कमाल टाइम्स ऑफ इंडिया ने किया है। पहले पन्ने की खबरें गिनिए। सबका संबंध सरकार से है! ऐसे में प्रधानमंत्री को दिमागी नक्सली को अलग या आइसोलेट करने की जरूरत क्यों लगी होगी, समझना मुश्किल नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि मास्टर स्ट्रोक लगाने वाली सरकार की चाणक्य नीतियां चुक गईं अब चूक रही हैं जो आज के अखबारों में दिख रहा है।
संजय कुमार सिंह
वंदे मातरम की चिन्ता इतनी है कि अमर उजाला ने इसे लीड ही बना दिया है लेकिन मुझ यह खबर जिक्र करने लायक भी नहीं लगती है। आगे जिक्र करना ही पड़ेगा। आप जानते हैं कि इस बार स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री के तेरहवें भाषण को विपक्ष ने फूहड़ (Cheap) कहा है। इसका चर्चित शब्द है दिमागी नक्सल। प्रधानमंत्री का पूरा वाक्य था, “…. जंगलों में हमें हथियारबंद नक्सलों का खात्मा करने में, उस संकट से देश को मुक्त कराने में सफलता मिली है। लेकिन हथियारबंद नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल, ये दिमागी नक्सल मौके की तलाश में है। हिंसा अराजकता के वो रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव कर रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा ….।” आज दिमागी नक्सल से संबंधित खबर तो है ही, वंदे मातरम के अपमान पर सोनिया गांधी से माफी मांगने की बात भी है। मुद्दा यह है कि सरकार का विरोध करने वाले देश के छात्रों और बच्चों पर राजधानी दिल्ली में गोलियां चलीं। इससे पहले दिल्ली के पुलिस प्रमुख को बदला गया था। सरकार कहती रही है कि गोली चली नहीं, अस्पतालों में मरीज थे, उनकी पहचान सार्वजनिक है उन्हें लगे छर्रे के वीडियो दुनिया ने देखे हैं। ऐसे में विपक्ष के नेता का सवाल था कि गोलियां किसके आदेश से चलीं। सरकार ने जवाब नहीं दिया, बचने के लिए संसद के पूरे मानसून सत्र के दौरान प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लोकसभा में नहीं आए। बातें खूब हुईं। सवालों के जवाब संसद में नहीं दिए गए तो लाल किए से दिए जा सकते थे लेकिन वहां दिमागी नक्सलों को आइसोलेट करने की जरूरत बताई गई। नरेन्द्र मोदी की सरकार कैसे काम करती रही है, सबको पता है, अघोषित इमरजेंसी की बात भी चलती रही है लेकिन सरकार के पास संसद में पूछे गए सवालों का जवाब था तो लाल किले से बताया जाना चाहिए था। नहीं बताया गया मतलब जवाब नहीं है और झोला उठाकर चल देने वाले को अब इस्तीफा देने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी। पर इस्तीफा नहीं हो रहा है, समर्थन वापस नहीं लिया जा रहा है और बैसाखी मजबूती से बनी हुई है तो कारण भी सबको पता है, विपक्ष को दबाना, कुचलना, खत्म और कमजोर करना। अब यह सब छिपा नहीं है।
खबरें पेश करने में आज टाइम्स ऑफ इंडिया का चयन और प्रस्तुति उल्लेखनीय है। पहले पन्ने की सारी खबरें राजनीति से प्रभावित हैं। लीड का शीर्षक है, एनटीए ने गलतियां मानीं, 3 एनईटी परीक्षाएं फिर से होंगी। परीक्षा कराने वाली एजेंसी गलती करे और कोई विकल्प नहीं है, स्वीकार करना पड़े। इससे ज्यादा बुरी स्थिति क्या होगी? पर्चे लीक होते रहे हैं और इससे परेशान होकर 22 बच्चों ने आत्महत्या कर ली। सरकार ने उनके लिए दो शब्द नहीं कहे। मुआवजा देने की मांग पर गोल-मोल समझौता किया और पूरी व्यवस्था ऐसी रही कि यह मांग पीछे रह गई। मुआवजा देने में यह सरकार वैसे भी कमजोर रही है। जनधन खातों के लिए बीमा कराए जाते हैं पर उस बीमा का लाभ किसे मिला, कितना मिला आज तक नहीं बताया गया है। मीडिया ने कोई खबर करने की जरूरत समझी हो तो मुझे पता नहीं है। सेकेंड लीड का शीर्षक है, पांच बार के टीएमसी विधायक, पूर्व उपसभापति का पार्टी कार्यालय में आत्महत्या करने से निधन। द टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक है, ‘बदनाम कर दिए गए’ टीएमसी नेता नहीं रहे। फ्लैग शीर्षक है, दीदी के सहयोगी जो बागियों के साथ चले गए थे, लटके हुए पाए गए। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, मुख्यमंत्री सुवेन्दू अधिकारी ने बनर्जी की पत्नी से मुलाकात की और पुलिस से यह पता करने के लिए कहा है कि टीएमसी के भ्रष्ट व्यक्तियों ने उन्हें धमकाया तो नहीं था। तीन-तीन कॉलम की इन दो खबरों के बीच में दो कॉलम की खबर सीजेआई की है। उन्होंने कहा है – नलसार का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था, इसलिए जाने का कोई सवाल नहीं है। आप जानते हैं कि छात्रों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को नलसार के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाने का विरोध किया था। तभी खबर थी कि आयोजन की तारीख तय नहीं है, उन्हें औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया गया पर छात्रों ने कहा है कि वे उनके हाथों से डिग्री नहीं लेंगे। इस पर बीसीआई के प्रमुख का आदेश और उसका हश्र आप पढ़ चुके हैं। अब तक यह भी जान गए होंगे कि भाजपा से इनाम पाए सांसद हैं।
ऊपर की इन तीन खबरों के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया की दूसरी लाइन में चार खबरें हैं। जो सबसे महत्वपूर्ण है वह तीन कॉलम में है, डेढ़-डेढ़ कॉलम की दो खबरें एक साथ हैं लेकिन एक कॉलम की खबर भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इतनी महत्वपूर्ण है कि अमर उजाला ने पहले पन्ने पर पांच कॉलम में छापा है और नवोदय टाइम्स में यह खबर टॉप पर चार कॉलम में है। चाइनीज (चीनी) माझे से कटा बाइक सवार का गला, मौत। खास बात यह भी है कि भारत में ऐसे माझे के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। अगर मेरी याद्दाश्त और एआई की जानकारी सही है तो राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने 11 जुलाई 2017 को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में पूरे देश में चीनी/सिंथेटिक मांझे और कांच या धातु लेपित धागों पर पूर्ण और स्थायी प्रतिबंध लगा दिया था। इसके अलावा जनवरी 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पर रोक लगाने के आदेश जारी किए थे। इसके बावजूद इनका उपयोग किया जा रहा है। ना संबंधित एजेंसियों को मतलब है ना दिमागी नक्सल कुछ कर पाए हैं। सरकार की चिन्ता चीनी मांझे का उपयोग रोकना नहीं है, लेकिन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करने की है ताकि वे वंदे मातरम को मुद्दा बनाने का मजाक न बनाएं। कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन इस मामले में नहीं हो रहा है। मुझे याद नहीं है कि डबल इंजन सरकार के किसी मंतरी-संतरी ने इसपर कभी कुछ बोला हो लेकिन जिस वंदे मातरम से किसी को नुकसान नहीं होना है वह मुद्दा है और गृहमंत्री ने कहा है कि इसके लिए सोनिया गांधी माफी मांगें। दैनिक भास्कर ने इसे पहले पन्ने पर छापा है। यह बात तो रह ही गई कि 22 बच्चों की मौत की जिम्मेदारी तय नहीं हुई, पेलेट गन चलवाने और सैकड़ों बच्चों को जख्मी करने के लिए कोई अफसोस नहीं जताया गया। बिना छुट्टी 18 घंटे काम करने वाले लोगों ने संसद में आकर जवाब नहीं दिया ना छुट्टी के पैसे छोड़े। माफी सोनिया गांधी मांगें क्योंकि सरकार ने वंदेमातरम को अपमान से बचाने के नए नियम बनाए हैं। वंदेमातरम वाली खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में डेढ़ कॉलम में छपी है और डेढ़ कॉलम की दूसरी खबर है, पी चिदंबरम ने एक्स पर लिखा है – दिमागी नक्सल होने पर गर्व है। खबर है कि इतवार को इसपर वार-पलटवार चलता रहा। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि प्रधानमंत्री विपक्ष की बात नहीं कर रहे थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबरों की दूसरी लाइन में यह भी बताया है कि अखबार दो हिस्से में है और एक अन्य पहला पन्ना है। यहां इसकी तीन खबरों का उल्लेख है। पहली, बांग्लादेश ने प्रधानमंत्री रहमान की भारत यात्रा के लिए सख्त शर्तें रखीं। दूसरी, निर्माण में चूक के कारण साकेत में भवन गिरा। तीसरी, चार महीनों में उत्तर प्रदेश के जज ने 22 लोगों को मौत की सजा सुनाई।
टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने की एक और खबर राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। कल मैंने बताया था कि, 29 फरवरी 2024 को केंद्र सरकार ने देश में ‘इण्डिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के तहत टाटा समूह के दो बड़े सेमीकंडक्टर प्लांट को मंजूरी दी। इन प्रोजेक्ट्स की कुल लागत में 50% हिस्सेदारी के तहत केंद्र सरकार ने टाटा ग्रुप के लिए लगभग ₹44,203 करोड़ की सरकारी सहायता/सबसिडी स्वीकृत की। अप्रैल 2024 में टाटा ग्रुप की कंपनी ने भारतीय जनता पार्टी को ₹757 करोड़ से ₹758 करोड़ का चंदा दिया था। आज खबर छपी है कि एन चंद्रशेखर के टाटा समूह के चेयरमैन पद से अलग होने की घोषणा से पहले उन्होंने और नोएल टाटा ने अलग-अलग इस टकराव पर सरकार को खबर दी थी। इसमें सरकार की भूमिका के बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता है लेकिन टाटा समूह में जो कुछ चल रहा है वह राजनीति से अलग नहीं भी हो सकता है। ये सारी खबरें आज दूसरे अखबारों में भी है। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रस्तुति या चुनाव प्रशंसनीय है। हालांकि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के भारत आने की शर्तें द हिन्दू की आज की लीड है। इसके अलावा आज जो राजनीतिक लगने वाली खबरें महत्वपूर्ण हैं उनमें देशबन्धु की लीड, बंगाल में सीजेपी के कार्यकर्ता के पिता की पिटाई से मौत – डबल इंजन वाले राज्यों में कानून व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिशोध की स्थिति हो सकती है। नवोदय टाइम्स की लीड बताती है कि सरकार संवाद तो नहीं ही करती है जो संवाद के लिए दिल्ली आना चाहे उसे भी रोका जाता है और यह तरीका जारी है। शीर्षक है, हरियाणा का खनौरी बॉर्डर सील किसानों को दिल्ली आने से रोका। कंक्रीट के अवरोधक, कंटीले तार और दंगा नियंत्रण वाहन तैनात। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, सरकार का किसान विरोधी चेहरा सामने आया : डल्लेवाल।
अंग्रेजी अखबारों में आज दि एशियन एज की लीड की चर्चा अभी तक नहीं हुई है। यह उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए भाजपा की तैयारियों के संबंध में है। इसके अनुसार, आंतरिक सर्वेक्षण से पता चला है कि राज्य में नाखुश वोटर हैं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता बनी हुई है, महिलाएं खास वोट बैंक हैं और जेन जी को प्रभावित करने के लिए पार्टी उनतक पहुंचने की योजना बना रही है। मुख्य शीर्षक है, एंटी-इनकमबेंसी का प्रभाव खत्म करने के लिए भाजपा उत्तर प्रदेश में 80 विधायकों को छोड़ सकती है यानी उन्हें टिकट नहीं देगी। यह चुनाव जीतने के भाजपाई तरीकों में एक है। भाजपा के मामले में अब इन तरीकों का असर शायद ही हो लेकिन भाजपा हर संभव तरीके अपनाती है ताकि चुनाव आयोग और उसके अनिल मसीहों की सेवा कामयाब रहे तो कहा जा सके कि फलां दांव या चाणक्य नीति का लाभ मिला है। विपक्ष को चुनाव लड़ना ही नहीं आता है और मोदी जी महान हैं इसलिए चुनाव जीत जाते हैं। इस क्रम में यह भी अटकल चल रही है कि भाजपा दिल्ली, बिहार और महाराष्ट्र की तरह इस बार भी नकद ट्रांसफर करने की योजना का घोषणा कर सकती है। पहले वे इसे रेवड़ी बांटना कहते थे। हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की सेकेंड लीड एक नई खबर है। इसकी भी अभी तक चर्चा नहीं हुई है। इस खबर के अनुसार जनगणना की शुरुआत आज होगी। इसके अनुसार दूसरे चरण की तैयारियां हो चुकी हैं। इंडियन एक्सप्रेस की लीड वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन के इंटरव्यू की खबर है। उन्होंने कहा है और इंडियन एक्सप्रेस ने पांच कॉलम में छापा है, महज डिग्री बाजार के लिए तैयार नहीं करती है, यह एक सुधार है जिसकी हमें आवश्यकता है। आप जानते हैं कि यह न तो कोई नई बात है और न रॉकेट साइंस। रोजगार के मौके बनाने का वादा करते सत्ता में आए नरेन्द्र मोदी जब कुछ कर नहीं पाए (या किया ही नहीं) तो बहाने बनाते हुए पकौड़े बेचने को भी रोजगार कह दिया और बेरोजगारी का कारण आबादी से लेकर कौशल विकास की जरूरत आदि को बताते रहे जैसे पहले उन्हें यह सब पता ही नहीं था। मीडिया नैरेटिव सेट करता रहा और सरकार मनमानी करती रही।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना केंद्र सरकार की ऐसी ही एक प्रमुख योजना है। इसका घोषित उद्देश्य देश के युवाओं को उद्योग से जुड़े कौशल की मुफ्त ट्रेनिंग और प्रमाण पत्र देना है ताकि वे रोजगार या स्व-रोजगार प्राप्त कर सकें। इसके तहत ट्रेनिंग पूरी करने पर छात्रों को नकद प्रोत्साहन राशि और वित्तीय सहायता सीधे खातों में भेजी जाती थी। इस योजना का पहला चरण जुलाई 2015 में शुरू हुआ था। इसके बाद दूसरा चरण 2016–2020 में तथा तीसरा 2021–2022 में चला। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक’ (सीएजी) ने संसद में अपनी ऑडिट रिपोर्ट दिसंबर 2025 में पेश की। रिपोर्ट में 2015 से 2022 के बीच लगभग ₹12,000 से ₹14,000 करोड़ के बजट निष्पादन में बड़े पैमाने पर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं का खुलासा हुआ। लाभार्थी तो सीधे लाभ (डीबीटी) फर्जी बैंक खाते में भेजे गए और तमाम दूसरी अनियमितताएं पाई गईं। 94% से 95% लाभार्थियों के रिकॉर्ड में अमान्य या फर्जी बैंक विवरण थे। 12,000 से अधिक एक जैसे बैंक खातों का इस्तेमाल 52,000 से ज्यादा अभ्यर्थियों के लिए बार-बार किया गया। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे मामले में समयबद्ध स्वतंत्र जांच और जवाबदेही तय करने की मांग की है। लेकिन कोई खबर नहीं है। अब यह प्रचार या अगले चरण की तैयारी हो सकती है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


