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टाटा संस को अपने उद्योगपति मित्रों के हाथों कब्जा कराना चाहती है क्या मोदी सरकार?

टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने गुरुवार को टाटा संस के बोर्ड के सामने एक प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत शापूरजी पल्लोनजी (एसपी) ग्रुप को टाटा संस में अपनी हिस्सेदारी का एक हिस्सा बेचने की अनुमति दी जा सकती है। खास बात यह है कि इसके लिए टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने की जरूरत नहीं होगी।

बोर्ड बैठक में रखे गए प्रस्ताव के मुताबिक, एसपी ग्रुप करीब 25,000 करोड़ रुपये मूल्य के टाटा संस के शेयर वापस कंपनी को बेचकर अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा भुना सकता है। शेयरों की यह खरीद 18 महीने में दो चरणों में किए जाने का प्रस्ताव है।

प्रस्ताव के अनुसार, शेयरों की कीमत का निर्धारण आयकर नियमों के तहत तय उचित मूल्य (Fair Value) के आधार पर किया जाएगा।

नोएल टाटा ने बायबैक के लिए जरूरी रकम जुटाने के कई विकल्प भी सुझाए हैं। इनमें टाटा संस के आंतरिक नकदी प्रवाह का इस्तेमाल, कंपनी के पास मौजूद सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों की बिक्री, कुछ नए कारोबारों में बाहरी निवेशकों को शामिल कर उन्हें बाद में सूचीबद्ध करना और कुछ व्यवसायों की बिक्री जैसे विकल्प शामिल हैं।

इसके अलावा, नोएल टाटा ने राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) के जरिए चुनिंदा पूंजी कटौती की प्रक्रिया अपनाने का भी सुझाव दिया है। उन्होंने बोर्ड से इस दिशा में जरूरी कदम उठाने को कहा है।

यह प्रस्ताव नोएल टाटा, टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन और एसपी ग्रुप के चेयरमैन शापूर मिस्त्री के बीच पहले हुई बैठकों और चर्चाओं के बाद सामने आया है।

टाटा कंपनियों के शेयरों में तेजी

इधर, टाटा संस के बोर्ड द्वारा एन. चंद्रशेखरन को कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर पांच साल का नया कार्यकाल दिए जाने की मंजूरी के बाद गुरुवार को टाटा समूह की प्रमुख कंपनियों के शेयरों में तेजी देखने को मिली।

टाटा इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन और टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स के शेयर करीब 4.5 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए। वहीं टाटा मोटर्स का शेयर 2.8 प्रतिशत चढ़ा।

आईटी कंपनी TCS का शेयर कारोबार के दौरान 3.4 प्रतिशत तक चढ़ गया था, हालांकि बाद में इसकी बढ़त लगभग पूरी तरह खत्म हो गई और शेयर करीब 0.05 प्रतिशत की मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ।


जब आपके पास भरपूर पैसे हैं. आपको कर्ज़ नहीं चाहिए. आपको शेयर बेचकर पैसे भी नहीं जुटाना. इसके बावजूद सरकार की जबरदस्ती है कि आप शेयर बेचो. टाटा को इस फेर में फंसाकर ग्रुप हड़पने की साज़िश हो रही है. एक पार्टनर sp ग्रुप आर्थिक संकट में है. उसके पास 18.4% शेयर है. कंपनी का नियम कहता है कि शेयर बेचोगे तो पहले टाटा को. अब ये शेयर बाहर के कुछ लोग हथियाना चाहते हैं. टाटा ग्रुप में एंट्री का ये मार्ग है. अब शेयर मार्केट में जा सकते हैं तो इन शेयरों तक बाहर वालों (अडानी, अंबानी) को पहुंचने का मौका मिलेगा. सेबी के नियम कहते हैं की 25% शेयर मार्केट में उतारने पड़ेंगे. 25% फ्री फ्लोट हो गया. 18.4% SP ग्रुप के. मतलब कंपनी के 43% तो बाहर ही हो गए. इसमें वैसे कई अड़चनें हैं लेकिन उन्हें सरकार दूर करने के तरीके जानती है. टाटा ट्रस्ट 66% का मालिक है. उसके एक भाग SRTT की वोटिंग पावर को भी सरकारी कमीशन ने अटका दिया है. इस खेल में ग्रुप के अंदर के कई लोग भी हैं. ऐसे लोग जिन्होंने कंपनी को घाटे पर घाटे दिये हैं. देखो आगे क्या होता है.
-गिरिजेश वशिष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार


सवालटाटा संस को अपने उद्योगपति मित्रों के हाथों कब्जा कराना चाहती है क्या मोदी सरकार?

जवाब- मोदी सरकार के बारे में यह बात कहना अभी जल्दबाजी होगी। बशर्ते, मामले में अभी जो तथ्य सामने हैं, वे ज्यादा जटिल हैं:

11 सितंबर 2026 को RBI ने Tata Sons की उस अर्जी को खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी ने Core Investment Company के रूप में अपनी स्थिति से बाहर निकलने की मांग की थी। इससे Tata Sons पर RBI के नियमों के तहत सार्वजनिक सूचीबद्धता की दिशा में आगे बढ़ने का दबाव आया।

इसके बाद SP Group, जो Tata Sons में करीब 18.4% हिस्सेदारी रखता है, ने अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को Tata Sons को ही बेचकर करीब ₹25,000 करोड़ जुटाने का प्रस्ताव दिया।

नोएल टाटा ने 17 सितंबर को यह प्रस्ताव Tata Sons के बोर्ड के सामने रखा। प्रस्ताव में दो चरणों में 18 महीने के भीतर शेयर खरीदने और NCLT के जरिए selective capital reduction का रास्ता सुझाया गया है।

दूसरी तरफ, SP Group ने 18 सितंबर को संभावित Tata Sons listing का समर्थन भी किया है। यानी SP Group की प्राथमिक चिंता अपनी Tata Sons हिस्सेदारी को monetise करना है; उसे केवल किसी निजी कारोबारी को Tata Sons सौंपने के रूप में देखना अभी उपलब्ध तथ्यों से समर्थित नहीं है।

Tata Sons में Tata Trusts की करीब 66% हिस्सेदारी है, इसलिए किसी बाहरी कारोबारी समूह का सीधे “कब्जा” कर लेना मौजूदा शेयरहोल्डिंग संरचना से स्वतः संभव नहीं दिखता।
असली सवाल कहां है?

राजनीतिक और कारोबारी तौर पर ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि RBI का Tata Sons को लिस्टिंग की ओर धकेलने वाला फैसला क्यों आया और इससे आगे चलकर Tata Sons की ownership और governance structure पर क्या असर पड़ेगा।

कुछ विश्लेषकों ने RBI के फैसले के पीछे सरकार की भूमिका होने का अनुमान लगाया है, लेकिन यह एक विश्लेषण/आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं। उदाहरण के लिए Financial Times में एक पूर्व Tata executive से जुड़े विश्लेषण के आधार पर ऐसा दावा प्रकाशित हुआ है कि इतना बड़ा फैसला सरकार की अनौपचारिक सहमति के बिना होना मुश्किल हो सकता है। इसे प्रमाणित सरकारी नीति के रूप में नहीं पेश किया जा सकता।

इसलिए अभी सबसे सटीक सवाल यह होगा:

“Tata Sons की अनिवार्य लिस्टिंग के पीछे सरकार की क्या भूमिका है, और इससे Tata समूह की भविष्य की ownership और governance किस तरह बदल सकती है?”

यह सवाल उपलब्ध घटनाक्रम के आधार पर जांचने योग्य है; लेकिन “मोदी सरकार टाटा संस को अपने उद्योगपति मित्रों के हाथों कब्जा कराना चाहती है” कहना फिलहाल उपलब्ध प्रमाणों से आगे निकल जाना होगा।

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