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पुण्य प्रसून बाजपेयी को नौकरी से निकलवा कर एक पुराना और निजी बदला चुकाया गया है!

Abhishek Srivastava

एबीपी का पुण्‍य-प्रसंग… ABP News के बाकी चेहरों का पता नहीं, लेकिन Punya Prasun Bajpai को नौकरी से निकलवा कर एक पुराना और निजी बदला चुकाया गया है। ठीक वैसे ही जैसे करन थापर के प्रोग्राम में मंत्रियों और भाजपा नेताओं को न जाने का फ़रमान जारी कर के प्रतिशोध लिया गया, जिसका उन्‍होंने अपनी किताब में हाल में खुलासा किया है। हर बात न कही जाती है न लिखी जाती। प्रसून ने कल रात के बाद अब तक कोई ट्वीट नहीं किया है। किसी को कोई विवरण नहीं बताया। कई पत्रकारों के फोन भी नहीं उठाए।

बेशक, वे कुछ साल पहले अपने गुजरात दौरे की कवरेज के प्रिय-अप्रिय प्रसंगों को आज रात याद कर रहे होंगे। हो सकता है नहीं भी। उन्‍होंने टीवी पत्रकारिता में पर्याप्‍त अच्‍छी पारी खेली है। शांति से खेली है। बिना किसी शोर-शराबे, पब्लिसिटी और विक्टिमहुड के खेली है। गोदी में या गोदी से बाहर बैठे-ऐंठे दूसरे चमकते चेहरों की तरह बीते चार वर्षों को सस्‍ती प्रसिद्धि का औजार नहीं बनाया। यह बड़ी बात है। मुझे लगता है उनके पत्रकारीय जीवन का एक अध्‍याय अब पूरा हुआ।

इंतज़ार है वे करन थापर की तर्ज़ पर कब अपनी कलम चलाते हैं और मामले की पुरानी तहों तक हमें ले जाते हैं। मैं जानता हूं यह बेहद मुश्किल काम है। वे थापर की तरह नेहरू खानदान से नहीं आते। लुटियन के पावर ज़ोन में उनकी थापर जैसी उपस्थिति नहीं है, फिर भी उन्‍हें निकाला जाना इस बात का सबूत है कि वे कुछ तो ऐसा कर रहे थे या कभी किए थे जो सत्‍ताशीर्ष की आंख में अब तक चुभ रहा था।

प्रसून का मामला इसलिए भी दिलचस्‍प और जटिल है क्‍योंकि सियासत के दक्षिण और वाम खेमे में उनकी बराबर घुसपैठ है। वे एक पत्रकार के नाते दोनों छोर पर विश्‍वसनीय माने जाते रहे हैं। याद करिए, सबसे पहले प्रसून ने ही प्रवीण तोगडि़या की मोदी-विरोधी किताब और उनके विहिप से निकाले जाने की बात सार्वजनिक की थी। सत्‍ता के लिए उनके अप्रिय होने का एक और आयाम यहां से खुलता है जिस पर किसी की नज़र शायद कम है।

अब एबीपी से अलग किए जाने के बाद मुझे संदेह है कि उनकी वापसी मेनस्‍ट्रीम में हो पाएगी। दूसरा संदेह यह है कि उनके ऊपर दोनों खेमों से डोरे डाले जाएंगे। असली मास्‍टरस्‍ट्रोक का वक्‍त अब आया है कि वे कैसे दोनों खेमों के एजेंडों से बनने वाले चक्रव्‍यूह को भेदकर दूसरे अध्‍याय का आग़ाज़ करते हैं। सुकूनदेह बात ये है कि जो आदमी इतने वर्षों में न केवल फैनहुड के प्रलोभन से बल्कि अपनी बिरादरी के समकक्ष लोगों तक से निजी दूरी बनाए रखते हुए अपना काम चुपचाप करता रहा उसके लिए इतना समर्थन उमड़ कर आया है। कुछ छोटे-बड़े पत्रकार इसे उनके व्‍यक्तित्‍व का एरोगेंस मानते हैं तो क्‍या, असल पैमाना उनका पत्रकारीय काम है और यही वजह है कि आज उन पर बात हो रही है।

सत्‍तातंत्र का निशाना बनने के लिए प्रसूनजी को बधाई। आगे वे जो भी करें, उसकी अनंत शुभकामनाएं।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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https://www.youtube.com/watch?v=0HJqDQm8LqA

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4 Comments

4 Comments

  1. Amit SHUKLA

    August 3, 2018 at 5:20 pm

    Bilkul sahi faisala

  2. Crazy Boy

    August 3, 2018 at 7:03 pm

    किसी भी देश का डिक्टेटर अपनी काली करतूतो को, सामने लाने वाले व्यक्ति हो या पत्रकार को जिन्दा नहीं छोड़ता। सत्ता के नशे में मदांध हो कर स्वयंभू करार दे देता है।
    पुण्य प्रसून ने जो पाली खेली वो बेहद ठोस खेली। गरिमा मय पाली खेल कर वो आज गुमनाम हैं मगर हर शख्स के दिल दिमाग में रात 9 बजने पर बस एक चेहरा सामने आता है और वो है पुण्य प्रसून का।

  3. फ़िरोज़ खान बाग़ी

    August 4, 2018 at 11:15 am

    पुण्य प्रसून को लेकर फालतू में हो हल्ला मचाया जा रहा है । पुण्य प्रसून जैसे आसामी पत्रकारों के पास ढेरों ऑफर हैं। लेकिन यहां हर रोज पत्रकारों को चापलूसी न करने पर निकाला जा रहा है , जिनकी कोई सुध लेने वाला नहीं है । खैर , सबकी अपनी ढपली औऱ अपना राग है । अब देखना ये है की चुनाव के पहले पहले पुण्य प्रसून कहाँ से नई पारी की शुरुआत करते हैं ।

  4. Mukesh Singh

    August 5, 2018 at 3:36 am

    How dark is this Digital India, a common man like me is capable enough to realise.But for the the sake of few penny our media shouldn’t spread hand to the ruling politicians but infact they are too bussy in doing so.Prasoon ji he is voice,eye and ears of millions can’t be crushed under weak signal(governance).

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