर चुका हूं। इसके अलावा, दि एशियन एज, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस की लीड एक ही है। द हिन्दू की लीड आज सभी अखबारों से अलग है। शीर्षक है, सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पहले की तारीख से प्रभावी होने वाले पर्यावरण क्लियरेंस को प्रतिबंधित किया।’ सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में 2021 के कार्यालय ज्ञापन को भविष्य में प्रभावी होने वाले प्रभाव से रद्द कर दिया; इसने ‘माफी योजनाओं’ के लिए शक्ति को बरकरार रखा, लेकिन प्रशासनिक आदेशों के बजाय उचित अधिसूचनाओं के माध्यम से। इस खबर का हाईलाइट किया हुआ हिस्सा है, सुप्रीम कोर्ट फैसले में – 2021 का कार्यालय ज्ञापन एक प्रशासनिक आदेश है और इसमें पूर्व पर्यावरण मंजूरी के बिना शुरू की गई परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने के लिए एक स्थायी व्यवस्था की परिकल्पना की गई है। यह 2006 की अधिसूचना के तहत पर्यावरण मंजूरी देने के लिए जांच की प्रकृति और मानदंडों को काफी हद तक बदल देता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, राहुल गांधी के हमले और हंगामे के बीच लोकसभा ने इसे पास कर दिया। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, लोकसभा ने एंटी पेपर लीक बिल को पास किया तो राहुल, केंद्र की झड़प के बीच लोकसभा ने एंटी पेपर लीक बिल पास कर दिया। इंडियन एक्सप्रेस ने पांच कॉलम की लीड का शीर्षक लगाया है, सख्त पेपर लीक विधेयक लोकसभा से पास हुआ, राहुल ने पुलिस के हमले का मुद्दा उठाया। दि एशियन एज में लीड के साथ सिंगल कॉलम की खबर है, राहुल गांधी ने जांच की मांग की कहा, शाह ने नीट प्रदर्शन पर फायरिंग का आदेश दिया था। संसद के मानसून सत्र में भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तो सिर्फ एक प्रतीक हैं, जबकि शिक्षा मंत्रालय को असल में आरएसएस चला रहा है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि आरएसएस ने भारत की शिक्षा प्रणाली की ‘आत्मा’ पर कब्ज़ा कर लिया है। देश की हर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर इसी संगठन से जुड़े हैं। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस युवाओं को स्वतंत्र सोचने वाले छात्रों के बजाय ‘अंधभक्त’ बनाना चाहता है। नीट जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक का हवाला देते हुए कहा कि छात्रों के पास पैसे हों तो वे परीक्षा प्रणाली को खरीद सकते हैं। प्राइवेट कंपनियां परीक्षाएं आयोजित कर रही हैं, इससे पूरी व्यवस्था खोखली हो गई है। ईटीवी भारत के अनुसार, इस तरह शिक्षा मंत्रालय को चलाने वाला संगठन आरएसएस कहा जाता है। जो व्यक्ति इसे चलाता है वह एक ओएसडी है जो मंत्री के कार्यालय में बैठता है। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि केंद्रीय केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव के निजी स्टाफ के चार प्रमुख सदस्यों को तीन जुलाई को अचानक एक साथ हटा दिया गया था। इससे संबंधित कई सवाल अभी तक अनुत्तरित हैं। खास बात यह कि घटना तब हुई जब भूपेन्द्र यादव तृणमूल के सांसदों से दल बदल कराने में खासतौर से सक्रिय थे और स्थिति वैसी ही थी जैसे में अभी जितेन्द्र सिंह दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी ने मंत्री के कार्यालय में आरएसएस के लोगों की उपस्थिति का मुद्दा उठाया है तो यादव के कार्यालय से हटाए गए लोगों में मंत्री के निजी सचिव, दो अतिरिक्त निजी सचिव और एक सहायक निजी सचिव शामिल हैं।
3 जुलाई 2026 को जारी आदेशों के मुताबिक हटाए गए लोगों में अमर सिंह भूपेंद्र यादव के निजी सचिव थे। अमर सिंह 2021 से यादव के साथ थे, तब यादव श्रम एवं रोजगार मंत्री थे। 2024 में पर्यावरण मंत्रालय मिलने के बाद भी वे उनके निजी सचिव बने रहे। शैलेश कुमार सिंह, केंद्रीय सचिवालय सेवा के अधिकारी और अतिरिक्त निजी सचिव थे। उन्हें समय से पहले उनके मूल कैडर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग में वापस भेजा गया। आयुष सरन, अतिरिक्त निजी सचिव थे। उनकी नियुक्ति तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गई। 2024 में मंत्रालय ने उन्हें अतिरिक्त निजी सचिव के रूप में नियुक्त किया था। सिद्धार्थ यादव, मंत्री के सहायक निजी सचिव, की नियुक्ति भी 3 जुलाई के ही एक अलग आदेश से तत्काल प्रभाव से समाप्त की गई थी। इसके साथ यह संख्या तीन से बढ़कर चार हो गई। आयुष सरन और सिद्धार्थ यादव मंत्री के निजी स्टाफ थे और उनकी नियुक्तियां समाप्त करना सामान्य नहीं हो सकता है। इनमें सबसे दिलचस्प नाम सिद्धार्थ यादव का है। ये भूपेंद्र यादव के ‘सबसे पुराने और करीबी सहयोगियों’ में से एक थे। दोनों का संबंध आरएसएस से जुड़े शुरुआती दौर से बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक उनकी नियुक्ति ‘राजनीतिक व्यक्ति’ के रूप में हुई थी—अर्थात वे सामान्य कैडर अधिकारी नहीं, बल्कि मंत्री के निजी स्टाफ में राजनीतिक व्यक्ति के रूप में नियुक्त किए गए थे। उनकी नियुक्ति 11 जून 2024 से हुई थी और मंत्री के साथ या अगले आदेश तक थी। फिर भी सरकार ने अभी तक कुछ नहीं कहा है। सारी सूचनाएं सूत्रों पर आधारित हैं।
चारों आदेशों की प्रतियां प्रधानमंत्री कार्यालय, कैबिनेट सचिवालय और डीओपीटी सहित संबंधित अधिकारियों को भेजी गई थीं। इससे स्पष्ट होता है कि यह सामान्य तबादला नहीं था। इकनॉमिक टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से लिखा था कि इन लोगों के खिलाफ गंभीर शिकायतें प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची थीं और आरोप था कि मंत्री के कुछ सहयोगियों ने अपनी निर्धारित भूमिका से आगे बढ़कर काफी निर्णय लेने की शक्ति हासिल कर ली थी। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा है कि चार लोगों को एक साथ हटाया जाना चौंकाने वाला है और व्यंग्य में पूछा कि क्या यह ‘चंदा दो, धंधा लो’ योजना के गलत हो जाने का मामला है। कांग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी ने भी पूछा कि एक मंत्री के कार्यालय में अचानक ‘क्लीन स्वीप’ क्यों हुआ और क्या कुछ सामने आया था। तृणमूल सांसदों की बगावती मीटिंग अपनी जगह है ही, भले किसी घोटाले से नहीं जुड़ती है। अब ऐसे में राहुल गांधी की कल की टिप्पणी इस मामले को नया राजनीतिक अर्थ देती है। उसपर आज द हिन्दू की लीड पर्यावरण से संबंधित खबर है। कहने की जरूरत नहीं है कि देश का मीडिया इस लिहाज से जागरुक और सक्रिय नहीं है और कारण यही है कि कुछ के मुंह में हड्डी थमा दी गई है और कुछ के पिछवाड़े कील लगी लाठी से लाल कर दिए गए हैं।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


