
संजय सिन्हा-
द्रौपदी के वो खुले केश…
नमस्कार। मैं संजय सिन्हा। ssfbNews में आज पेश है एक तस्वीर की कहानी।
इस तस्वीर को संभाल कर रख लीजिएगा। हो सकता है कुछ साल बाद आपको इसकी कीमत समझ आए।
यह नेहा बोरा हैं। आज इनके चेहरे पर स्याही है। किसी ने इनके चेहरे पर स्याही फेंकी है। आज शायद स्याही फेंकने वाले सोच रहे होंगे कि उन्होंने बहुत बड़ा काम कर दिया। किसी की आवाज बंद कर दी। किसी को अपमानित कर दिया। किसी को उसकी औकात बता दी।
इतिहास का एक बहुत पुराना अनुभव है।
आदमी को अपमानित करके आप उसके आज को तो चोट पहुंचा सकते हैं, उसके कल का फैसला नहीं कर सकते। इसलिए कह रहा हूं, इस तस्वीर को संभाल कर रख लीजिएगा। हो सकता है आज यह सिर्फ एक लड़की के चेहरे पर लगी स्याही की तस्वीर हो, लेकिन कल यही तस्वीर किसी द्रौपदी के खुले केश की पहली तस्वीर कहलाए।
संजय सिन्हा सिर्फ इतिहास देख रहे हैं। इतिहास बड़ा निर्दयी शिक्षक है। वह हमें बार-बार बताता है कि जिन्हें हम आज छोटा समझकर अपमानित करते हैं, कल वही हमारे समय की बड़ी कहानी बन सकते हैं।
मैं जानता हूं कि आप चाहते हैं कि सुबह संजय सिन्हा कोई ऐसी कहानी लेकर आएं जिसमें मां का प्यार हो, पिता का दुलार हो, बेटा हो, बेटी हो, पति-पत्नी हों, कोई रिश्ता हो, जिंदगी की कोई छोटी-सी बात हो और उस छोटी-सी बात में जीवन का कोई बड़ा अर्थ निकल आए।
मैं आपकी इस उम्मीद को समझता हूं और शायद इसी वजह से इतने वर्षों से लिखता आया हूं। लेकिन आज फिर आप मुझे माफ कर दीजिएगा। आज मेरी नजर बार-बार इसी तस्वीर पर चली जा रही है। ऐसे मैं कैसे चुप रहूं?
संजय सिन्हा महाभारत से लेकर आज तक अपमान का इतिहास देखते आए हैं। द्रौपदी का अपमान हो या आज किसी युवा लड़की का, समय बदल गया है, सभाएं बदल गई हैं, लेकिन मनुष्य की एक आदत नहीं बदली। जब तर्क खत्म हो जाता है तो अपमान शुरू हो जाता है। जब बहस में हारने लगते हैं तो सामने वाले को नीचा दिखाने लगते हैं। जब विचार का उत्तर नहीं मिलता तो व्यक्ति निशाना बन जाता है।
महाभारत में अपमान सभा के बीच हुआ था। आज कैमरे के सामने होता है। तब भी लोग देख रहे थे, आज भी लोग देख रहे हैं। तब खबर हस्तिनापुर से बाहर जाने में समय लगता था और आज एक तस्वीर पूरी दुनिया में कुछ सेकंड में पहुंच जाती है। लेकिन एक बात तब भी वही थी और आज भी वही है। बस ध्यान रखिएगा, अपमान का परिणाम अपमान करने वाला तय नहीं करता।
द्रौपदी को भरी सभा में केश पकड़ कर घसीटा गया था। उसके बाद उसके खुले केश एक प्रतीक बन गए थे। यह उस पुराने इतिहास की याद है, जिसमें अपमान ने इतिहास को ही बहुत महंगा बना दिया।
7 जून 1893 को दक्षिण अफ्रीका के पीटरमैरिट्जबर्ग स्टेशन पर एक आदमी को एक गोरे ने प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया था। उनके पास टिकट था। फिर भी…
आगे क्या लिखूं, बस नाम ही काफी है- आदमी का नाम था मोहनदास करमचंद गांधी।
मैं यह नहीं कह रहा कि हर अपमान किसी को गांधी बना देता है। ऐसा कहना मूर्खता होगी। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूं कि इतिहास में छोटा-सा अपमान कई बार सत्ता की ताबूत में…।
4 नवंबर 1974 को पटना में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया। जेपी को बचाने के लिए नानाजी देशमुख उनके आगे आ गए और खुद लाठियां खाईं। वह दृश्य जेपी आंदोलन की स्मृति का हिस्सा बन गया।
लालू प्रसाद यादव उस समय युवा छात्र नेता थे। जेपी आंदोलन में सक्रिय हुए। आपातकाल आया। गिरफ्तारियां हुईं। जेल का दौर आया। फिर 1977 आया और सिर्फ 29 वर्ष की उम्र में लालू प्रसाद लोकसभा पहुंच गए।
जॉर्ज फर्नांडिस की आपातकाल में हथकड़ियों वाली तस्वीर याद कीजिए। सत्ता शायद उस समय यह मानती होगी कि गिरफ्तार आदमी की आवाज खत्म हो गई। लेकिन 1977 में जेल में रहते हुए जॉर्ज फर्नांडिस चुनाव जीत गए और इतिहास ने उनकी हथकड़ियों को संघर्ष की तस्वीर बना दिया।
इसलिए आज जब मैं नेहा बोरा के चेहरे पर स्याही देख रहा हूं तो मुझे सिर्फ एक घटना नहीं दिखाई देती। मुझे एक सवाल दिखाई देता है। आखिर हम अपने से असहमत लोगों के साथ करना क्या चाहते हैं?
क्या हम उनसे बहस नहीं कर सकते? क्या हम उनके विचारों का जवाब नहीं दे सकते? क्या हम उनके सामने खड़े होकर यह नहीं कह सकते कि तुम गलत हो।
आप उन्हें चुनाव में हराइए। बहस में हराइए। लेख लिखकर हराइए। मंच पर हराइए। लेकिन चेहरे पर स्याही फेंककर आप सिर्फ इतना साबित करते हैं कि उस क्षण आपके पास तर्क नहीं था।
स्याही पानी से धुल जाती है। अपमान की तस्वीर नहीं धुलती। चेहरा साफ हो जाएगा। लेकिन यह तस्वीर इंटरनेट पर रहेगी। किसी दिन कोई बच्चा इस तस्वीर को देखकर पूछेगा कि यह लड़की कौन थी? तब उसे बताया जाएगा कि यह नेहा बोरा थीं। जेन जी की एक युवा नेता, जिनके चेहरे पर विरोध के नाम पर स्याही फेंकी गई थी। फिर वह बच्चा अगला सवाल पूछेगा, उसके बाद क्या हुआ? बस, संजय सिन्हा को इसी सवाल से डर लगता है।
नेता पैदा नहीं होते। नेता कई बार परिस्थितियों से बनते हैं। कोई जेल से निकलकर नेता बनता है। कोई आंदोलन से निकलकर नेता बनता है। कोई हार से निकलकर नेता बनता है। कोई अपमान से निकलकर नेता बनता है। कोई उस दिन नेता बनता है जिस दिन उसे लगता है कि अब चुप रहना संभव नहीं है।
इसलिए मैं कह रहा हूं, आप इस तस्वीर को संभाल कर रख लीजिएगा। यह हमारे समय की तस्वीर है। यह उस राजनीति की तस्वीर है जिसमें असहमति को दुश्मनी समझ लिया जाता है। यह उस समाज की तस्वीर है जहां हम सामने वाले को सुनने से पहले उसे चुप कराने की कोशिश करते हैं। और यह उस दौर की तस्वीर है जिसमें कैमरा हर जगह है और हर अपमान इतिहास का हिस्सा बनने की क्षमता रखता है।
संजय सिन्हा खुलकर लिख रहे हैं कि किसी आदमी को छोटा समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए। किसी को गिराते समय थोड़ा संभलकर गिराइए। हो सकता है कि एक दिन आप ही उसकी कहानी सुना रहे हों।
आज मैं अपने परिजनों से माफी मांगता हूं। मैं जानता हूं कि आप चाहते हैं कि संजय सिन्हा राजनीति के झगड़ों में न पड़ें। आप चाहते हैं कि रोज रिश्तों, जिंदगी, प्रेम की बात करें। पर आज मुझे माफ कर दीजिएगा।
मैं महाभारत से लेकर आज तक अपमान के परिणाम देखता आया हूं। अगर मैं इस तस्वीर को देखकर भी चुप रह जाऊं तो अपने ही भीतर छोटा हो जाऊंगा।
आज सिर्फ इतना लिख रहा हूं कि असहमति रखिए। विरोध कीजिए। लड़िए। बहस कीजिए। हराइए। लेकिन यह याद रखिएगा… कभी-कभी ये तस्वीर इतिहास की धरोहर हो जाती है।
इतिहास में अपमान कभी-कभी सिर्फ अपमान नहीं रहता। कई बार द्रौपदी का प्रतिशोध बन जाता है।


