देवेंद्र सुर्जन-
इंदौर की पत्रकारिता पर श्रवण गर्ग की खरी-खरी…. ‘अखबार अब मॉल और शॉप हो गए हैं’
किताब उत्सव के दौरान ‘हिन्दी पत्रकारिता और इंदौर’ पर श्रवण गर्ग से पत्रकार जयश्री पिंगले की बातचीत
इंदौर में चल रहे राजकमल प्रकाशन के किताब उत्सव में वरिष्ठ पत्रकार Shravan Garg श्रवण गर्ग ने ‘इन्दौर और हिन्दी पत्रकारिता’ के बारे में कहा कि अखबार अब मॉल गए हैं शॉप हो गए हैं। वहां बार्टर सिस्टम चल रहा है। कोई अखबार बिकता है तो उसमें उसका पत्रकार भी चला जाता है! जैसे दूध उत्पादकों के बच्चे कुपोषित रह जाते हैं वैसा ही इन्दौर की पत्रकारिता का है। यहॉँ का सारा दूध बाहर चला गया। राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, वेद प्रताप वैदिक बाहर चले गए। अंग्रेजों के जमाने में भी अंग्रेजों के खिलाफ लिखने के लिए माखनलाल जी ने अखबार निकाला तो वह खंडवा से!
श्रवण गर्ग ने कहा कि इंदौर का कोई मां- बाप नहीं बचा है. वैसे ही यहां की पत्रकारिता का भी कोई मां-बाप नहीं बचा। लोगों ने छपे हुए पर यकीन करना बंद कर दिया है। अखबारों की हैसियत अब उठावने की सूचना देने तक सीमित रह गई। नकली शराब बिकती है, बांध टूटते हैं, बिल्डिंग गिरती है, लोगों की मौत होती है लेकिन हम वह सब देखना नहीं चाहते! धृतराष्ट्र तो दृष्टिहीन थे, पर हम गांधारी की तरह हो गए हैं। पहले अखबार ओपिनियन सेट करते थे, लेकिन अब वह बात नहीं है।
श्रवण गर्ग ने कहा कि अब तो नेता लोग भी इन्फ्लुएंर्स खरीद रहे हैं। मेरे संपादक रहते किसी मैनेजर की हिम्मत नहीं होती थी कि वह मेरे केबिन में घुस जाए। रमेश अग्रवाल ने घाटे में अखबार निकाला। मध्य प्रदेश में घाटा उठाया, राजस्थान में कुछ घाटा उठाया और गुजरात में नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते हुए घाटा उठाया। लेकिन अब अखबारों का जनरेशन भी चेंज हो गया है। अब वह रेवेन्यू मॉडल आ गए हैं। संपादकों तक के टारगेट फिक्स हो गए हैं। मैंने नई दुनिया छोड़ी ही इसीलिए कि मैंने जिला संवाददाताओं को टारगेट देने को मना कर दिया था। आज तब डरे हुए हैं।
आदित्य पांडेय-
मार कर मर्सिया पढ़ने वाले…

राजकमल प्रकाशन के मजमे में एक सत्र पत्रकारिता का भी रहा और इसमें मुख्य वक्ता बतौर गर्ग साहब ने पत्रकारिता के लिए मर्सिया पढ़ा। पहले तो कह दिया कि पत्रकारिता ही खत्म हो गई है फिर अपने बयान को “डाइल्यूट” किया और कहा कि “द हिंदू” में पत्रकारिता हो रही है, “इंडियन एक्सप्रेस” में कुछ हद तक है और “द स्टेट्समैन” में भी झलक दिख जाती है। बाकी जगह पत्रकारिता खत्म हो गई है। जाहिर है इसमें उनका पाला पोसा भास्कर भी है जिसे वे नहीं गिन रहे हैं। उनके चयन से आप समझ सकते हैं कि क्या और कैसे लिखा जाए तो उसे साहब पत्रकारिता के खांचे में सही मानेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे उनके भास्कर के (समूह) संपादक रहते मैनेजर केबिन में घुसने की हिम्मत तक नहीं करते थे, कोई पूछे कि आपके कमरे में घुसने की जरूरत ही किसको थी?
जब मैनेजर्स के लिए एक अलग समानांतर व्यवस्था हो तो संपादक से उनको बात करने की जरूरत ही कहां रही और यह भी कि आपके केबिन में तो संपादकीय के साथी भी आना पसंद नहीं करते थे। सत्र में इस बात का भी स्यापा रहा कि अब संपादकों को टारगेट दिए जाते हैं यानी टारगेट जर्नलिज्म से परेशानी है लेकिन आप खुद तो ऐसे टारगेट के बड़े निशानची रहे हैं। बड़े बड़े नामों को निशाने पर लेकर ठिकाने लगाने की बात हो या भास्कर की चमक से हटाए जाने के बाद नईदुनिया में पत्रकारों की नौकरियां छीनने का टारगेट पूरा करने का मामला।
यह दुख जताना अपनी जगह है कि इंदौर सहित पूरे देश में पत्रकारिता खत्म हो गई है और इस काम में अपनी भूमिका को ईमानदारी से देखना सरासर दूसरा मामला है। साहब आपके डर, आतंक और आपकी निशानेबाज़ी के कितने लोग सीधे शिकार हुए और कितने बीपी,दिल या मानसिक संत्रास के, इसका हिसाब लगाना तक मुश्किल है। वैसे यह भी बता देना बेहतर होगा कि जिन मालिकों को आप आज स्वतंत्रता से लिखने देने के लिए धन्यवाद दे रहे हैं उन्हें पूरे न्यूजरूम ने आपकी “त्वरित टिप्पणी” और “विशेष संपादकीय” पर भड़कते सुना है क्योंकि यह अभिषेक सार्वजनिक तौर पर किया गया था।
आप एक बड़े अखबार को जिस “एक्सट्रीम लेफ्ट” पर ले जाने की कोशिश में थे वह लेफ्ट में तो अब भी है लेकिन “सेंटर टु लेफ्ट” रहना चाहता है। वैसे उम्मीद है कि अब खुद को पत्रकारिता का अंतिम पुरोधा मानने वाले पूर्व समूह संपादक किसी दिन हमें गांधीवाद का चूरन बेचते हुए लंगोटी पहने अपनी संपत्तियाँ किसी गांधी ट्रस्ट के नाम करते नजर आएंगे।


