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आज के अखबार : प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण है, किसी भी तरह बने रहने के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं

Group of Indian politicians protest outside Parliament; central figure in white shirts greets supporters while a banner with faces is held to the right.

तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी का विरोध प्रदर्शन – लोकसभा में पश्चिम बंगाल के 20 गद्दार। इसमें लिखा नहीं है लेकिन तथ्य है कि गद्दार निश्चिंत हैं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों संसद नहीं आ रहे थे। कॉक्रोच जनता पार्टी के अभिजीत दिपके से भाजपा में शामिल होने के लिए कहा जा रहा है। सीजेआई को गाली देने वाले को माफी मिल गई। प्रधानमंत्री गाली देने वाले फ्रैंड्स को माफ नहीं करना चाहते हैं। यहां तक तो ठीक है, न करें, कानूनी कार्रवाई करें, पुलिस अपने क्रम से या अपनी प्राथमिकता के आधार पर या स्वतंत्रता पूर्वक करे लेकिन सोशल मीडिया वाली सरकारी, भाजपाई और संघी सेना को कोई तो संभाले। कहीं ऐसा न हो कि व्यवस्था नरेन्द्र मोदी को महान बनने-बनाने में लगी रहे और देश में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली व्यवस्था चलती रहे।

संजय कुमार सिंह

शिक्षा, परीक्षा दुरुस्त करने और शिक्षा मंत्री की अयोग्यता के विरोध तथा विरोध के कारण शिक्षा मंत्री को हटाए जाने के बाद विरोध करने वालों पर पुलिस की बर्बरता तथा आंदोलन खत्म करने के लिए किए गए वायदों या समझौते की शर्तों के पालन जैसे मुद्दों पर चर्चा के इस समय में अखबारों की खबरों से साफ लग रहा है कि सरकार जनहित की बजाय अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में लगी है। सरकार पर मीडिया का कोई दबाव नहीं है और विरोध करने वाले डरा धमका लिए गए हैं। यह बात खबरों से ही साफ हो जाती है। आइए देखें कैसे – देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, सड़क से संसद तक गूंजी शाह के इस्तीफे की मांग। यह लीड आज किसी और अखबार में नहीं है जबकि राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने संसद में इस्तीफे का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। नवोदय टाइम्स ने इसी खबर का शीर्षक लगाया है, हमले में मनुस्मृति। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर सवाल किया। युवा कांग्रेस ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया मल्लिकार्जुन खरगे ने जो कहा उसमें यह भी है कि, किसानों, महिला पहलवानों और मणिपुर के बाद अब छात्रों पर बर्बरता की गई है। बिहार में तो छात्रों के ऊपर एके47 का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने आगे पूछा, आखिर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे छात्र-छात्राओं पर पेलेट गन, आंसू गैस के गोल दागने और लाठियां चलाने का आदेश किसने दिया? दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ किसके अधीन है? प्रधानमंत्री जितनी भी कोशिश कर लें उन्हें अपने गृहमंत्री को हटाना पड़ेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भीड़ नियंत्रित करने के लिए पेलेट गन के नियंत्रण पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती है। कोर्ट ने जो कहा है वह सरकारी और कानूनी कार्रवाई है लेकिन यह नहीं बताया कि बच्चों पर पेलेट गन चलाना सही (जरूरी) था या नहीं और सही भी था (या है) तो आदेश किसने दिया।

यह लोकतंत्र में सरकार की पारदर्शिता के लिए जरूरी है। और पूछा जाए, सही है तो बताने में दिक्कत होने का कोई मतलब भी नहीं है। लेकिन इतने दिनों बाद देश को सुप्रीम कोर्ट से भी इतना ही मिला है या मिलने की खबर है। खबर में तर्क –  कुतर्क सब हैं जिसकी जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को फैसला देना है चुनाव लड़ने के लिए मैदान थोड़ी बनाना है। मुद्दा यह था कि गोली चलाने या चलवाने वाले को सजा मिलनी चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि सही है तो कह दे कि सही है और इसकी जरूरत नहीं है। जाहिर है, यह सब तय करने में समय लगेगा और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के राजनीतिक मतलब निकल सकते हैं इसलिए उसने कुछ स्पष्ट कहा ही नहीं या कहा भी तो अखबार ने अपने राजनीतिक आकाओं के हित में उसे स्पष्ट किया ही नहीं। दैनिक भास्कर ने पेलेट गन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के विचार बताए हैं, मौजूदा नियम रहते पेलेट गन पर रोक नहीं लग सकती। द हिन्दू की लीड के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पेलेट गन पुलिस की क्रमिक कार्रवाई का हिस्सा हैं। शीर्ष अदालत ने इनके इस्तेमाल के लिए ‘असाधारण परिस्थितियों’ का ज़िक्र तो किया, लेकिन विस्तार से नहीं बताया; बेंच ने कहा कि छात्रों के विरोध-प्रदर्शन से निपटने में राज्य को बर्बरता नहीं दिखानी चाहिए, साथ ही विरोध-प्रदर्शनों के ‘हाईजैक’ होने की आशंका भी जताई। मुझे तो इस खबर से लगता है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के बचाव की कोशिश कर रहा हो या नहीं, अखबार तो दोनों के बचाव की कोशिश कर ही रहा है। द टेलीग्राफ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पेलेट गन का इस्तेमाल अवैध नहीं है। मुझे लगता है कि अभी तक किसी ने नहीं कहा है कि इस्तेमाल अवैध है। सबने कहा कि आतंकवादियों के खिलाफ जिन हथियारों का उपयोग किया जाता है उनका इस्तेमाल बच्चों के खिलाफ नहीं किया जाना चाहिए था। करने वाला या करने का आदेश देने वाला बच्चों (भविष्य के नागरिकों) के प्रति बेरहम है इसलिए इस्तीफा दे। वैसे भी बच्चे देश में शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को ठीक करने की ही मांग कर रहे थे। लेकिन सरकार ने आंदोलन के दबाव में और बहुत मजबूरी में शिक्षा मंत्री को तो हटा दिया लेकिन परीक्षा की व्यवस्था ठीक करने के लिए कुछ नहीं किया। नए विधेयक से तो लग रहा है कि उसकी नीयत ही नहीं है कि कुछ किया जाए। और कहने की जरूरत नहीं है कि होती तो आंदोलन की जरूरत ही क्यों पड़ती लेकिन प्रधानमंत्री अपनी तरह से कोशिश कर रहे हैं। संसद नहीं आ रहे हैं और गृहमंत्री भी नहीं आ रहे हैं।

राहुल गांधी ने कई बार आरोप लगाया है कि पूरी व्यवस्था आरएसएस वालों के नियंत्रण में है और हाल में उन्होंने कहा कि मंत्री बदलने से कुछ नहीं बदलेगा। इसके बावजूद दि एशियन एज की लीड बताती है कि संसद ने एंटी पेपर लीक कानून को ज्यादा सख्त बनाया। प्रधानमंत्री संसद तो नहीं आ रहे हैं लेकिन ज़ेन ज़ी की तरह रील बाजी पर उतर आए हैं और एक नये वीडियो संदेश में कहा है, पेपर लीक माफियाओं को बख्शा नहीं जाएगा। नवोदय टाइम्स ने इसे प्रधानमंत्री की फोटो के साथ तीन कॉलम में तान दिया है और बताया है कि प्रधानमंत्री ने देर रात इंस्टाग्राम पर वीडियो संदेश जारी किया। हाल में उन्होंने अपने मंत्रियों से इंस्टाग्राम पर सक्रिय होने के लिए कहा था और यही उनकी कार्यशैली है वरना पेपर लीक में भाजपा के लोग पकड़े गए हैं, आरएसएस के लोगों के शामिल होने की आशंका है। प्रधानमंत्री कार्रवाई सुनिश्चित कैसे करेंगे जब पूर्व में पकड़े या आरोपी बनाए गए लोगों को एफआईआर दायर करने के समय छोड़ा जा चुका है। सरकार समर्थक लोग इसके लिए समाज को दोषी ठहराने की कोशिश कर चुके हैं। यह दलील दी गई है कि प्रश्नपत्र बनाने वाले ने ही लीक कर दिया। अगर प्रश्नपत्र लीक करने वाला नया था और उसने लीक कर दिया तो जाहिर है कि गलत आदमी को यह जिम्मेदारी वाला काम सौंपा गया। वैसे भी कोई अपने बच्चे या छात्र को प्रश्नपत्र दे और उसका चुनाव हो जाए तो पता भी नहीं चलने वाला है। समस्या तब होती है जब उससे लाखों कमाने की कोशिश होती है और यह सिस्टम की नालायकी है। उसी में प्रश्नपत्र बनाने का काम नए लोगों को दिया जा रहा है वरना कहा जाता कि इतने साल से प्रश्नपत्र बनाने वाले ने इस बार सरकार को या शिक्षा मंत्री को बदनाम करने के लिए प्रश्नपत्र बेच दिया। जाहिर है मामला इतना आसान नहीं है और यहां मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन वह सरकार के साथ ही दिख रहा है। उदाहरण के लिए इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, सदन ने एंटी पेपर लीक विधेयक पास कर दिया, प्रधानमंत्री ने कहा किसी को बख्शा नहीं जाएगा। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड कॉक्रोच आंदोलन के दौरान प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने का दिल्ली सरकार का वादा है। आप जानते हैं कि मामला पुराना है और दिल्ली सरकार को यह वादा करने में इतना समय लग गया। पहले कॉक्रोच जनता पार्टी की अपील और मांग पर सरकार के झुकने की खबरें आ चुकी हैं। और यहां उनकी चर्चा हो चुकी है। आज जब यह प्रचार किया जा रहा है कि आंदोलनकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी तो सिंगल कॉलम की खबर है कि फरीदाबाद की महिला के खिलाफ जीरो एफआईआर हो गई है।

इस संबंध में द हिन्दू में एक विस्तृत खबर है, दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद महिलाओं को डॉक्सिंग और ऑनलाइन धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। नई दिल्ली डेटलाइन से सुरुचि कुमार की बाईलाइन वाली इस खबर के अनुसार, दिल्ली के जंतर-मंतर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के तौर पर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद, इस आंदोलन में शामिल कई महिलाओं ने ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होने की बात कही है। कायदे से सरकार का यह काम है कि वह किसी को इस तरह परेशान न होने दे, शिकायत पर कार्रवाई करे और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे। कानूनी कार्रवाई अलग मामला है और ऑनलाइन ट्रोल बिल्कुल अलग। दुनिया जानती है कि प्रधानमंत्री कुछ ट्रोल को फॉलो करते हैं और भाजपा (समूह) की ऑनलाइन सेना है। प्रधानमंत्री जिसे फॉलो करते हैं उसके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा और क्यों करेगा। यह व्यवस्था है और इसमें सरकार की तरफ से या सरकार समर्थक गालीबाजों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है। प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को मुद्दा बनाकर उनके खिलाफ काम करने वालों के खिलाफ प्राथमिकता के आधार पर कार्रवाई की जा रही है। वरना कई मामलों में पुलिस को अपराधी नहीं मिलते हैं लेकिन प्रदर्शन में भाग लेने वालों की प्रोफाइलिंग हो चुकी है और भाग लेने वाले कथित अपराधियों से संबंधित विवरण सार्वजनिक है। फिर भी मामला प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा है तो उसे बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय का काम है कि पहले उन मामलों में कार्रवाई की जाए जो आम लोगों के खिलाफ हैं। प्रधानमंत्री से संबंधित मामला हो तो उसे भी प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाना चाहिए। या फिर क्रम से किया जाए, पहले आओ-पहले पाओ का पालन किया जाए लेकिन प्राथमिकता पुलिस तय करती लग रही है और यह प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए हो रहा है या प्रधानमंत्री कार्यालय से कहा गया है – इससे संबंधित कोई खबर मुझे नहीं दिखी।  ‘द हिंदू’ ने ऐसे कई मामलों की पुष्टि की है, जिनमें महिलाओं को डॉक्सिंग (निजी जानकारी सार्वजनिक करना) और ऑनलाइन बलात्कार व जान से मारने की धमकियों का सामना करना पड़ा। पिछले हफ़्ते विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाली या सोशल मीडिया पर बयान देने वाली महिलाओं के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर शेयर किए गए। कई एक्स  तथा इंस्टाग्राम हैंडल ने अपने फ़ॉलोअर्स से उन्हें “सबक सिखाने” की अपील की। एक महिला को एक पोस्ट में “मोस्ट वांटेड” घोषित किया गया, जिसमें कहा गया कि उसकी “तलाश जारी है” और उसके ठिकाने के बारे में जानकारी मांगी गई। गुरुवार दोपहर तक, ऑनलाइन ऐसे पोस्ट फैलने लगे जिनमें दावा किया गया कि उसकी पहचान कर ली गई है; इन पोस्ट्स में उसका नाम, शहर और नोएडा में दर्ज ज़ीरो एफआईआर की कॉपी शामिल थी। कथित वीडियो में, महिला पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ “अपशब्द कहने” का आरोप है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री को अपशब्द कहने से प्रधानमंत्री को कुछ नहीं होने वाला है लेकिन उनके समर्थकों के डर में जीना उसके लिए मुश्किल हो जाएगा। यह कानूनी तरीका तो नहीं ही है। अव्वल तो कानूनी कार्रवाई लायक मामला नहीं है और करनी हो तो वही हो बाकी ट्रोलिंग और डराना धमकाना क्यों? वह भी तब जब भाजपा की सरकार खतरे में पड़े हिन्दुओं को सुरक्षा देने आई थी। अमर उजाला के पहले पन्न की लीड दिल्ली सरकार का प्रचार है और यह प्रचार दूसरे अखबारों की तरह आंदोलनकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का उसका वादा नहीं है। खबर है कि दिल्ली की रेखा सरकार दिल्ली लैंड रिकार्ड बिल ला रही है और हर प्रोपर्टी का यूनिक आधार होगा।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।   

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