पंकज शुक्ला-
न्यूज़ चैनलों पर जो भी हो रहा है, उससे अक्षय कुमार बहुत दुखी रहते हैं। वह कहते हैं, “आप न्यूज़ चैनल कोई खोलो तो आपको सब जगह कोई समस्या ही नज़र आएगी। लेकिन कोई न्यूज़ चैनल ऐसा नहीं है जो बोलता हो कि हल ये है। मैं कहता हूं कि कोई एक ऐसा चैनल खोलो, ‘सॉल्यूशन चैनल’, मेरी बात मानिए, वह बहुत चलेगा।”
आज 59 साल के हो चले अभिनेता अक्षय कुमार की गिनती हिंदी सिनेमा के उन सितारों में होती रही है जो बिना किसी फ़िल्मी पृष्ठभूमि के आए और अपना एक अलग दर्शक वर्ग तैयार करने में सफल रहे। अक्षय कहते हैं कि फ़िल्मों में वह पैसा कमाने आए थे लेकिन लगातार काम करते रहने ने उनके भीतर बेहतर अभिनय की भूख पैदा की और इसी के चलते वह निर्माता बने। नायिकाओँ के नाम पर वह अब भी कुछ बोलते नहीं, बस चुप्पी साध जाते हैं।
तीन दशक के सिनेमाई सफर में आए अहम पड़ावों, जीवन में सुख के मायनों और कई दूसरे सवालों के जवाब अक्षय कुमार ने इस एक्सक्लूसिव बातचीत में अपने घर पर दिए थे। साथ साझा की गई फ़ोटो अक्षय कुमार की ही खींची हुई है।
अक्षय कुमार का फ़िल्मी सफ़र फ़िल्म ‘सौगंध’ से साल 1991 में शुरू हुआ। ये पूछे जाने पर कि इस सफ़र में ऐसे कौन से निर्देशक रहे हैं, जिनके नाम वह अपनी इस सफल यात्रा को याद करते ही अपनी आँखों के सामने पाते हैं? अक्षय सबसे पहले तो निर्देशक चंद्र प्रकाश द्विवेदी का नाम लेते हैं, जिनके साथ वह उन दिनों फ़िल्म ‘पृथ्वीराज’ और ‘राम सेतु’ कर रहे थे।
फिर वह कहते हैं, “कॉमेडी में अगर मुझे कोई लेकर आया तो वह हैं प्रियदर्शन। (प्रियदर्शन की अगली हिंदी फ़िल्म ‘हैवान’ में अक्षय विलेन बने हैं!) राजकुमार संतोषी ने भी मुझे यहां तक पहुंचने में मदद की और और एक लेखक थे, उनका भी बहुत बड़ा हाथ रहा है। वह अब नहीं रहे हमारे बीच। उनका नाम है नीरज वोरा। इसके अलावा एक फ़िल्म मैंने की थी ‘संघर्ष’ जो तनूजा चंद्रा ने निर्देशित की थी। उसके बाद एक और फ़िल्म थी मेरी जिसने मेरे करियर को काफी बदला वह थी सुनील दर्शन की फ़िल्म ‘जानवर’। ये कुछ ऐसी फ़िल्में है जिसकी वजह से मैं काफी बदलता गया।”
ये पूछ जाने पर कि फ़िल्मों में आने का जो आपका मक़सद था, उसके कितने करीब पहुंच चुके हैं अक्षय? वह बहुत साफ़गोई से कहते हैं, “मैं आपको सच बताऊं तो मैं इस इंडस्ट्री में पैसे कमाने के लिए आया था। फिर जब आहिस्ता आहिस्ता मैं फ़िल्में करता गया तो इसने मुझे बदलना शुरू किया और फिर इस सफ़र ने मेरे भीतर फ़िल्मों को लेकर जुनून पैदा कर दिया। फिर पैसे कमाने की बात नहीं रही। फिर ये बात आ गई कि अब मुझे सिनेमा करना है। मुझे बदलाव के वे सारे दिन याद हैं। किरदारों को लेकर जोखिम लेना। अंदर से आवाज आती थी कि अलग अलग किस्म के किरदार करने हैं। लेकिन, तब मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं अपनी पसंद की फ़िल्में खुद बना सकूं। उन दिनों तो जो काम मुझे मिलता था मैं करता गया। फिर आगे जाके ज़िंदगी में थोड़े बहुत पैसे आए। मैंने अपनी खुद की कंपनी शुरू की और फिर ‘स्पेशल 26’, ‘बेबी’, ‘एयरलिफ्ट’, ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ जैसी फ़िल्में बनानी शुरू कीं। उसके बाद भगवान ने चाहा तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”
अक्षय मानते हैं कि उनकी ‘पृथ्वीराज’, ‘रामसेतु’ और ‘रक्षाबंधन’ जैसी भारतीय संस्कृति को दर्शाने वाली फ़िल्में आज के दौर के लिए बहुत जरूरी हैं। वह कहते हैं, “बहुत ज़रूरी है देश को अपना इतिहास बताना। मैं आपको बताता हूं ये जो ‘रामसेतु’ फ़िल्म है ये हमारी संस्कृति के लिए, हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत ज़रूरी फ़िल्म है। ये हमारे इतिहास के बारे में इतनी सारी सच सच कथाएं बताती हैं कि मैं भी ख़ुद हैरान हो गया। यह असल कहानी है। मैं खुद हैरान हो गया कि ऐसी घटना हुई है।”
इसी बात पर मैंने उनसे थोड़ा असहज सवाल पूछा। मेरा सवाल था कि हमें अभी तक जो पढ़ाया गया इतिहास में, क्या वह किसी एक खास नजरिये से ही पढ़ाया गया? अक्षय थोड़ा विचलित होते हैं, फिर कहते हैं, “देखिए मेरे हिसाब से देयर इज समथिंग कॉल्ड व्हाई क्राई ऑन स्पिल्ड मिल्क..एक बार दूध गिर गया तो उसे छोड़ दो। अब वह क्यों कराया गया, कैसे कराया गया? वो भगवान जानता है। अभी इस सब के आगे क्या? इसका हल क्या है? समस्या के बारे में तो सब बात कर लेंगे। आप न्यूज़ कोई खोलो तो आपको सब जगह कोई समस्या ही नज़र आएगी। लेकिन कोई न्यूज़ चैनल ऐसा नहीं है जो बोलता हो कि हल ये है। मैं कहता हूं कि कोई एक ऐसा चैनल खोलो, ‘सॉल्यूशन चैनल’, मेरी बात मानिए, वह बहुत चलेगा।”
और, क्या कभी अक्षय के मन में निर्देशक बनने का ख़्याल नहीं आया? “मैं ज़िंदगी में फ़िल्म निर्देशक नहीं बनना चाहता क्योंकि मैं खुश रहना चाहता हूं। मैं देखता हूं कि एक निर्देशक एक फ़िल्म में पूरा साल, डेढ़ साल लगा रहता है। मेरा जो फोकस एरिया है इसमें एक फ़िल्म के लिए मैं छह महीने से ज़्यादा नहीं दे सकता। मुझे एक फ़िल्म खत्म करके अगली फ़िल्म पर जाना होता है। लेकिन, निर्देशक का एक नज़रिया होता है। फ़िल्म बनने से पहले वह समय लगाता है। फिर फ़िल्म बनाता है। फिर उसके पोस्ट प्रोडक्शन में व्यस्त रहता है। फिर बेचारा रिलीज़ पर आता है। इतने समय तक वह एक ही फ़िल्म जी रहा है।” अक्षय ऐसे जवाब देते हैं, जैसे कि इस सवाल का इंतज़ार कर ही कर रहे थे।
और आख़िरी सवाल। ख़ुश रहने की या कहें कि सुख की परिभाषा अक्षय कुमार के लिए क्या है? वह बताते हैं, “सच बताऊं तो सुख मुझे घर पर बैठ के मिलता है। आप देख रहे है ये मेरा ऑफ़िस है और ऑफ़िस के नीचे ही मेरा घर है। ये जो यहां बालकनी से दिख रहा है। ऐसा लगता है कहीं मुंबई आपको? मैं मुंबई में रह कर भी प्रकृति के नजदीक हूं। सुख मुझे मिलता है हर शाम अपनी बेटी के साथ ‘विष अमृत’खेलने में। असली सुख है, अपनी सेहत का ध्यान रखना और इस काबिल रहना कि आप अपनी बेटी के साथ पकड़ा पकड़ी वाले खेल खेल सकें। आपके पैरों में इतनी जान बनी रहे। ये ना सुनने मिले, ‘डैडी यू कान्ट रन’ (डैडी, आप दौड़ नहीं सकते)।”


