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गुरुकुल मीडिया और एन.के. मीडिया की धंधेबाजी की कहानी

समूचे देश के परिपेक्ष्य में अगर देखा जाए तो राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों की एक लम्बी फेहरिस्त मिलेगी, कुछ वैध तो कई अवैध तरीके से अपना संचालन करते हुए पाए जायेंगे| कई चैनलों ने तो वैध माध्यमों से कार्य करते हुये सफलता की कहानी और इतिहास लिख डाला है, इनमे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों चैनल शामिल हैं| लेकिन जब आप निचले पायदान पर खड़े चैनलों को देखेंगे तो पायेंगे इनमे से अधिकतर चैनलों के संचालन की नींव ही अवैध रूप से खड़ी की गयी है| अवैध संचालन एक संगठित गिरोह की तरह काम करता है, प्रशासन चाहते हुए भी इस पर संगठित अपराध की कोई धारा नहीं लगा सका|

समूचे देश के परिपेक्ष्य में अगर देखा जाए तो राष्ट्रीय और क्षेत्रीय चैनलों की एक लम्बी फेहरिस्त मिलेगी, कुछ वैध तो कई अवैध तरीके से अपना संचालन करते हुए पाए जायेंगे| कई चैनलों ने तो वैध माध्यमों से कार्य करते हुये सफलता की कहानी और इतिहास लिख डाला है, इनमे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों चैनल शामिल हैं| लेकिन जब आप निचले पायदान पर खड़े चैनलों को देखेंगे तो पायेंगे इनमे से अधिकतर चैनलों के संचालन की नींव ही अवैध रूप से खड़ी की गयी है| अवैध संचालन एक संगठित गिरोह की तरह काम करता है, प्रशासन चाहते हुए भी इस पर संगठित अपराध की कोई धारा नहीं लगा सका|

इसी श्रेणी का एक चैनल झारखंड में पिछले तीन साल से संचालित है। इस चैनल के संचालन का जिम्मा लिया है गुरुकुल मीडिया ने जिसने एक सशर्त भागीदारी के तहत 70 प्रतिशत शेयर के साथ एन.के. मीडिया नामक संस्था से करार किया है, जिसके नाम से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लाइसेंस जारी किया है| मंत्रालय के शर्तों की अवहेलना की शुरुआत यहीं से होती है। एन.के. मीडिया के प्रवर्तक भुवनेश्वर स्थित शिक्षा व्यवसाय से जुड़े सज्जन प्रभात रन्जन मल्लिक हैं| मल्लिक साहब इस चैनल को ओडिशा में उड़िया भाषा में चलाते हैं और गुरुकुल मीडिया इसे झारखण्ड में हिंदी भाषा में चलाता है| आर्थिक और संगठित अपराध के तौर पर यदि देखा जाए तो कई अपराध पिछले तीन साल से निरंतर होते चले आ रहे हैं। झारखण्ड सूचना जनसंपर्क विभाग को गलत जानकारी मुहैय्या कराकर ये चैनल पिछले दो वर्षों से विज्ञापन हासिल करता आ रहा है। दरअसल केन्द्रीय संस्था डीएवीपी ने उडिया भाषी चैनल को विज्ञापन दर की स्वीकृति दी थी, उसी स्वीकृति को हिंदी भाषी चैनल का बताकर झारखण्ड सूचना एवम जनसम्पर्क विभाग में विज्ञापन जारी करने हेतु आवेदन दे दिया गया| डीएवीपी द्वारा एन.के मीडिया की मान्यता होने के वाबजूद झारखण्ड सूचना एवं जनसंपर्क विभाग गुरुकुल मीडिया के नाम से भुगतान करता आ रहा है। इसकी इजाज़त सूचना जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों ने बिना किसी छानबीन के दे दी। अब अगर कहीं गलती से इसकी जांच ही गयी तो विभागीय अधिकारी को जवाब ढूँढने से भी नहीं मिलेगा|

पिछले तीन साल से यह संस्था बदस्तूर विज्ञापनों का प्रसारण करता आ रहा है लेकिन आज तक सेवा कर के नाम पर एक पैसा भी जमा नहीं कराया गया, भारतीय सेवा कर अधिनियम के मुताबिक़ हर तीन महीने पर सेवा कर के नाम पर वसूली गई राशि विभाग को जमा करानी पड़ती है| इस संस्था में लगभग एक सौ से ज्यादा कर्मचारी पिछले तीन साल से कार्यरत हैं, इनके वेतन का भुगतान जब भी किया जाता है उसका माध्यम नगद होता है ऐसे में पीएफ़ और ईएसआई कौन सी चिड़िया का नाम है, यहाँ के कर्मचारियों को नहीं मालूम लेकिन पहले दिन से यहाँ उपस्थिति के लिये बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम जरूर काम कर रहा है | ये तो हुए पहले दर्जे के आपराधिक गतिविधियों की कहानी| दूसरे दर्जे में जो अपराध यहाँ हो रहे हैं उसके भुक्तभोगी दिग्गज पत्रकार श्रीकांत प्रत्युष जैसे वरिष्ठ पत्रकार भी हो चुके हैं| श्रीकान्त प्रत्युष ने जब जी मीडिया से नाता तोड़ा तब एक प्रमोटर की सहायता से इस चैनल को बिहार तक ले जाना चाहा लेकिन उनकी इस चाहत ने उस प्रमोटर के डेढ़ करोड़ रुपयों का नुकसान करा दिया जो आज भी गुरुकुल मीडिया के पास बकाया हैं|

श्रीकांत प्रत्युष जैसे कई पत्रकार जिन्होंने इस चैनल को बिहार ले जाना चाहा उन्हें लाखों गंवाने पड़े, ताजा फेहरिस्त के मुताबिक़ बिहार चुनाव से पहले इस चैनल को बिहार ले जाने की कवायद में पटना के एक व्यवसायी वर्ग को तीस लाख रुपया से हाथ धोना पडा | गुरुकुल मीडिया के एक निदेशक नितीश श्रीवास्तव ने जब इन घटनाओं का विरोध करना शुरू किया तो उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, हालांकि कागजी तौर पर आज भी वे निदेशक बने हुए हैं | अगली कड़ी में इसके दुसरे निदेशक कन्हैया तलेजा हैं  जो आज भी अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं लेकिन अपनी व्यावसायिक मजबूरियों की वज़ह से अलग हो पाने में असमर्थ हैं, इन्हें भी कभी-किसी समय बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है |

अब सवाल यह उठता है कि ऐसी क्या वज़ह है जिसके कारण श्रीकांत प्रत्युष जैसे दबंग माने जानेवाले पत्रकार भी इनके आगे कुछ कर पाने में असमर्थ हैं, तो इसकी मुख्य वज़ह है इस चैनल के मुख्य संचालक की धर्मपत्नी झारखण्ड पुलिस में महानिदेशक (अग्नि-शमन एवं होम गार्ड) हैं| जब बेगम भये कोतवाल तो डर काहे का….। इसके आगे की कहानी और भी गन्दी और घिनौनी है। श्रीमान खुद सेवामुक्त आईएएस अधिकारी हैं और ज्रेड़ा जैसी सरकारी संस्था में आर्थिक अपराध में वांछित है, पिछले साल अक्टूबर से मई तक गैर जमानतीय वारन्ट की वज़ह से गायब थे, अदालत ने कुर्की जब्ती का आदेश भी दिया लेकिन झारखण्ड पुलिस उन्हें ढूंढ नहीं पाई, अभी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में केस विचाराधीन है|

कानूनी प्रावधानों के तहत झारखण्ड में हर बहुमंजिली इमारत (रिहाइशी अथवा व्यावसायिक) को अग्नि शमन विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है, ऐसे में आप की ईमारत अग्नि शमन विभाग के शर्तों का पालन यदि नहीं करती है तो चिंता की कोई बात नहीं है, आप इनसे मिलिए, आपका काम हो जाएगा| रांची के पांच सितारा होटल रेडिसन ब्लू, पटाखा व्यवसायी ट्रेड फ्रेंड्स के संचालक सिंघानिया बंधु और प्रतिष्ठित स्कूल टौरीयन वर्ल्ड स्कूल का काम भी इन्होंने ही आसान किया था। आजकल बिल्डरों से इनके अच्छे ताल्लुकात बताये जाते हैं। गाहे-बगाहे कोई बिल्डर यदि बात नहीं मानता है तो आधी रात को इनका नुमाइन्दा उसके घर जाने में भी नहीं हिचकता| आधिकारिक रूप से वसूली एजेंट होने की वज़ह से राज्य अग्निशमन पदाधिकारी इन्हें विभाग में वसूली गयी रकम पहुंचाने हर दुसरे दिन पहुँच जाते हैं | मजे की बात तो ये है की झारखण्ड  मुख्यमंत्री के साथ-साथ पुलिस के आलाधिकारियों को भी इन घटनाओं की विस्तृत जानकारी है, लेकिन बात वही है बेगम भये कोतवाल तो डर काहे का….।

रांची से केके की रिपोर्ट.

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