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उत्तर प्रदेश

यूपी पुलिस ने योगी पर घटिया आरोप लगाने वाली महिला का वीडियो पूरे देश को दिखवा दिया!


Shishir Soni : मेरे ख्याल से यूपी पुलिस ने एक अनाम पत्रकार को मशहूर बना दिया और योगी को अपने कृत्यों से बदनाम किया। अगर पत्रकार की गिरफ्तारी न होती तो देश के डेढ़ सौ करोड़ की आबादी में से एक लाख लोगों ने भी उस महिला के कहे का वीडियो नहीं देखा था। बात आई गई हो गई होती। लेकिन गिरफ्तारी पर हुए हंगामे और सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद कौतुहलवश देश के लगभग शत प्रतिशत जागरूक लोगों ने वीडियो देखा। कई अहिंदी भाषियों के लिए लोगों ने बताया कि वीडियो को अनूदित भी किया गया। इससे मुख्यमंत्री को सिवाय नुकसान के क्या हासिल हुआ?

इस एपिसोड से पत्रकारों को गाहे बगाहे निशाने पर लेने वाले कर्नाटक, झारखंड और अन्य सूबों के मुख्यमंत्रियों को सबक लेना चाहिए। उस मजिस्ट्रेट को सबक लेना चाहिए जिसने उसे रिमांड पर लेने का गलत आदेश दिया था। किसी ने कुछ गलत लिखा, पढ़ा या दिखाया तो उसे कोर्ट के माध्यम से prosecute करें। कोर्ट सजा मुकरर्र करेगी। पुलिस का घर से उठाना, या गिरफ्तार करना, कानून का मजाक बनाना होगा। इसी को यूपी की भाषा में पुलिसिया गुंडई कहते हैं।


Ajay Setia : प्रशांत कनौजिया नाम के पत्रकार के ट्वीट पर सुप्रीम कोर्ट का रूख मोदी योगी के खिलाफ सोशल मीडिया पर जहर उगलने वाले पत्रकारों के लिए चेतावनी है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत को यह कहते हुए रिहा किया है कि यह हत्या का मामला नहीं है कि तुरंत और इतने लंबे समय के लिए गिरफ्तार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने ट्वीट पर असहमति जताते हुए यह भी कहा कि आप की स्वतंत्रता सिर्फ दूसरें की दहलीज तक है, इसलिए मुकदमा जारी रहेगा। पत्रकारों को तो सोशल मीडिया पर भी जिम्मेदारी का निर्वहन करना चाहिए। पत्रकारीय स्वतंत्रता के नाम पर बिना जांच किए आप किसी के खिलाफ सोशल मीडिया पर कुछ भी नहीं परोस सकते।

प्रशांत कनोजिया, ईशिका सिंह और अनुज शुक्ला ने जो किया वो एक पत्रकार कभी नहीं करेगा। तहक़ीक़ात और सबूत के बिना, दुर्भावना से निजी जीवन पर कीचड़ उछालना पत्रकारिता नही कहा जा सकता। आखिर पत्रकार की कोई जिम्मेदारी है या नहीं। पत्रकारिता किसी पर भी बेसिर पैर के आरोप लगाने और कीचड़ उछालने का लाइसेंस नहीं है। फिर भी राज्य सरकार उनकी गिरफ़्तारी को टाल सकती थी। केस दर्ज किया जाए और अदालत को फैसला करने देना चाहिए कि पत्रकार ने अपनी सीमाओं में रह कर पत्रकारिता की या सीमा लांघी। अगर उस ने सीमा लांघी तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो, लेकिन तुरन्त गिरफ्तारी सत्ता के नशे को दर्शाता है। गिरफ्तारी निश्चित ही आतंकित करने के लिए की गई है, जो सरकार की निरंकुशता है। अगर यह मुख्यमंत्री या उसके अमले के इशारे पर नहीं की गई, तो यह मुख्यमंत्री की चापलूसी के लिए उठाया गया कदम है।

प्रशांत कनोजिया एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं। वह हिन्दू सन्तों के खिलाफ हिंसा की वकालत करते रहे हैं। उनके जिस ट्वीट पर 7500 लाइक आए हैं, वह भी हिंसा फैलाने वाला है। रिसर्च करने पर उनका 3.9.16 का एक ट्वीट सामने आया है, जिसमें उसने सन्तो की हत्या करने की अपील जारी की थी।


Sadhvi Meenu Jain : उन पुलिस अफसरों के खिलाफ क्या कार्यवाही होगी जिन्होंने प्रशांत कन्नौजिया के खिलाफ मनमानी धाराएं लगाकर गिरफ्तारी की? उन मजिस्ट्रेट साहब के खिलाफ क्या कार्यवाही होगी जिन्होंने प्रशान्त को 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश दिया था? इनक सभी के खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए ताकि भविष्य में पुलिस की निरंकुशता और न्यायिक अधिकारियों मनमानी पर अंकुश लगे


Krishna Kant : प्रशांत कनौजिया को कोर्ट ने तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है. उन्हें बधाई. ट्विटर पर कुछ लोग वॉर छेड़े हुए हैं कि बीजेपी नेता और प्रशांत के मामले में कोर्ट रुख अलग-अलग रहा. जिनको प्रशांत के छोड़े जाने से परेशानी है, वे यह नहीं जानते कि एक अदना पत्रकार, एक नेता और एक सीएम की हल्की हरकतों का असर क्या होता है. कोर्ट आपकी तरह भावुक नहीं होता, उसे हर केस की मेरिट पर आदेश देना होता है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश सरकार के लिए यह शर्मनाक फटकार है. लेकिन यह पत्रकारों के लिए भी है कि अपनी आलोचना का स्तर और गरिमा बनाएं रखें.

प्रशांत मेरे करीबी मित्र हैं. उनके कुछ ट्वीट हल्के थे, उस पर मुकदमा चलता रहेगा. लेकिन वे ट्वीट गिरफ्तारी के लायक नहीं थे. उन पर नोटिस दिया जा सकता था. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ठीक ही फटकार लगाई है. लोकतंत्र में जवाबदेही ही किसी को चोर, किसी को चौकीदार बनाती है. सरकार को यह समझना चाहिए. किसी की आलोचना या हल्की टिप्पणी से सरकार ऐसे आहत होने लगेगी तो सरकार भी ट्रोल की श्रेणी में आ जाएगी. एक बेकार के मुद्दे पर तीन प​त्रकारों की गिरफ्तारी तानाशाही नहीं तो और क्या है! जगीशा और प्रशांत को पुन: बधाई!

सौजन्य : फेसबुक

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1 Comment

1 Comment

  1. madan kumar tiwary

    June 12, 2019 at 7:58 pm

    साध्वी मीनू जैन ,कुछ पढ़ती भी हो ?उच्चतम न्यायालय का आदेश पढा है ?तुम्हारी जो यह टिपण्णी है न कि मजिस्ट्रेट के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी ?काफी है तुम्हे कठघरे में खड़ा करने के लिये ह जेल नही होगी लेकिन सजा से भी नही बचोगी ,जैसे वह प्रशांत कनौजिया को हर हाल में सजा होगी,उच्चतम न्यायालय का आदेश फीर से एकबार पढ़ लो।

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