नई दिल्ली। क्या भारतीय प्रेस परिषद यानी प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) भी अब दिल्ली पुलिस की तरह पत्रकारों को यह बताने लगी है कि उन्हें अपना काम कैसे करना चाहिए? क्या पत्रकारों की सुरक्षा और पत्रकारिता के मानकों के नाम पर जारी किए जा रहे दिशा-निर्देश प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने का रास्ता बन सकते हैं? दिल्ली में प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए प्रेस काउंसिल की ओर से जारी नए दिशा-निर्देशों के बाद ऐसे सवाल उठने लगे हैं।
दिलचस्प यह है कि दिल्ली पुलिस ने 5 अक्टूबर को प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले पत्रकारों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसके बाद प्रेस काउंसिल ने भी 15 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शनों और धरना-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए। ये दिशा-निर्देश ऐसे समय में आए हैं, जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन की कवरेज करने पहुंचे कई पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार के आरोप सामने आए हैं।
प्रेस काउंसिल ने पत्रकारों को अपने संस्थान या संबंधित सरकारी एजेंसियों से जारी पहचान पत्र साथ रखने और उसे सामने प्रदर्शित करने की सलाह दी है। पत्रकारों से प्रदर्शनों में पक्ष नहीं लेने, प्रदर्शनकारियों और पुलिस से दूरी बनाए रखने, पुलिस के वैध निर्देशों का पालन करने और तनावपूर्ण परिस्थितियों में संयम बरतने को कहा गया है। साथ ही, पुलिस की रणनीतिक गतिविधियों या उसकी स्थिति से जुड़ी ऐसी जानकारियों का सीधा प्रसारण नहीं करने की सलाह दी गई है, जिनसे सुरक्षा संबंधी जोखिम पैदा हो सकता है।
सवाल यह है कि जब पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान हिरासत में लिए जाने, उनके कैमरे और दूसरे उपकरणों को जब्त किए जाने तथा महिला पत्रकारों के साथ कथित यौन दुर्व्यवहार के आरोप सामने आए, तब प्रेस काउंसिल की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए थी? क्या उसे पहले पत्रकारों के अधिकारों के उल्लंघन के आरोपों पर जवाबदेही तय करने और स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने के उनके अधिकार की रक्षा पर जोर नहीं देना चाहिए था?
प्रेस काउंसिल का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना और समाचार पत्रों तथा समाचार एजेंसियों के मानकों को बनाए रखना है। वह एक वैधानिक और स्वायत्त संस्था है। पत्रकारिता के नैतिक मानकों पर सलाह देना उसके दायरे में आता है, लेकिन जब किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठ रहे हों, तब पत्रकारों को ही निर्देश देने वाली भाषा एक अलग बहस खड़ी करती है।
यहां सवाल दिशा-निर्देश जारी करने के अधिकार से ज्यादा उनकी प्राथमिकताओं और भाषा का है। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए सावधानियां बताना एक बात है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि पुलिस पत्रकारों को उनकी रिपोर्टिंग से न रोके, पहचान पत्र दिखाने के बावजूद उन्हें हिरासत में न ले और उनके काम में गैरकानूनी हस्तक्षेप न करे।
प्रेस काउंसिल को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि पत्रकारों से पुलिस के वैध निर्देशों का पालन करने की अपेक्षा के साथ-साथ, पत्रकारों के अधिकारों का उल्लंघन होने पर वह क्या कदम उठाएगी। पुलिस की कार्रवाई और पत्रकारों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल पत्रकारों की नहीं है। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
प्रेस काउंसिल की स्वायत्तता का महत्व इसलिए भी है कि वह प्रेस और सत्ता के बीच एक स्वतंत्र संस्था के रूप में काम करे। यदि उसकी भूमिका पत्रकारिता के मानकों की निगरानी से आगे बढ़कर पत्रकारों को मौके पर काम करने के तरीके बताने तक सीमित दिखाई देने लगे, तो उसकी भूमिका और प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रेस काउंसिल दिल्ली पुलिस के मातहत काम नहीं करती। लेकिन सवाल यह है कि क्या उसके नए दिशा-निर्देश अनजाने में उसी प्रशासनिक सोच को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें पत्रकारों के अधिकारों से पहले पुलिस की सुविधा और व्यवस्था बनाए रखने की चिंता दिखाई देती है? प्रेस की जो स्वायत्तता बची है, उसे बनाए रखने के लिए जरूरी है कि प्रेस काउंसिल पत्रकारों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने के साथ-साथ सत्ता और पुलिस की जवाबदेही तय करने में भी उतनी ही सक्रिय दिखाई दे।
प्रेस कौंसिल क्या दिल्ली पुलिस के मातहत काम करने लगी है? वह दिल्ली पुलिस की तरह वह पत्रकारों को दिशा निर्देश क्यों जारी कर रही है? जो थोड़ी बहुत स्वायत्तता बची थी, वह उसे भी ख़त्म कर देगी।
-मुकेश कुमार

