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महाराष्ट्र

‘अनुष्का’ का विशेषांक गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र पर केंद्रित

: चर्चा एवं कवि गोष्ठी में कई पत्रकार और साहित्यकार उपस्थित हुए : मुंबई : हिंदी के वरिष्ठ गीतकार डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र पर केंद्रित साहित्यिक पत्रिका ‘अनुष्का’ के विशेषांक पर चर्चा एवं कवि गोष्ठी का आयोजन लोखंडवाला स्थित इंद्रलोक में किया गया. इसमें वरिष्ठ साहित्यकार नंदलाल पाठक, दबंग दुनिया के संपादक अभिलाष अवस्थी, आलोक भट्टाचार्य, सतीश शुक्ला रकीब, कवयित्री पूजाश्री, अर्चना जौहरी, दीप्ति मिश्र, अनुष्का के संपादक रासबिहारी पाण्डेय एवं स्वयं डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र की महत्त्वपूर्ण सहभागिता रही.

: चर्चा एवं कवि गोष्ठी में कई पत्रकार और साहित्यकार उपस्थित हुए : मुंबई : हिंदी के वरिष्ठ गीतकार डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र पर केंद्रित साहित्यिक पत्रिका ‘अनुष्का’ के विशेषांक पर चर्चा एवं कवि गोष्ठी का आयोजन लोखंडवाला स्थित इंद्रलोक में किया गया. इसमें वरिष्ठ साहित्यकार नंदलाल पाठक, दबंग दुनिया के संपादक अभिलाष अवस्थी, आलोक भट्टाचार्य, सतीश शुक्ला रकीब, कवयित्री पूजाश्री, अर्चना जौहरी, दीप्ति मिश्र, अनुष्का के संपादक रासबिहारी पाण्डेय एवं स्वयं डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र की महत्त्वपूर्ण सहभागिता रही.

इस अंक में डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र के व्यक्तित्व कृतित्व पर आधारित लेखों एवं उनके चुनिंदा गीतों के अलावा उनके स्वयं के लिखे कतिपय लेख भी बक़लम खुद स्तंभ के अंतर्गत शामिल किये गये हैं जो लेखक की बहुआयामी रचनाधर्मिता को प्रमाणित करते हैं. छंद के सांचे में ढली कविता का सौंदर्य लेख में उन्होंने कविता में छंदानुशासन पर एक लंबी विवेचना प्रस्तुत किया है. कविता के सौंदर्य को चिरायु रखने में छंद की भूमिका की पड़ताल करते हुये वे लिखते हैं कि जितना समय हिंदी के कवियों ने अपनी अक्षमता को ढंकने के लिये छंद को काव्य से बहिष्कृत करने में लगाया, उतना वे छंद को साधकर कविता लिखने में लगाते तो हिंदी कविता के भंडार को भूसे की बजाय अन्न से भरते, जिससे आनेवाली पीढियां पलतीं.अपने लंबे साक्षात्कार में वे कहते हैं कि गीत कविता की सबसे कठिन विधा है.

कम शब्दों में एक केंद्रीय भाव को तीन चार अंतराओं में समेटने के लिये भावावेश भी चाहिये, शब्द संपदा भी और कहन का नयापन भी.गजल में हर शेर स्वतंत्र होता है इसलिये वहां मन की एकरसता या लेखनी की अविरलता जरूरी नहीं है.हल्दीघाटी के कवि के गांव में शीर्षक संस्मरण में वे हल्दीघाटी,जौहर और जय हनुमान जैसे महाकाव्यों के रचयिता श्यामनारायण पाण्डेय के गांव की यात्रा का वर्णन करते हुये लिखते हैं कि उनके अपने घर में न उनका कोई चित्र टंगा है,न ही उनका कोई महाकाव्य या सम्मान प्रतीक चिन्ह.किसी बड़े युगांतरकारी कवि साहित्यकार के घर में इतना सन्नाटा हो,यह अत्यंत दुखद है.उनके काव्य पाठ्यक्रमों से निकाले जा चुके हैं,यह देश उनके महत्त्व को समझने की सामर्थ्य खो चुका है.   

अनुष्का के संपादक रासबिहारी पाण्डेय ने इस बात पर आक्रोश व्यक्त किया है कि सरकारें साहित्यकारों की सदैव उपेक्षा करती हैं.विभिन्न सरकारी सलाहकार समितियों और राज्यपाल जैसे पदों पर  साहित्यकारों को नहीं नामित किया जाता बल्कि सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं को उपकृत किया जाता है.संपादक ने कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुये लिखा है कि क्या कारण है कि आज तक किसी साहित्यकार को भारत रत्न के योग्य नहीं समझा गया,जबकि सिर्फ एक कालखंड में याद किये जानेवाले खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को न सिर्फ भारत रत्न दिया जाता है बल्कि इसके लिये वर्षों संसद में विवाद भी होता है. ध्यातव्य है कि 2012 में अनुष्का ने हिंदी के वरिष्ठ कथाकार जगदंबा प्रसाद दीक्षित पर भी एक विशेषांक केंद्रित किया था. 

प्राप्ति संपर्क-
अनुष्का,
रसराज प्रकाशन,
शगुन आर्केड
गोरेगांव (पूर्व) मुंबई-55
मोबाइल- 09220270437   

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