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सुख-दुख

भारत की राजनीति भी जेलर रिज़वी के जेल चलाने के तौर तरीक़ों जैसी हो गयी है

बात समझ ली आपने.. तो देश की राजनीति भी समझ लेंगे…

बात साल 1975 की है. नहीं नहीं ..मेरा जन्म तो उसके बहुत बाद का है लेकिन पिता जी की सुनाई कहानी है. इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, सभी विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया गया। उनमें से एक हमारे पूज्यनीय पिता स्वर्गीय जगत नारायण अवस्थी भी कानपुर जिला कारागार में क़ैद हुए और 19 महीने तक जेल में रहे। अब आते हैं पिता जी की बताई कहानी की तरफ़ …उस ज़माने में M.SC. प्रथम डिवीजन से पास पिताजी की वाकपटुता ज्ञान और हाजिरजवाबी से भरी हुई थी, इसलिए जेल में जाते ही जेलर रिज़वी साहब से दोस्ती हो गयी।

शायद पिता जी को लगा होगा कि लाला अभी बहुत दिन गुजारने हैं जेल में इसलिए जेलर से दोस्ती बनी रहे, ये अच्छा होगा। बहरहाल पिता जी शुरुवात के दिनों की याद करते हुए बताते हैं कि अक्सर जेल में जब भी कोई कैदी लाया जाता था जेलर रिज़वी के सामने उसकी पेशी करवाई जाती थी। नाम, पिता का नाम, अपराध वगैरह जानने के बाद उस कैदी को बैरक में भेज दिया जाता था।

एक बार बिना टिकट के चलने वाले लोगों का 10-15 का एक जत्था जेल में आया। परम्परा के अनुसार क़ैदियों को जेलर के सामने हाज़िरी लगवाने के लिए लाइन से खड़ा किया गया। जेलर रिज़वी और पिता जी साथ में ही बैठे सर्दियों की धूप सेंक रहे थे। बिना टिकट वाले क़ैदियों को लाइन में खड़ा किया गया और पक्का ( जेल का पुराना क़ैदी) एक-एक करके क़ैदियों को जेलर के सामने भेजने लगा। पहला क़ैदी जब आया तो पक्का ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, ऐ अपना नाम और बाप का नाम बोलो, क़ैदी थोड़ा पतला-दुबला क़द काठी का था तो धीरे से अपना और अपने बाप का नाम बोला, इतने में पक्का क़ैदी की तरफ़ बढ़ा और ज़ोरदार तमाचा जड़ा और गाली देते हुए बोला “ अबे साले, क्या कई दिनों से खाना नहीं खाया, तेरे मुँह से आवाज़ क्यों नहीं निकल रही.”

क़ैदी ज़ोरदार तमाचा खाकर सहम गया और तमाचे ने पीछे खड़े क़ैदियों को भी सहमा दिया। अब नंबर दूसरे क़ैदी का था, थोड़ी बहुत सही डीलडौल का क़ैदी आगे बढ़ा तो पक्का ने कहा , अपना और अपने बाप का नाम बताओ, दूसरा क़ैदी पहले के हालात देख चुका था तो उसने चार गुना शक्ति लगाकर ज़ोर से अपना और अपने बाप का नाम जैसे ही बोला, पक्का ने आगे बढ़कर ज़ोरदार तमाचा रसीद कर दिया, पक्का गाली देता हुए बोला “ अबे साले चिल्लाता क्यों हैं, साहब बहरे हैं क्या? पिता जी ने बताया कि शायद ही उनमें से कोई ऐसा होगा जिसने किसी न किसी बात को लेकर पक्का का धप्पड़ न खाया हो।

जब क़ैदियों की पेशी ख़त्म हुई तो पिता जी ने जेलर रिज़वी से पूछा , “ रिज़वी साहब एक बात बताओ, पहले वाले ने धीरे से बोला तो थप्पड़ खाया, दूसरे वाले ने तेज़ से बोला तो थप्पड़ खाया, आख़िर माजरा क्या है।” जेलर रिज़वी पिता जी से मुस्कराते बोला, ‘अवस्थी जी ये जेल है, यहाँ हर आने वाले का स्वागत ऐसे ही होता है, ये मार इसलिए ज़रूरी है कि ये जब तक जेल में रहें तब तक ये क़ैदी ये समझ ही न पायें कि आख़िर करना क्या है, किस बात पर मार पड़ सकती है और किस पर नहीं, ये गणित लगा ही न पायें।’

पिताजी समझ गये, मुस्कराये और उठकर अपनी बैरक की तरफ़ चल दिए।

मित्रों कहानी का सार ये है कि भारत की राजनीति भी जेलर रिज़वी के जेल चलाने के तौर तरीक़ों जैसी हो गयी है। कब क्या सही और कब क्या ग़लत है इसका फ़ैसला ही करना मुश्किल हो गया है। राजनेता किसी अमुक बात पर जो पहले कहते थे, वो अब उसी बात की आलोचना करते हैं, जिसकी आलोचना पहले करते थे, उसे अब सत्य ठहरा रहे हैं। इसे कहते हैं कि भ्रम की स्थिति, वो भी इतनी पैदा कर दो कि जनता सोचने, समझने की शक्ति ही खो दे कि क्या सही है और क्या ग़लत।
मुद्दा असल ये ही है तब कि राजनैतिक व्यवस्था और सोच समझ वैसी ही थी जैसी की आज की सोच है।

विप्लव अवस्थी टीवी पत्रकार हैं.

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