NDTV की पूर्व पत्रकार माया शर्मा ने भारतीय टेलीविजन न्यूज के बदलते स्वरूप और न्यूज चैनलों की मौजूदा शैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। द स्क्रॉल में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में लोग टीवी न्यूज देखना छोड़ चुके हैं। उनके मुताबिक, टीवी न्यूज में बढ़ता शोर, सनसनी, एंकरों का चीखना-चिल्लाना और हर खबर को ‘Breaking News’ के तौर पर पेश करने की प्रवृत्ति दर्शकों को इससे दूर कर रही है।
माया शर्मा ने अपने लेख में बताया कि अपने करियर के शुरुआती वर्षों में जब उनका परिचय ‘NDTV की माया’ के तौर पर कराया जाता था तो लोग चैनल और उसके पत्रकारों को सम्मान की नजर से देखते थे। लोग उनके कार्यक्रमों और खबरों का जिक्र करते थे। वह बताती हैं कि उस दौर में प्राइवेट टीवी न्यूज के शुरुआती वर्षों में न्यूज चैनलों को लेकर लोगों के बीच काफी भरोसा और सम्मान था।
लेकिन समय के साथ टीवी न्यूज का स्वरूप बदलता गया। माया शर्मा के मुताबिक, एक समय ऐसा आया जब कुछ लोग यह बताने लगे कि वे NDTV नहीं देखते, बल्कि किसी दूसरे चैनल को देखते हैं। बाद के वर्षों में यह बात राजनीतिक पसंद-नापसंद से जुड़ गई। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों के लिए NDTV को ‘एंटी-नेशनल’ या सरकार विरोधी चैनल मानना एक राजनीतिक बयान जैसा हो गया था।
माया शर्मा ने लिखा कि सोशल मीडिया पर उन्होंने ऐसे दावे भी पढ़े कि NDTV में काम करने वाले पत्रकारों को वेटिकन या कांग्रेस से पैसे मिलते हैं। उनके मुताबिक, उनसे कई बार यह भी पूछा गया कि NDTV बीजेपी विरोधी क्यों है।
हालांकि, उनके अनुसार हाल के वर्षों में स्थिति और बदल गई है। अब टीवी न्यूज की चर्चा होने पर सबसे आम प्रतिक्रिया होती है- ‘मैं अब टीवी न्यूज नहीं देखता।’ उन्होंने कहा कि देश और दुनिया की खबरों में रुचि रखने वाले बहुत से लोग अब टीवी न्यूज से पूरी तरह दूरी बना चुके हैं।
माया शर्मा ने खुद का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने करियर का बड़ा हिस्सा टीवी न्यूज में बिताया और लंबे समय तक पेशेवर जरूरत के साथ-साथ एक दर्शक के तौर पर भी न्यूज चैनल देखा। लेकिन अब वह रोजाना टीवी न्यूज नहीं देखतीं। उनके मुताबिक, वह केवल बड़े लाइव इवेंट के दौरान टीवी न्यूज देखती हैं, जैसे चंद्रयान की लैंडिंग, संसद में महत्वपूर्ण बहस या राष्ट्रीय संकट और उत्सव के समय प्रधानमंत्री का संबोधन।
उन्होंने टीवी न्यूज की मौजूदा प्रस्तुति शैली को लेकर कहा कि आज लगभग हर घटना ‘Breaking News’ बन गई है। स्क्रीन पर लगातार चलते टिकर, फ्लैशिंग कैप्शन, विज्ञापन और बीच में तेज आवाज में बोलते एंकर दिखाई देते हैं। उनके मुताबिक, न्यूज में एक तरह का ‘manufactured excitement’ यानी कृत्रिम उत्साह, सनसनी, हाइप और गुस्सा पैदा किया जाता है।
माया शर्मा का कहना है कि खबरों की विषयवस्तु अपने आप में तनावपूर्ण हो सकती है क्योंकि पत्रकारिता में युद्ध, अपराध और राजनीतिक घटनाओं जैसी खबरें शामिल होती हैं, लेकिन उन्हें शांत और पेशेवर तरीके से भी प्रस्तुत किया जा सकता है। उनके अनुसार, पहले न्यूज पढ़ने और प्रस्तुत करने का अंदाज अधिक संयमित था, लेकिन अब वह शैली काफी हद तक गायब हो गई है।
उन्होंने पूर्व दूरदर्शन न्यूज एंकर रिनी साइमन खन्ना का भी जिक्र किया। रिनी के मुताबिक, वह आज भारतीय टीवी न्यूज नहीं देखतीं और खबरों के लिए अलग-अलग न्यूज प्लेटफॉर्म और अखबारों का इस्तेमाल करती हैं। बहुत कम मौकों पर लाइव बुलेटिन देखती हैं और वह भी मुख्य रूप से BBC या CNN। उन्होंने भारतीय टीवी न्यूज को ‘शोरगुल वाला, विस्फोटक, तनावपूर्ण और गैर-तथ्यात्मक’ बताया।
इसी तरह भारतीय टीवी न्यूज की शुरुआती पत्रकारों में शामिल जेनिफर अरुल ने कहा कि कुछ चैनलों पर मिनट-दर-मिनट खबरें उपलब्ध कराना उन्हें पसंद है, लेकिन फेक न्यूज, बढ़ा-चढ़ाकर की जाने वाली टिप्पणियों और जरूरत से ज्यादा उत्साहित रिपोर्टरों को लेकर उन्हें चिंता है। उन्होंने एंकरों के रवैये में अधिक शालीनता और विनम्रता की जरूरत बताई।
अमेरिका में रहने वाली पूर्व दूरदर्शन पत्रकार हैमंती भट्टाचार्य ने भी भारतीय टीवी न्यूज को लेकर अपनी परेशानी साझा की। उनके मुताबिक, भारत आने पर टीवी न्यूज देखना उन्हें ‘overwhelming’ लगता है। उन्होंने कहा कि एंकर दर्शकों पर चिल्लाते नजर आते हैं और स्क्रीन के नीचे लगातार ‘Breaking News’ की पट्टी चलती रहती है।
पूर्व दूरदर्शन रिपोर्टर डॉ. शोभा शरद राजगोपाल ने भी कहा कि पुराने दौर में पत्रकारों को जो पेशेवर प्रशिक्षण और प्रस्तुति की बारीकियां सिखाई जाती थीं, वह अब कई जगह दिखाई नहीं देतीं। उनके मुताबिक, कई टीवी डिबेट अब बातचीत के बजाय ‘शाउटिंग मैच’ में बदल गई हैं, जिसमें मेहमानों को अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने का मौका तक नहीं मिलता।
लेखिका और शिक्षाविद् पल्लवी अय्यर ने टीवी न्यूज को ‘sensory overload’ बताते हुए कहा कि स्क्रीन पर एक साथ बहुत कुछ चलता रहता है- टिकर, फ्लैश और लगातार ‘Breaking News’। उनके मुताबिक, इससे दर्शक में एड्रेनालिन तो बढ़ता है, लेकिन खबर की वास्तविक जानकारी समझ में नहीं आती। उन्होंने मौजूदा टीवी न्यूज की तुलना टीवी सीरियल जैसी मेलोड्रामैटिक प्रस्तुति से भी की।
माया शर्मा ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसे न्यूज बुलेटिन का लक्ष्य दर्शक कौन हैं? क्या न्यूज चैनल खुद को उस जनता के गुस्से की आवाज मानते हैं, जिसे वे नाराज मानते हैं? क्या दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए लगातार ऊंची आवाज में बोलना जरूरी हो गया है? और क्या विपक्ष या सरकार की आलोचना करने वालों को दबा देना ही टीवी न्यूज में ‘लॉयल्टी’ दिखाने का तरीका बन गया है?
अपने लेख में माया शर्मा ने पत्रकारिता के पुराने दौर की एक मिसाल भी दी। 1991 के चुनावों से पहले NDTV ने अपने रिपोर्टरों को राजनेताओं के इंटरव्यू के लिए एक सलाह दी थी। इसमें कहा गया था कि उद्देश्य बहस या लड़ाई करना नहीं, बल्कि चर्चा के जरिए मुद्दों को स्पष्ट करना होना चाहिए। रिपोर्टरों को कठिन सवाल भी सबसे विनम्र तरीके से पूछने की सलाह दी गई थी- ‘Bold and questioning but never rude.’
माया शर्मा के लेख का मूल सवाल यही है कि अगर टीवी न्यूज दर्शकों को सूचित करने के बजाय उन्हें लगातार उत्तेजित, तनावग्रस्त और भ्रमित करने लगे, तो लोग उससे दूरी क्यों न बनाएं? उनके मुताबिक, टीवी न्यूज का स्वरूप बदल रहा है, लेकिन भरोसेमंद पत्रकारिता के लिए तथ्य, संयम, निष्पक्षता और स्पष्टता आज भी उतने ही जरूरी हैं।
एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार माया शर्मा “गुड न्यूज बैड न्यूज- अ लाइफ इन टेलीविजन” नामक किताब भी लिख चुकी हैं।


