सुधीर मिश्रा-
नवभारत टाइम्स में आज यह मेरा आख़िरी साप्ताहिक कॉलम है। करीब १४ साल तक मैंने इस कॉलम को लिखा। हर शनिवार छपने वाले इस कॉलम को अख़बार के अलावा हमारे ऑनलाइन और सोशल मीडिया के पाठकों ने भी ख़ूब पढ़ा। आप सब का आभार!
पाँच November तक नवभारत टाइम्स में काम करने के बाद मैं 6 नवंबर 6 टीवी भारत को ग्रुप एडिटर के तौर पर जॉइन करूँगा। हैदराबाद के इस चैनल के डिजिटल प्लेटफॉर्म को लखनऊ और दिल्ली से शुरू किया जा चुका है, टीम काम कर रही है। इसे ही आगे और विस्तार देने की योजना है।
हिंदी में 6tv भारत नाम से और इंग्लिश में ऑनस्पॉट। कोशिश रहेगी तेजी से विभाजित होते समाज के सामने कुछ ऐसी पत्रकारिता की जाये जो लोगों को जोड़े, उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे और जिंदगी को खुशहाल बनाने की पॉजिटिव एनर्जी पैदा करे।
मुझे मालूम है कि इस काम में बहुत मेहनत, समझ और अनुशासन की जरूरत होगी लेकिन आप लोगों का साथ है तो कुछ भी मुश्किल नहीं। आप सब का बहुत बहुत शुक्रिया

प्रांशु मिश्रा-
For Close friend Sudhir Mishra as he gears to reboot, recharge for a new flight.! Wishing him luck and more energy…

खुले मन का मुसाफ़िर। पत्रकारिता ने बहुत से मित्र दिए, सुधीर उन सब में सबसे अलग और ख़ास हैं।
उनकी ही किताब “ मुसाफ़िर हूँ यारों .और उनके लिखे लेखों “खुले मन से “ को जोड़ दें तो बखूबी उनकी शख़्सियत बयाँ होती है.. खुले मन का मुसाफ़िर।
एक ऐसा व्यक्तित्व जो पारदर्शी है , स्पष्ट है, सहज है , जिसमे कोई बनवाटीपन नहीं है।
अब जब सुधीर अपनी नई प्रोफेशनल यात्रा पर उड़ान भरने को तैयार हैं तो ख़ुद को लिखने से रोक नहीं सकता।
पत्रकारिता में सुधीर के शुरुआती एक दशक का तो मैं साक्षी नहीं हूँ लेकिन उसके बाद 2005-06 के क़रीब शायद फ़ील्ड जर्नलिस्ट के तौर पर परिचय हुआ। वह हिंदुस्तान अख़बार में थे और में timesnow न्यूज़ चैनल मैं। एक ही शहर लखनऊ में कभी काम के दौरान तो कभी वीआईपी गेस्ट हाउस डालीबाग़ कॉलोनी में उनके पड़ोसी वरिष्ठ पत्रकार मनोज भद्रा जी की घर पर मुलाकातों के दरमियान परिचय हुआ और फिर घनिष्ठता बढ़ी।
ठीक से याद नहीं लेकिन शायद 2010-11 के क़रीब दैनिक भास्कर अख़बार की खिड़की खुली और सुधीर बतौर संपादक लखनऊ से निकल पड़े अपनी नई उड़ान पर।
मुझे याद है लखनऊ छोड़ कर, परिवार से दूर जाकर कुछ नया करने के उस निर्णायक दौर में हमारे बीच बहुत चर्चा हुई।
सुधीर निकल गए और उसके कुछ दिन बाद जयपुर में हम लोगों की मुलाक़ात हुई। सुधीर ख़ुश थे, नए अख़बार, नई टीम और नए शहरों में अपने पत्रकारीय कौशल से नए सोपान गढ़ रहे थे … भविष्य में आने वाली और बड़ी और महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी के लिए अनजाने में ही ख़ुद को गढ़ रहे थे।
और फिर साल 2013 में वो वक़्त आया जब उनका हुनर उन्हें एक नई बड़ी उड़ान के कॉकपिट में ले आया। इसे दोस्ती कहिए या अटूट भरोसा पर नई ज़िम्मेदारी की आधिकारिक ऐलान के बहुत पहले सुधीर भाई ने कॉल किया और मुझसे नवभारत टाइम्स लखनऊ की री लांचिंग और अपनी नई ज़िम्मेदारी की ख़बर साझा की।
मैं तब भी Times Now में था और ऑफिस उसी पुराने Times of India बिल्डिंग में था। लखनऊ आने पर हमारे टीवी दफ्तर में ही सुधीर का अघोषित कैम्प ऑफिस सा रहा। फर्स्ट फ्लोर पर TOI का दफ्तर था, उसी परिसर मैं NBT का दफ्तर भी बन रहा था और ग्राउंड फ्लोर पर हमारा न्यूज़ चैनल का दफ्तर था।
TV के दफ़्तर में ही सुधीर भाई ने नई टीम के लिए कई इंटरव्यू किए, नामों पर चर्चा हुई, (कई सिफ़ारिशें भी की)
और फिर एनबीटी शुरू हुआ, सुधीर और उनकी टीम ने एक बढ़िया अख़बार लांच किया। मई 2016 तक में Times now में रहा और उस दरमियान तक़रीबन रोज़ का मिलना जुलना और अंतरंगता रही।
उसके आगे अब तक की उनकी प्रोफेशनल यात्रा सबके सामने है, ख़ास बात यह रही कि सुधीर ने कभी दब कर बैटिंग नहीं करी।
प्रोफेशनल जीवन अलग और पर्सनल अपने अंदाज़ में। जीवन खुली किताब सा रहा। कई बार मैंने कहा भी कि सोशल मीडिया पर सब कुछ क्यों पोस्ट करते हैं? जवाब था इस दौर में जो है जैसा है सब खुला होना चाहिए। मन मे कुछ दबा कर नहीं रखना है।
अब सुधीर नई शुरुआत को तैयार हैं, इस यात्रा के बारे में भी काफ़ी पहले वह मुझे बता चुके थे, बस पहले प्लान पर एक्सक्यूशन थोड़ा देर से होना था … जो अब थोड़ा पहले हो गया है।
बतौर पत्रकार/संपादक उनकी यात्रा निश्चय ही आगे भी और सफल होगी, रोमांचक होगी। सुधीर को पत्रकारिता का देवानंद समझिए…गहरे तजरुबे से लबरेज़ सदाबहार और चिरयुवा। इसलिए अभी कई और सुपरहिट देंगे ..
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