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सुख-दुख

यशवंत की कोरोना डायरी (1) : साले ये कहीं जिंदा ही न मुझे सिल दें!

यशवंत सिंह-

सुबह के छह-सात के बीच का कोई वक्त रहा होगा. खड़खड़खड़खड़ की तेज आवाज लगातार आ रही थी. इस शोर से आंख खुली. पीपीई किट पहने दो लड़के तेजी से स्ट्रेचर खींचते हुए दौड़ लगा रहे थे. अचानक हम लोगों के रूम नंबर आठ के सामने रुक गए. आपस में बातें करने लगे…

”क्या नंबर बताया था रूम का, आठ या अठारह…. किस रूम में बॉडी पड़ी है, क्या नंबर है, तुम्हें याद है…”

इतना सुनते ही नींद मेरी पूरी तरह टूट गई और मैं घबड़ाकर एकदम से बैठ गया. सोचने लगा- ”साले ये कहीं जिंदा ही न मुझे सिल दें.”

धड़कन मेरी तेज हो चुकी थी. खांसी भी आने लगी. उठा. वाशरूम की तरफ जाने लगा. दोनों लड़के थोड़ी देर आपस में बात कर जाने ही वाले थे कि मुझे देखने लगे. मैंने कहा- ”यार इस कमरे में अभी कोई मुर्दा नहीं हुआ है. अभी हम दोनों जिंदा हैं. अभी यहां मरने में वक्त लगेगा.”

मेरी बात सुनी अनसुनी करके वो दोनों स्ट्रेचर दौड़ाते आगे निकल गए.

वाशरूम से लौटकर बेड पर बैठ गया और पड़ोसी नौजवान को बोला- ”देख भाई रवि, आज तो हम लोग जिंदा ही पीपीई किट में सिलते सिलते बच गए.”

कमजोरी और बुखार के कारण ज्यादा देर तक नहीं बैठ पा रहा था. लेट गया. सोचने लगा….

मान लो अगर मैं मर गया यहां तो ऐसे ही दो लौंडे स्ट्रेचर लेकर दौड़ लगाते आएंगे और सिल कर ले जाएंगे. मेरा ये एप्पल का नया ब्रांडेड फोन अपने पाकेट में डाल लेंगे. घर वाले या तो कुछ पूछेंगे ही नहीं या फिर हिम्मत करके किसी ने फोन के बारे में पूछा तो ये अस्पताल वाले कह देंगे कि संक्रमण न फैले इसलिए पेशेंट का सब कुछ पीपीई किट में बॉडी के साथ सिल दिया गया या मरीज का सामान सब पैक कर जला दिया गया… कुछ भी कह देंगे… मेरा ये लाख रुपये का एप्पल का फोन तो यूं ही चला जाएगा….

मैंने फौरन बेटे को फोन लगाया… सुन भाई मेरा पुराना घटिया वाला एंड्रायड फोन लेते अइहो…

बेटा रोज एक बार खाने पीने के सामान, दवाइयां और अन्य मेरे द्वारा मांगे गए सामानों को लेकर अस्पताल आता. नीचे बैठे गार्ड को मेरा नाम व रूम नंबर की पर्ची झोले में डाल पहुंचाने के लिए दे देता. गार्ड उस झोले को लिफ्ट में रखता. लिफ्ट में बैठा अकेला झोला जब फोर्थ फ्लोर पहुंचता तो वहां वाला गार्ड झोले को बाहर निकालता और पर्ची पर लिखे नाम रुम नंबर को संदेश देता कि तुम्हारा सामान आया है ले जाओ…

अब जब ठहरकर सोचता हूं इस घटनाक्रम को तो कई चीजें समझ में आती हैं….

1- अस्पताल घटिया हो, स्टाफ सूतिया हों और डाक्टर दर चाधड़मोद हों तो अच्छा खासा ठीक हो सकने वाला पेशेंट भी अपनी हार कुबूल कर लेगा… गिरे मनोबल की वजह से वह धीरे धीरे मौत को अपनी नियति मान लेगा… यही वजह था कि वहां मैंने अपना मरना स्वीकार कर लिया था. इस सरकारी अस्पताल में हम लोगों का जो हाल था वह जिंदा को मारने वाला था.

2-मुझे अपना मरना कुबूल था, बस ये कुबूल न था कि मेरा महंगा वाला फोन इन सफेद वस्त्र पहने उचक्के किस्म के लौंडे-लफाड़ी यमदूतों के हाथों पड़ जाए. इसे घर वालों के हाथ पहुंचा कर ही मरना चाहता था.

3- जीते जी अगर आंतरिक यात्रा न हुई हो तो आदमी अपने आखिरी वक्त में भी महंगा सस्ता टाइप मोहमाया में फंसा रहता है… समुचित साधना न हो तो बड़े से बड़े संत मरते वक्त दुनियादारों की तरह ही सोचने लगते हैं. मौत के आगे हिप्पोक्रेसी टिकती नहीं है.

4- आर्थिक रूप से गरीब आदमी के लिए उसकी छोटी-छोटी चीजें भी बहुत कीमती होती हैं. एक मजदूर के लिए उसकी बकरी या गाय या भेड़ ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है. एक किसान के लिए खेत में खड़ी फसल ही सबसे बड़ी उपलब्धि है. इसी तरह मेरे जैसे एक डिजिटल मीडिया मजदूर के लिए सबसे कीमती सामान मोबाइल फोन है. इसी से सारी परसनल-प्रोफेशनल दुनिया मैनेज-आपरेट होती है. ये मोबाइल फोन अगर ब्रांडेड और महंगा वाले हुआ तो जाहिर है, इससे कुछ ज्यादा ही मोहब्बत है.


अस्पताल में जिस दिन भर्ती हो पहुंचा तो बेड मिलते ही पहला काम ये किया कि पड़ोसी नौजवान मरीज को कैमरे के दायरे में लेत हुए एक सेल्फी ली. फिर इसे फेसबुक पर पोस्ट कर दिया … ये सोचकर कि क्या पता यहां बचें या न बचें… ऐसे में आखिरी वक्त की कुछ तस्वीरें तो दुनिया वालों को मुहैया करा दी जाएं… उन्हीं तस्वीरों के नीचे कमेंट बाक्स में आरआईपी लिखने के लिए…. वो वह समय था जब हर तरफ आक्सीजन बेड वेंटीलेटर के लिए हाय हाय चल रहा था… लोग टपाटप मर रहे थे… सत्ता सिस्टम शासन प्रशासन चुप्पी घोंटे था… ऐसे हालात में आधा मनोबल तो यूं ही डाउन था… सो, जीवन के लिए जंग करने की जगह मृत्यु के पाले में समर्पण करने वाली मन:स्थिति बनती जा रही थी…

भर्ती होने के एक रोज बाद अस्पताल में पड़े पड़े जो कुछ सोच पा रहा था, जो कुछ देख पा रहा था, उसे लिखकर फेसबुक पर पोस्ट कर दिया… ताकि लोग सच्चाई जान सकें… मेरी मन:स्थिति समझ सकें… देखें अस्पताल पहुंचते ही ली गई सेल्फी और अगले दिन अस्पताल से ही लिखी गई पोस्ट….

Yashwant Singh-

कुछ लोग जो महामारी में मर न पाएँगे, बुद्ध बन जाएँगे।

घर पर था तो अपना दुःख सबसे बड़ा लग रहा था।

अस्पताल आने पर दुःख इतना दिख रहा कि मुझे अपनी बीमारी की परवाह ख़त्म हो गई।

दूर दूर से प्राण निकालने वाली खांसियों की चीत्कार दीवारों से टकराकर चली आ रही है। मन ही मन बीमार की शांति के लिए प्रार्थना करता हूँ।

बगल के बेड पर कृत्रिम आक्सीजन के सहारे लेटा बीस साल का नौजवान रह रह कर चिहुंक जा रहा। उसके पिता पंखा झलते हुए बेटा बेटा पुकार रहे।

हम दोनों noida की अलग अलग दिशाओं से आज ही यहाँ भर्ती हुए हैं। नौजवान बेहद निराश था। खाना पानी छोड़ रखा था। उसे लगातार मोटिवेट किया। अब वह सही है। जो कुछ मैं खा रहा, उसे भी खिलवा रहा।

पानी यहाँ ऐसे वितरित किया जा रहा है जैसे सामूहिक भोज में बच्चे पानी पानी चिल्लाकर पूछते हैं। मोबाइल रख ख़ाली जग लेकर गेट की तरफ़ हम लोग दौड़ लगाए। आदेश हुआ नीचे रख कर पीछे हट जाओ। दोनों जग भर दिए गए।

कमरे में पंखा नहीं है। गर्मी उमस से बुरा हाल है। घर से मँगवाओ तो लग जाएगा। बीस आए थे, लग गए। डाक्टरनी अभी बोल के गई है।

शुक्र मनायिए कि सरकारी बेड पर हूँ। दूसरों को तो ये भी मयस्सर नहीं। सोच कर तसल्ली देता हूँ।

बुख़ार क्यों नहीं जा रहा, ये पता करने के लिए कल ब्लड टेस्ट होगा। हम भी यहाँ आकर निश्चिंत भाव से पड़ गया हूँ। जो होगा देखा जाएगा।

जीवन मौत के बीच का झीना सा पर्दा यहाँ साक्षात दिखता है। डाक्टर और स्टाफ़ दर्शक दीर्घा में बैठे हैं। मरीज मनोरंजन दे रहा है।

किसी का चीत्कार किसी का मनोरंजन है।

कोरोना का ट्वेंटी ट्वेंटी चल रहा है।

हम कुछ समय के लिए थर्ड अंपायर बन गया हूँ। हलचल खूब है। कब किसकी क्या भूमिका हो जाए, कुछ नहीं पता। गहरी साँस लेकर मन को उन्मुक्त उदात्त बना छोड़ दिया हूँ। हर स्थिति के लिए तैयार! इस तैयारी से तनाव शेष नहीं रह जाता।
फ़िलहाल ऑक्सीजन लगाने की स्थिति नहीं आई है।

ये तो तय है कि बहुत से लोग जो महामारी से बुरी तरह लड़कर जी जाएँगे, बुद्ध बन जाएँगे।

ये भी तय है कि मृत्यु की महालीला शुरू है। कौन गिरेगा कौन बचेगा कुछ नहीं पता।

जै जै

इसके आगे पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें-

यशवंत की कोरोना डायरी (2) : हर तरफ हल्ला हो गया- रूम नंबर 8 वाले भागने के लिए कह रहे हैं!

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