पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने 1 अक्टूबर 2026 के चुनाव आयोग के पत्र को आधार बनाकर कहा है कि SIR में नाम कटे मतदाताओं से फॉर्म-6 भरवाना अपराध है। रवीश कुमार ने गांधी जयंती पर इसी को कोट करते हुए आयोग पर लगातार झूठ बोलने का आरोप लगाया।
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दिल्ली, 2 अक्टूबर: चुनाव आयोग के 1 अक्टूबर के निर्देश पर विवाद बढ़ गया है। आयोग ने SIR के बाद बची हुई और पहली बार वोट डालने वाली आबादी के नामांकन के लिए विशेष अभियान का आदेश दिया है। इसमें पहले सूची में रहे, अब नाम कटे लोगों को भी फॉर्म-6 से दोबारा दर्ज कराने को कहा गया है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त डॉ. एस.वाई. कुरैशी का कहना है कि यह फॉर्म सिर्फ नए मतदाताओं के लिए है। नाम कटे व्यक्ति से यह भरवाना झूठा घोषणा-पत्र है, जिस पर एक साल तक की सजा हो सकती है। जो अधिकारी ऐसा करवा रहे हैं, वे अपराध में सहायता कर रहे हैं।
कुरैशी ने आयोग के पत्र की तस्वीरें लगाकर लिखा: “Form 6 can’t be filled by a deleted voter. It’s only for NEW voters. All those who have been forced to fill it have committed criminal offence carrying 1 yr prison. EC officials who forced them are abetters to crime. This press note shows ECI’s abetment!”
पत्र संख्या 23/2025/ERS(Vol-II), दिनांक 1 अक्टूबर 2026, अवर सचिव संदीप कुमार के हस्ताक्षर से सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजा गया है। विषय है: SIR पूरा होने के बाद छूटे और पहली बार/युवा मतदाताओं के नामांकन का विशेष अभियान। पत्र 29 सितंबर के पत्र और 1 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ हुई बैठक का हवाला देता है।
निर्देश के मुताबिक बूथ लेवल अधिकारी मौजूदा मतदाता सूची की तुलना SIR से पहले की सूची से करेंगे। जिनका नाम पुरानी सूची में था और नई में नहीं, उनकी सूची बनानी है। फिर घर-घर जाकर उनकी स्थिति जाँचनी है और जहाँ व्यक्ति योग्य मिले, वहाँ फॉर्म-6 से नामांकन कराना है। एक BLO को हफ्ते में कम से कम 20–25 ऐसे मतदाता कवर करने हैं, ताकि करीब एक महीने में काम पूरा हो। फॉर्म-6 भर चुके लोगों को सूची में चिह्नित करना है। सूची मान्यता प्राप्त दलों के BLA और ERO को देनी है। रात के शेल्टर, मजदूर कॉलोनियों और हाशिये के लोगों के लिए बूथ कैंप और विशेष कैंप का भी जिक्र है।
यहीं कानूनी आपत्ति है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत मतदाता सूची से जुड़े मामले में जानबूझकर झूठा बयान देने पर एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। फॉर्म-6 में आवेदक को घोषणा करनी होती है कि वह पहली बार नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर रहा है और उसका नाम किसी विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र की सूची में शामिल नहीं है। नाम कटा मतदाता परिभाषा से पहले सूची में था। उससे यह घोषणा भरवाना तथ्यात्मक रूप से गलत बयान बन सकता है। Hindustan Times ने सितंबर में लिखा था कि जुलाई 2026 में ECINet पर फॉर्म-6 के ऑनलाइन संस्करण में नया घोषणा खंड जोड़ा गया था, और आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद बदलाव बना रहा। कुरैशी और पूर्व CEC ओ.पी. रावत ने उस बदलाव पर भी सवाल उठाए थे। रावत ने उसे “absolutely wrong and illegal” कहा था।
रवीश कुमार ने कुरैशी के पोस्ट को कोट करते हुए लिखा: “झूठ उसके बाद झूठ फिर उसके बाद झूठ। ये चाहते हैं कि उनके झूठ में सब शामिल हो जाएंगे और झूठ बन जाएँ। आप जैसे लोग न होते तो क्या होता। आज बापू का जन्मदिन है और हम चर्चा डाकू की कर रहा है।”
SIR का व्यापक विवाद पहले से चल रहा है। कुरैशी इसे बड़े पैमाने पर नाम काटने की प्रक्रिया बताते रहे हैं और कहते रहे हैं कि असली मतदाता का नाम काटना संवैधानिक अधिकार छीनना है। आयोग का रुख रहा है कि संशोधन सूची को दोहराव, मृत्यु और अयोग्य नामों से साफ करने की वैधानिक कवायद है, और छूटे योग्य नागरिकों को दोबारा जुड़ने का मौका दिया जा रहा है। 1 अक्टूबर का पत्र इसी “left-out” नामांकन की भाषा में है। कुरैशी का आरोप है कि जिस माध्यम से यह किया जा रहा है, वही अपराध खड़ा कर रहा है।
अभी तक आयोग की ओर से कुरैशी के इस ताजा आरोप पर सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया है। सवाल अब यह है कि नाम कटे मतदाता को फॉर्म-6 की पहली-बार वाली घोषणा पर दस्तखत कराना नियम के अंदर है, या धारा 31 के दायरे में आता है।


