आशु भटनागर-
पूर्व राज्यसभा सांसद आर के सिन्हा जी का निधन हो गया। वो लगभग 2 वर्ष से कोमा में थे। मेरे लिए ये सामाजिक शोक से अधिक व्यक्तिगत क्षति है। देर शाम घर पहुंचा तो मेरे पुत्र अथर्व जो अपने बाल्यकाल में उनके साथ पौत्र की भांति खेला है, बोला पापा दादा जी अभी क्यों चले गए मुझे अच्छा नहीं लग रहा। मैंने बस उसे सीने से लगाया और कुछ नहीं कहा, कहता भी क्या?
मुझे पत्रकारिता और राजनीति सिखाने वाले और मेरे लिए सदैव संरक्षक की भांति खड़े रहे आर के सिन्हा जी जैसा सामाजिक व्यक्ति दुबारा ही शायद कोई होगा। वो स्वयं पत्रकार रहे थे, कांग्रेस के आपातकाल के दौर में कांग्रेस के गोदी पत्रकार ना बन पाने और अपने क्रांतिकारी स्वभाव के कारण उन्हें सर्च लाइट अखबार से निकाल दिया गया, आपातकाल में ही उनकी पहली किताब की प्रकाशित ओर मूल प्रतियां भी जलवा दी गई। किंतु उनकी कलम ने समझौता नहीं किया।
पत्रकारिता के साथ ही उन्होंने निजी सुरक्षा कर्मियों का उद्यम SIS भी स्थापित किया जिसमें आज 3 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। वो इस सब के साथ भाजपा नेता श्री मुरली मनोहर जोशी के पीआरओ रहे तो पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेयी और श्री लाल कृष्ण आडवाणी समेत सभी भाजपा और संघ नेताओं से भी जुड़े रहे। डेढ़ दशक पूर्व उन्होंने मुझे पहली मुलाकात में कहा आशु, कायस्थ समाज में बहुत कम लोग बिजनेस में उतरते हैं। बिजनेस का एक सिद्धांत है अपने बिजनेस पर अड़े रहो, पहले एक दशक में कई बार ऐसा लगेगा उसको बंद कर दो किंतु सफल बिजनेस समय मांगता है आपके धैर्य की परीक्षा लेता है, तुम अपने परिवार में पहली पीढ़ी हो जो व्यापार में उतर रहे हो इसलिए पारिवारिक दबाव भी आए तो नौकरी पर स्विच मत करना। उन्होंने मुझे कहा कि 10 वर्षों तक उन्होंने खुद बहुत संघर्ष किया।
मैनपॉवर आधारित कंपनी होने के कारण कई बार ऐसा होता था कि बैंक लोन नहीं देता था, किसी बात पर गार्ड काम से भाग जाता था ऐसे में कोई विकल्प न होने पर वह स्वयं गार्ड बनकर 8 घंटे की नौकरी कर रहे होते थे। 2015 में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुत्रवधू श्रीमती नीरा शास्त्री के साथ एक कार्यक्रम के दौरान लाल बहादुर शास्त्री जी के घर पर शहर के सभी लोगों के जुटने की बात पर उन्होंने आगे बढ़कर कहा कि हर महीने ऐसा एक कार्यक्रम मेरे हुमायूँ रोड स्थित सांसद आवास पर होगा।
1 महीने की लंबी मैराथन बैठक के बाद इसका नाम संगत पंगत रखा गया और इस कार्यक्रम के जरिए कई वर्षों तक तमाम जरूरतमंदों की मदद की गई मेरा सौभाग्य रहा कि इस कार्यक्रम को इनीशिएट करने में वाले लोगों में मैं स्वयं भी शामिल था। संगत पंगत अपने पहले ही एडिशन के साथ एक ऐसा माइलस्टोन बना जिसमें गरीब और अमीर एक प्लेटफार्म पर उपस्थित थे और जरूरतमंद और पीड़ित के लिए कुछ ही देर में आर्थिक सामाजिक और व्यावहारिक समाधान की भूमिका तैयार हो जाती थी। ऐसे ही एक कार्यक्रम के दौरान श्री सिन्हा ने भावविभोर होते हुए कहा कि अब सब कुछ तो मैं ले चुका हूं बस मेरा मन करता है मैं लोगों को मदद करता रहूं।
लोगों की मदद करने के कई उदाहरण मेरे अपने सामने सामने आए तो उनके गृह क्षेत्र पटना और बक्सर के लोगों से मेरी कई मुलाकातों मुझे उनके युवा जीवन के भी ऐसे भी किस्से पता लगे जब उनकी जेब में अगर ₹5000 हुए और किसी नाम से मदद मांगी तो उन्होंने अपनी जेब से ₹3000 निकाल कर दे दिए। पटना बिहार से लेकर दिल्ली नोएडा देहरादून तक ऐसा कौन रहा होगा जो उनके पास पहुंचा और खुश होकर नहीं गया।
पटना के आदि चित्रगुप्त मंदिर के लिए उनका समर्पण और उनका त्याग भी हमेशा अविस्मरणीय रहेगा उस मंदिर के जीर्णोद्धार लिए जीवन भर उन्होंने प्रयास किया और उसमें सफल भी रहे। भगवान चित्रगुप्त को लेकर उन में अगाध श्रद्धा थी, पटना से लेकर मुंबई तक उन्होंने जहां जरूरत हुई भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति स्थापना में अपना सहयोग दिया मेरी जानकारी के अनुसार उन्होंने लगभग 100 से अधिक मंदिरों में भगवान चित्रगुप्त की मूर्ति स्थापित की या करवाने में सहयोग दिया।
2018 में दीपावली से पूर्व ऐसे ही 1 दिन उन्होंने कहा कि आशु तुम पटना आओ उस मंदिर को देखो अब वो कितना अच्छा हो गया है, कितने लोगों से लड़ कर मैंने गंगा की तरफ वाला हिस्सा भी साफ करवा दिया। उनका प्रेम में डूबा आग्रह सुन कर मैं पुनः पटना गया और नौज़र घाट स्थित मंदिर गया और भगवान चित्रगुप्त के पुनः दर्शन किया। वाकई उनके व्यक्तिगत प्रयास से मंदिर प्रांगण सजीव हो चुका था।
फिर कोविड आया कोविड में लोगों ने उनका सेवा भाव का एक और अन्य रूप सामने आया, 2010 में दोनों किडनी बदले जाने के कारण वह देहरादून में स्थित अपने आवास पर रह रहे थे, किंतु लोगों से लगातार ऑनलाइन मीटिंग्स के जरिए संवाद बनाए रहे ओर मदद करते रहे।
2021 में कोविड के समाप्त होने के बाद नोएडा के 93 स्थित आवास पर मैंने उनसे एक मुलाकात में पूछा कि आगे क्या प्लान है, राज्यसभा का कार्यकाल 2020 में समाप्त हो चुका था क्या उसके लिए पुनः प्रयास करेंगे। तब उन्होंने कहा कि वो अपने लिए नहीं पुत्र ऋतुराज सिन्हा के लिए सोच रहे हैं ऋतुराज भारतीय जनता पार्टी में पटना और दिल्ली दोनों की राजनीतिक भूमिका को अच्छे से निभा पा रहे हैं और वह चाहते हैं कि ऋतुराज अपनी मेहनत से भाजपा में शीर्ष तक पहुंचे। मैं बस समाज के पिछड़े कमजोर लोगों की सेवा करना चाहता हूं, भगवान चित्रगुप्त का गुणगान करना चाहता हूं। और वह अपने इस सिद्धांत पर उस दिन तक कायम रहे जब उन्हें 2 वर्ष पूर्व जनवरी की एक रात ब्रेन स्ट्रोक आया।
दुखद ये है कि इस बार वो 2 वर्ष तक लड़े तो परन्तु विधि के लिखे को नहीं बदल सके। आज भले ही उनका शरीर इस नश्वर संसार में नहीं रहेगा किंतु अपने किए गए भलाई के कार्यों से वह हमेशा लाखों लोगों के दिल में बसे रहेंगे। आने वाली पीढ़ी उनको ऐसे महान व्यक्ति के रूप में याद रखेगी जिसमें जाति, धर्म, परिवार से ऊपर उठकर अपने पास आने वाले हर उसे व्यक्ति की मदद की जिसको सच में मदद की जरूरत थी।
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