नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के कथित तौर पर लत लगाने वाले डिजाइन फीचर्स को नियंत्रित करने के लिए क्या केंद्र सरकार किसी नीति पर विचार कर रही है, इस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है। कोर्ट ने सरकार से खास तौर पर पर्सनलाइज्ड फीड, ऑटोप्ले, लगातार स्क्रॉल होते रहने वाले फीचर और यूजर एंगेजमेंट बढ़ाने वाले नोटिफिकेशन जैसे फीचर्स को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
बार एंड बेंच के मुताबिक, जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस अमित शर्मा की खंडपीठ BML मुंजाल यूनिवर्सिटी के लॉ प्रोफेसर विकास कथूरिया की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में ऐसे फीचर्स के बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कथित प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है।
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने केंद्र की ओर से कहा कि मामला सरकार की नीति से जुड़े सवालों से संबंधित है। उन्होंने सुझाव दिया कि याचिका को सरकार के सामने एक अभ्यावेदन के तौर पर लिया जा सकता है, ताकि संबंधित विभाग इस पर विचार कर सके।
कोर्ट ने सवाल किया कि क्या वह सरकार को किसी निश्चित समयसीमा के भीतर नीति बनाने का निर्देश दे सकती है। इसके बाद पीठ ने केंद्र के वकील से अगली सुनवाई में यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या सरकार इस मुद्दे पर किसी तरह की नीतिगत पहल पर विचार कर रही है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी।
याचिका में सोशल मीडिया के कई ऐसे फीचर्स पर सवाल उठाए गए हैं, जिनमें अनंत तक स्क्रॉल करने की सुविधा, ऑटोप्ले, एल्गोरिदम आधारित पर्सनलाइज्ड फीड, नोटिफिकेशन और ‘लाइक’ जैसे एंगेजमेंट इंडिकेटर शामिल हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन फीचर्स को यूजर का ध्यान ज्यादा समय तक बनाए रखने और बार-बार प्लेटफॉर्म पर वापस लाने के लिए डिजाइन किया जाता है।
याचिका में कहा गया है कि इनका अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों और युवाओं को विशेष रूप से प्रभावित कर सकता है। याचिकाकर्ता ने ऐसे डिजाइन फीचर्स का अध्ययन करने और उनके कथित प्रभावों से निपटने के उपाय सुझाने के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने की मांग की है। इसके अलावा इन फीचर्स पर प्रतिबंध या नियमन और प्रभावित यूजर्स के लिए मानसिक स्वास्थ्य राहत कोष बनाने की मांग भी की गई है।
याचिका में Meta, Google, Telegram, X और Snapchat से कथित नुकसान के लिए मुआवजे की मांग भी की गई है। हालांकि, इन आरोपों और याचिका में मांगी गई राहत पर अभी कोर्ट ने कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
केंद्र ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोशल मीडिया के लिए देश में पूरी तरह नियमन का अभाव नहीं है। केंद्र की ओर से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और उससे जुड़े नियमों के साथ-साथ डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन व्यवस्था का भी हवाला दिया गया। हालांकि, केंद्र ने मौजूदा सोशल मीडिया नियमन और किसी ऐप के खास डिजाइन फीचर्स को नियंत्रित करने के सवाल को अलग-अलग बताया।
केंद्र की ओर से यह भी संकेत दिया गया कि ऐप के इस्तेमाल की सीमा तय करने जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है। वहीं कोर्ट ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत का एक बड़ा हिस्सा सरकार के नीतिगत क्षेत्र से जुड़ा दिखाई देता है और याचिकाकर्ता से उन कानूनी प्रावधानों की जानकारी देने को कहा, जिनके तहत ऐसे निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि मामला केवल सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री का नहीं है, बल्कि उन उत्पादों के डिजाइन का भी है जो कथित तौर पर यूजर्स को ज्यादा समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए तैयार किए जाते हैं।
याचिका में अमेरिका में Meta से जुड़े मुकदमों का भी हवाला दिया गया, जहां पर्सनलाइज्ड सिफारिशों और यूजर एंगेजमेंट बढ़ाने वाले डिजाइन फीचर्स तथा युवा यूजर्स पर उनके संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि व्यापक नीतिगत राहत के लिए याचिकाकर्ता को सरकार या सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ सकता है। हालांकि, फिलहाल कोर्ट ने केंद्र को यह स्पष्ट करने का मौका दिया है कि क्या वह सोशल मीडिया के इन कथित लत लगाने वाले फीचर्स को लेकर किसी नीति पर विचार कर रहा है।


