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सियासत

मोदीजी, क्यों इतनी लंबी-लंबी फेंकते हो कि समर्थकों के लिए बचाव करना भी मुश्किल हो जाए!

अभी अभी एक विवाद पैदा हुआ कि 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी अपने परिवार के साथ छुट्टियां मनाने आईएनएस विराट पर गये थे। इस विवाद के बढ़ने पर भाजपा के आईटीसेल ने जो प्रमाण सोशल मीडिया मार्केट में पेश किये वो थे अखबारों की कतरनें। इनमें टाइम्स आफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस की कतरने मैंने खुद देखी हैं। इन कतरनों में खास बात ये है कि ये सब ब्लैक एण्ड ह्वाइट हैं।

कोई आश्चर्य की बात नहीं। उस दौर में अखबार श्वेत श्याम ही थे। अखबार रंगीन हुए हैं नब्बे के दशक में आकर। अस्सी के दशक तक भारत में कोई रंगीन अखबार निकलता ही नहीं था। अखबारों पर रंग ही चढ़ा है 95-96 के बाद। इसके बहुत से तकनीकि कारण थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में हुई तकनीकि क्रांति ने अखबारों के लिए संभव बनाया कि वो अखबारों को कम खर्चे में पूरा का पूरा रंगीन बना सकते हैं।

लेकिन दीपक चौरसिया से इंटरव्यू में मोदी जी बता रहे हैं कि 1986 में ही उन्होंने गुजरात में एक डिजिटल कैमरे से फोटो लेकर दिल्ली ईमेल किया था जो अगले दिन अखबार में रंगीन रूप में छपा था। अब ध्यान देने की बात ये है कि ईंमेल का सार्वजनिक प्लेटफार्म पर इस्तेमाल ही 1996 से शुरु हुआ जब सबीर भाटिया ने हॉटमेल बनाया। उसके पहले एओएल वगैरह ईमेल की सुविधा देते थे, लेकिन वह सुविधा भी 90 के बाद शुरु हुई। लेकिन उस वक्त ईमेल से अटैच फाइल भेजना संभव नहीं था। ईमेल में अटैचमेन्ट की सुविधा शुरु हुई इक्कीसवीं सदी में जब जीमेल ने फाइल अटैचमेन्ट के साथ ईमेल भेजना सुगम किया।

ईमेल के साथ अटैचमेन्ट न होने का एक बड़ा कारण था स्टोरेज प्राब्लम। मैंने खुद 1998 में 16 एमबी (जीबी नहीं, एमबी) के कम्प्यूटर पर काम किया था। सिर्फ टाइप करते थे और टाइप करके कन्टेन्ट फ्लापी ड्राइव पर सेव कर लेते थे। हो सकता है 2018-19 वाले को यह बात बहुत असामान्य लगे लेकिन उस वक्त की सच्चाई यही थी। लेकिन इस सच्चाई के उलट मोदी जी ने 1986 में डिजिटल कैमरे से फोटो लेकर, उसे ईमेल में अटैच करके दिल्ली भेद दिया था, और वह रंगीन अखबार में छपा था।

भाई मोदीजी, क्यों इतनी लंबी लंबी फेंकते हो कि समर्थकों के लिए बचाव करना भी नामुमकिन हो जाए!

विस्फोट डॉट कॉम के संस्थापक संजय तिवारी की एफबी वॉल से.

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