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लैंगिक भेदभाव की गहरी जड़ों पर प्रहार करने के लिए ‘नारी उत्कर्ष’ पत्रिका का प्रकाशन

महिला सशक्तीकरण की दिशा में कलम की ताकत ने सदा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। किन्तु वर्तमान समय में महिला संबंधित मुद्दों को उठाती पत्रिकाओं का घोर अभाव है। मेकअप, कुकिंग, ब्यूटी टिप्स, पति को खुश रखने के नुस्खे बताने वाली तमाम पत्रिकाओं की बाजार में भरमार है, लेकिन लैंगिक भेदभाव की गहरी जड़ों पर प्रहार कर सकने वाली पत्रिकाएं कहीं दिखाई नहीं देती। इस उपेक्षा को देखते हुए महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दों को गंभीरता से उठा सकने के लिए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से युवाओं के एक समूह ने ‘नारी उत्कर्ष’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया है।

महिला सशक्तीकरण की दिशा में कलम की ताकत ने सदा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित लेख मानस पटल पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। किन्तु वर्तमान समय में महिला संबंधित मुद्दों को उठाती पत्रिकाओं का घोर अभाव है। मेकअप, कुकिंग, ब्यूटी टिप्स, पति को खुश रखने के नुस्खे बताने वाली तमाम पत्रिकाओं की बाजार में भरमार है, लेकिन लैंगिक भेदभाव की गहरी जड़ों पर प्रहार कर सकने वाली पत्रिकाएं कहीं दिखाई नहीं देती। इस उपेक्षा को देखते हुए महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दों को गंभीरता से उठा सकने के लिए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से युवाओं के एक समूह ने ‘नारी उत्कर्ष’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया है।

अक्तूबर 2014 में दिल्ली से पत्रिका का पहला अंक निकाला गया। फिलहाल उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और दिल्ली में नारी उत्कर्ष पत्रिका लोगों के बीच चर्चा का विषय बन चुकी है। सोशल मीडिया पर भी लोगों की काफी प्रतिक्रियाएं मिलने लगी हैं। खास बात यह है कि बगैर किसी बड़े बैनर या फाइनेंसर के सहयोग के पत्रिका को प्रकाशित किया जा रहा है। नारी उत्कर्ष के संपादक राजीव कुमार का कहना है कि पत्रिका के माध्यम से धन कमाना हमारा उद्देश्य नहीं है, बल्कि महिलाओं की वास्तविक स्थिति से जन-जन को हम रूबरू कराना चाहते हैं। अब तक पत्रिका के 15 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। प्रत्येक अंक पर मिलने वाली सकारात्मक प्रतिक्रियाएं हमारा मनोबल बढ़ाती हैं। हमारी टीम अपने मकसद में सौ प्रतिशत देने के लिए प्रयासरत है।

मैगजीन की खासियत के विषय में नारी उत्कर्ष के सूमह सलाहकार डॉ. विवेक कृष्ण त्रिवेदी का कहना है कि पत्रिका का प्रत्येक कॉलम आपको खास लगेगा। यहां सदियों से महिलाओं के लिए निर्धारित कर दिए गए कुछ शब्द, कार्य, मुहावरों और कार्यों पर सवालियां निशान आपको हैरान कर सकते हैं। मसलन एक शब्द है महापुरुष। यह सिर्फ स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ही प्रयोग होता आया है। स्त्रियों की बात आती है, तो वीरांगना जैसे शब्द प्रयोग होते हैं। किन्तु हमने पत्रिका में ‘महास्त्री’ कॉलम प्रारम्भ किया है, जिसमें इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महिलाओं का जिक्र है। कुछ लोगों को शायद पत्रिका रास न आए, लेकिन विरोधियों की परवाह हमें नहीं है। हमें सिर्फ अपना कार्य करना है। पत्रिका को बेहतर स्वरूप में पाठकों तक पहुंचाने के लिए जुझारू टीम हर संभव कोशिश में जुटी रहती है।

पत्रिका की मुख्य उप संपादक कमलेश कहती हैं कि फील्ड में उतरने पर पता चलता है कि महिला सशक्तीकरण का सपना अभी कितना दूर है। यही बात लोगों तक पहुंचानी है। टीम में अनामिका सिंह, मोनिका वर्मा, अंकिता तिवारी, रितू पांडेय, देवानंद दिवाकर, राजन समेत कई लोग ईमानदारी से कार्य करने के लिए प्रयासरत रहते हैं। पत्रिका की एक खास बात यह भी है कि महिला सशक्तीकरण के इस संक्रमण काल में जबकि सिर्फ महिलाएं ही अपने अधिकारों के लिए जूझती सी दिखाई देती हैं, पुरुषों का विरोध झेलती हैं, वहीं नारी उत्कर्ष पत्रिका के प्रकाशन की जिम्मेदारी में पुरुषों द्वारा पहल करना अपने आप में एक अपवाद है। संपादक राजीव कुमार कहते हैं कि लैंगिक असमानता सिर्फ महिलाओं से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक बुराई है। इसके खात्मे के लिए महिला एवं पुरुष को दोनों को साथ आना होगा।

प्रेस विज्ञप्ति

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