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इंडियन एक्सप्रेस हिंदी का यह शो लल्लनटॉप के ‘नेतानगरी’ को कड़ी टक्कर दे रहा है?

Split YouTube thumbnail pair: left image shows a man in a yellow shirt gesturing with large white Hindi text about GDP and RSS; right image features Narendra Modi and other speakers with the numbers 7.8 or 2.6 and a Hindi headline about GDP impact.

अरविंद चोटिया-

कल शुक्रवार था। द लल्लनटॉप और इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के स्टूडियो में नेता नगरी और साम, दाम, दंड, भेद के नए शो रिकॉर्ड हो रहे होंगे। इस वक्त अगर हम पिछले सप्ताह के शोज़ की परफॉर्मेंस चेक करेंगे तो कह सकते हैं कि साम, दाम, दंड, भेद ने नेता नगरी को पछाड़ दिया है।

अगर व्यूज़ एक पैमाना है तो सिर्फ तीन सप्ताह पहले शुरू हुए साम, दाम, दंड, भेद ने इस पूरे सप्ताह में कुल 2.60 लाख व्यूज हासिल किए हैं जबकि द लल्लनटॉप का नेता नगरी शो पूरे सप्ताह में सिर्फ 2.13 लाख पर आकर अटक गया है। तब, जबकि इस बार दोनों ने ही मुख्य विषय जीडीपी को रखा है। अन्य विषय में साम, दाम, दंड भेद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुस्लिम प्लान और नेता नगरी में राहुल गांधी की राजनीति को रखा गया है। यहां यह भी गौर करने लायक है कि लल्लनटॉप और इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के सब्सक्राइबर बेस में जमीन और आसमान का अंतर आज भी है।

जीडीपी पर डिस्कशन के लिए सौरभ द्विवेदी फाइनेंशियल एक्सप्रेस के संपादक श्यामल दासगुप्ता समेत पी वैद्यनाथ और केरल से उदित मिश्रा को लेकर आए जिन्होंने बड़ा ही सार्थक और गंभीर डिस्कशन किया वहीं नेता नगरी में कुलदीप मिश्र ने एक बड़ा प्रयास अन्य विशेषज्ञों के अलावा स्वयं पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव सुभाष गर्ग को लाने का किया, जिनके एक बयान के कारण हमारी जीडीपी ग्रोथ रेट सबसे ज्यादा चर्चा में है।

इस बार लल्लनटॉप के पैनलिस्ट के बीच परंपरागत चुहलबाज़ी गायब थी। हालांकि कुलदीप ने कहीं कहीं हंसने के मौके दिए वहीं इंडियन एक्सप्रेस पर प्रिंट मीडिया के पैनलिस्ट की जो गहराई है, वो फिर देखने को मिली। या तो प्रिंट की यह गहराई ही दर्शकों को आकर्षित कर रही है, या सौरभ का प्रस्तुतीकरण दर्शक पसंद करते हैं या फिर दर्शकों को कुछ नया चाहिए होता है, ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता लेकिन यह कहा जा सकता है कि नेता नगरी के सामने एक बड़ी और मजबूत चुनौती आ खड़ी हुई है। इसमें क्या नयापन लाकर इसे फिर से आगे रखा जा सकता है, यह लल्लनटॉप को सोचना होगा। कमी तो वहां भी कुछ नहीं है। हां, सुबह नौ बजे से पहले अपलोड करना थोड़ा फायदा दे सकता है।


“नेता नगरी” को “साम, दाम, दंड, भेद” ने कड़ी टक्कर दे दी है

भाई साहब आप मुझे टोक सकते हैं कि आखिर दो यूट्यूब चैनलों के प्रोग्राम की ऐसी समीक्षा की आखिर क्या जरूरत है? तो मेरा जवाब साफ है कि आजकल लोग इन चैनलों को देखते हैं, इन पर चर्चा करते हैं और इनसे प्रभावित भी होते हैं। फिर, राजनीति में भारतीयों की रुचि के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। लोग ज्यादा से ज्यादा राजनीति के बारे में जानना चाहते हैं। एक अजीब सी भूख मैंने लोगों में देखी है। और मैं ऐसे प्रोग्राम नियमित रूप से देखता हूं। इसे आप समीक्षा समझें या टिप्पणी समझें लेकिन जो मैं महसूस कर रहा हूं, वह मुझे लिखना चाहिए। यह किसी को जज करने का विषय नहीं है। यै मेरे अपने विचार हैं। ख़ैर।

तो बात यह है कि लल्लन टॉप पर वर्षों से चल रहे वीकली पॉलिटिकल शो नेता नगरी के जैसा दूसरा कोई भी प्रोग्राम अल्टरनेटिव मीडिया पर उपलब्ध नहीं था। मैं खुद एक बार इस शो में शामिल हुआ, तब से मुझे यह देखने की आदत लग गई थी। सौरभ द्विवेदी इसे नियमित रूप से प्रस्तुत किया करते थे। लल्लनटॉप से निकलकर सौरभ द्विवेदी इंडियन एक्सप्रेस हिंदी में गए और 2 सप्ताह पहले उन्होंने वहां साम, दाम, दंड, भेद नाम से वीकली पॉलिटिकल शो शुरू किया है। उनका पहला शो हालांकि उतना प्रभावी नहीं था लेकिन दूसरे वो ने अच्छी छाप छोड़ी है। इसे समुचित तौर पर प्रचारित भी किया है और लोगों का ध्यान भी खींचा है।

Two men sit at a studio desk on a Hindi TV talk show, with cups and glasses on the table and a red logo backdrop behind them.
Television broadcast screenshot: a man in orange robes sits at a desk with microphones; a panelist in a suit appears in a side frame; Hindi caption at bottom asks 'Which BJP voter is upset?'; Lallantop logo top right.

मैं 29 सितंबर अगस्त 2026 को प्रसारित शो के बारे में आज बात कर रहा हूं। नेता नगरी करीब डेढ़ घंटे की अवधि का था। एक दिन पहले ही आए इंडिया टुडे ग्रुप के मूड ऑफ द नेशन सर्वे पर पूरा शो केंद्रित रहा। शुरुआत के साढ़े 17 मिनट राजदीप सरदेसाई और हिमांशु मिश्रा की चुहल में चले गए जिससे दर्शकों को उतनी गुदगुदी नहीं हो पाई जितनी कभी सौरभ और राजदीप के बीच होने वाली चुहलबाज़ी में हुआ करती थी। शेष समय में सर्वे का ही विश्लेषण किया गया। थंबनेल “यूपी में बीजेपी के लिए खतरे की घंटी, गेम फंसा” रखने से यह शो कुछ हद तक बिक गया और इसे सप्ताह भर में 606 हजार व्यूज मिले हैं। जो इन दिनों में नेता नगरी के किसी भी शो पर आए अच्छे व्यूज माने जा सकते हैं। बाकी वहीं फॉर्मेट, वही मेहमान। वैसे ही बातें। सिद्धांत मोहन ने प्रस्तुत बहुत अच्छे से किया।

साम, दाम, दंड, भेद में इस बार सौरभ ने कमाल कर दिया है। ढाई घंटे का यह शो तृप्त करने वाला था। मेहमानों का चयन देखिए। नीरजा चौधरी, विकास पाठक और श्यामलाल यादव। सभी प्रिंट के दिग्गज। तीनों के नॉलेज का लेवल सच में देखने और प्रभावित करने वाला था। संघ, भाजपा, कांग्रेस, आरक्षण आदि को काफी विस्तार से डिस्कस किया गया और हर लाइन में दर्शक के लिए कुछ ना कुछ टेक अवे जरूर था। अरुण जेटली और बीपी मंडल को बड़ी तबीयत से याद किया गया। उनके कम सुन गए किस्से सुनने को मिले। जो किताबों की चर्चा की गई, उस पर सोशल मीडिया पर लोगों ने अलग से भी काफी कुछ लिखा है।

इस शो में अभी तक बाहरी विशेषज्ञों को ज़ूम के जरिए नहीं जोड़ा गया है लेकिन सौरभ ने बताया कि वे अगले शो से यह भी करने वाले हैं तो जरूर कुछ और अच्छे लोग भी इसमें जुड़ेंगे, ऐसी उम्मीद है। सप्ताह भर में इस शो को 5 लाख व्यूज मिले हैं। जो मेरे हिसाब से काफी बड़ी उपलब्धि है। हालांकि लल्लनटॉप और इंडियन एक्सप्रेस हिंदी के बीच प्रतिद्वंद्विता तो होगी ही लेकिन कोई 36 का आंकड़ा नहीं होगा। हां, दोनों के सब्सक्राइबर बेस में 36 गुना से ज्यादा का अंतर जरूर है। लल्लनटॉप जहां 35 मिलियन सब्सक्राइबर के साथ सच में टॉप पर ही है वही इंडियन एक्सप्रेस हिंदी अभी अपने पहले मिलियन सब्सक्राइबर बेस को छूने के लिए संघर्ष कर रहा है।

मैं समझता हूं कि कंपटीशन के जमाने में दर्शक हमेशा जीत में रहते हैं। अपने-अपने शो को बेहतर करने के लिए दोनों ही प्रयास करेंगे। मेरी ओर से दोनों टीमों को शुभकामनाएं

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