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अनिल कुमार की तानाशाही के चलते एनडीटीवी से अलविदा!

वर्षों तक खबरों को जमीन से उठाकर NDTV तक पहुंचाने वाले कई स्ट्रिंगर्स अब बाहर, भुगतान में कटौती के दावों ने बढ़ाई चिंता

Screenshot of a WhatsApp chat with a header 'NDTV MPCG web Link a...', showing messages with emojis, a 'Today' divider, and a long Hindi message excerpt.

एनडीटीवी के लिए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के कई जिलों में वर्षों से संस्थान के लिए काम कर रहे स्ट्रिंगर्स को अब बाहर का रास्ता दिखाया गया है। जिन लोगों ने अपनी जवानी के कई साल किसी मीडिया संस्थान के नाम कर दिए, संस्थान की खबरों को गांव-कस्बों और जिला मुख्यालयों से जमीन पर उतरकर कवर किया, उनके लिए अचानक आगे का रास्ता क्या है?

मध्य प्रदेश में करीब दो दशक तक एनडीटीवी के लिए काम करने वाले एक स्ट्रिंगर को भी अब संस्थान से अलग किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे कई अन्य मीडिया कर्मियों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जो लंबे समय तक संस्थान से जुड़े रहे। इन लोगों के लिए यह सिर्फ नौकरी या काम छूटने का मामला नहीं है, बल्कि वर्षों में बनाई गई पेशेवर पहचान और भरोसे के टूटने का सवाल भी है।

स्ट्रिंगर्स किसी भी क्षेत्रीय मीडिया नेटवर्क की जमीनी ताकत होते हैं। वे जिला मुख्यालय से लेकर गांवों तक खबरों की तलाश करते हैं, मौके पर पहुंचते हैं, वीडियो और तस्वीरें जुटाते हैं और फिर उन्हें बड़े मीडिया संस्थान तक पहुंचाते हैं।

लेकिन प्रभावित कर्मियों की ओर से उठाए जा रहे सवाल का केंद्र यही है कि जब सालों तक उनकी मेहनत संस्थान के काम आई, तो मुश्किल दौर में संस्थान की जिम्मेदारी उनके प्रति कितनी है? कई स्ट्रिंगर्स के लिए संस्थान से जुड़ाव उनकी पेशेवर पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ऐसे में अचानक काम खत्म होने से उनके सामने रोजी-रोटी के साथ-साथ भविष्य की अनिश्चितता भी खड़ी हो गई है।

‘बिल के बारे में मत पूछिए…’

सिर्फ काम से हटाए जाने की बात ही नहीं, बल्कि स्ट्रिंगर्स के भुगतान में कथित कटौती का मुद्दा भी सामने आया है। राजस्थान के एक जिला मुख्यालय पर लंबे समय से काम कर रहे एक सहयोगी के हवाले से दावा किया गया है कि मौजूदा भुगतान बेहद कम है। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि बिल के बारे में पूछने में भी शर्म आ रही है। फिर बताया कि करीब 2,000 रुपये का बिल बना है।

सवाल यह है कि एक जिला मुख्यालय पर लगातार कवरेज करने वाले पत्रकार के लिए बाइक, पेट्रोल, मोबाइल, इंटरनेट और मौके पर आने-जाने के खर्च के बाद इतनी राशि में काम करना कितना व्यावहारिक है?

टीकमगढ़ के स्ट्रिंगर ने जताई नाराजगी

टीकमगढ़ से एनडीटीवी के लिए काम करने वाले सूर्यप्रकाश गोस्वामी ने ग्रुप में अपने संदेश में लिखा कि अनिल कुमार की तानाशाही के चलते एनडीटीवी से अलविदा। उन्होंने साथियों के प्यार और स्नेह के लिए धन्यवाद दिया और डेस्क के सहयोगियों का आभार जताया। इसके बाद उन्होंने ग्रुप छोड़ दिया।

यह संदेश भले ही एक व्यक्ति की पीड़ा हो, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा है। क्या जिला स्तर पर काम करने वाले स्ट्रिंगर्स के श्रम और उनकी जरूरतों का मूल्यांकन उस अनुपात में हो रहा है, जितना उनसे अपेक्षित काम लिया जाता है?

जिस स्ट्रिंगर ने वर्षों तक खबर के लिए धूप, बारिश और जोखिम झेला, उसके हिस्से में आखिर कितना कुछ आया? और सबसे बड़ा सवाल अगर किसी संस्थान के लिए दो दशक काम करने के बाद भी एक स्ट्रिंगर का भविष्य सुरक्षित नहीं है, तो मीडिया में लंबे समय तक काम करने की कीमत आखिर कौन तय करेगा?

एक मीडिया कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित!

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