अरुण सिंह-
साफ भी और ऊंचा भी…. पत्रकार और लेखक अनिल यादव, अपने ‘सहजयोग’ टीप (फेसबुक) का सन्दर्भ लें, जिसमें तालियाँ बटोर रहे हैं….पहले जो अपने लिखे को लेकर तारीफ पाते रहे हैं, परन्तु अब ‘सहजयोग’ के बहाने कुछ लोगों से तालियाँ पाकर निश्चित ही खुश होंगे; एक वरिष्ठ सम्पादक लेखक की ट्रोलिंग करके। यह भी सहजयोग ही है।
अनिल यादव ने अपनी टीप में तद्भव के सम्पादक अखिलेश के साथ अपने प्रतिवाद/प्रतिरोध की जो वजहें गिनाईं हैं (अनिल यादव की वॉल पर देखा जा सकता है) वह बहुत सामान्य-सी लगती हैं लेखन की दुनिया में। लेकिन इसे वे बहुत ‘लोकतांत्रिक’ करार देते हुए सोशल मीडिया पर ऐसे चेंप दिया कि मानो तद्भव के सम्पादक बहुत बड़े साहित्यिक अपराधी हों और लेखक बिरादरी के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो गया।फिर तो, रायबहादुरों की कहाँ कमी है यहाँ, सो सब लिख ही रहे हैं कि तद्भव के सम्पादक को क्या करना चाहिए, क्या नहीं चाहिए…। वो क्या हैं, क्या नहीं… आदि-आदि फेसबुक पर एकतरफा गौरव-रौरवगान। कउआ-रोर…
फिलहाल, अखिलेश जी फेसबुक पर नहीं हैं।
जाहिर है मजे लूटने वाले यहाँ फेसबुक पर खूब डोलते रहते हैं, और यह भी है कि अपने काम से अखिलेश जी बहुतों के लिए आँख की किरकिरी हैं।वे अगर मात्र लेखक होते को कदाचित ऐसा ना होता।मैं समझता हूँ कि तद्भव के लिए ही यह सब उनके हिस्से जा रहा है। यह ‘दाग भी अच्छे हैं’।यह उपलब्धि है कि उनके सम्पादन में यह पत्रिका यहाँ तक पहुँची कि बहुतों में पलीता लगने लगा। यह पलीता तद्भव में ना छपने का तो है ही, उसमें छपने वाले विज्ञापनों को लेकर भी है।
यह बिलकुल सच है कि हिन्दी साहित्य की किसी भी पत्रिका की तुलना में तद्भव को बहुत विज्ञापन मिलते हैं, तो इसमें बुराई क्या है? यह अखिलेश जी और तद्भव की अपनी प्रतिष्ठा है।यह अखिलेश जी का निजी प्रयास भी है।परन्तु क्या उसकी गुणवत्ता पर कोई इसका असर दिखता है ? हाँ, इसकी वजह से उनका लेखन जरूर प्रभावित हुआ जान पड़ता है।इस पर बहस आलोचक करें।
अनिल यादव ने लिखा कि ‘विज्ञापन वालों ने अखिलेश को निपटा दिया ..’ (कुछ इस टाइप में…) यह क्या है ? चापलूसों ने का का कर दिया आदि….माने अनिल यादव मान रहे हैं कि तद्भव निपट चुकी है।एक ‘निपटी हुई पत्रिका’ में ना छपने पर ऐसी हायतौबा….ऐसा रोना-रम्भना…ऐसा गुस्सा…..गजब भाय।
खैर,अपनी लम्बी कहानी ‘गौसेवक’ पर अनिल यादव तद्भव के सम्पादक अखिलेश के ‘हंस कथा सम्मान-2019’ के फेवर (निर्णय) पर लहालोट हुए और अपनी टीप में लिखते हैं, “इस सम्मान से मेरे लेखक का मनोबल बढ़ा. उनके प्रति जो आभार का भाव है, हमेशा रहेगा।” और देखिए कि अनिल के ‘अखिलेश सर’ के प्रति इस ‘हमेशा आभार का भाव’ की समयावधि तीन दिन पहले धसक गई।और अपने ट्रैवलॉग के टुकड़े पर वे अपने ‘अखिलेश सर’ का जो ‘प्रचंड सम्मान’ करते हैं वह तो ‘दुर्लभ किस्म’ का ही कहा जाएगा।
अनिल यादव ने एक लेखक के साथ एक सम्पादक/ लेखक की कथित ‘अवमानना भरी निजी बातें/व्यवहार’ को भी सार्वजनिक कीं।वह भी बहुत सलीके से।यह निश्चित ही अनिल यादव का लेखकीय/ पत्रकारीय ‘कौशल’ है, जो वहाँ भी उपस्थित है।मैं इसे लोकतांत्रिक नहीं, निजता का उल्लंघन मानता हूँ।बेईमानी मानता हूँ।
अखिलेश जी को आप ‘अच्छे सम्पादक थे’ मानते ही हैं, परन्तु अखिलेश की यह ‘हैं’ से ‘थे’ की यात्रा अचानक अनिल के ‘ट्रैवलॉग के टुकडे़’ के रिजेक्शन के बाद शुरू हो गयी।श्री अखिलेश यदि इस टुकड़े को तद्भव के लिए स्वीकृत कर लेते तो कदाचित वे ‘अच्छे सम्पादक’ बने रहते।मानो यही कसौटी थी तद्भव के सम्पादक की।यही लगभग सभी सम्पादकों के साथ होता है, यह भी सहजयोग है।
‘पाँच-छह महीने का पत्रिका के दरवाजे पर बिठाये’ रखने की बात भी घोर आपत्तिजनक, जवाब-संवाद और भी…. वह भी श्री अनिल जैसे बड़े लेखक (जिसे वे खुद और उनके समर्थक मान रहे हैं) के साथ…. बाप रे बाप..! घोर पातक सम्पादक जी ने किया।
तो जो पत्रिका अनियतकालीन या छह महीने पर आती हो, वह पांच महीने तक प्रकाशन-स्वीकृति/ अस्वीकृति को सुरक्षित रखे तो इसमें कोई बुराई तो नहीं समझ में नहीं आती….और जब लेखक ही जिद करे कि नहीं छापेंगे तो आने वाली किताब में छप जायेगी तो कोई भी सम्पादक इस ‘जल्दी’ पर यही वही जवाब देगा जो अखिलेश जी का है।और कोई भी होता तो यही कहता कि जाओ भाई छपवा लो….! और यही गलत कर दिया ना अखिलेश जी ने।यही ना..? गजब राय आ रही है कि ‘टिप्पणी लगाकर’ वापस करते…..दो लाइन ही सही….बाकी तो कुछ ऐसी अप्रिय बातें हैं, वह अनुल्लिखित ही रहे तो बेहतर।
अनिल यादव जब यह प्रतिवाद दर्ज कर रहे हैं तो उनके सिर पर एक ‘बड़े लेखक’ होने का भूत चढ़ बैठा है।इसे लेखकीय हैंगओवर कहूंगा।’छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई।जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥’ समझता हूँ कि इसमें अनिल यादव का भी कोई दोष नहीं है, समय से पहले मिल जाना भी बहुत खतरनाक साबित हो जाता है।
वरना वे यह ना कहते कि अखिलेश जी फेसबुक पर एक अकाउंट खोलें, उसके पटल पर वह टुकड़ा रखें, वहां उस पर बहस हो….गजब हैं भाई! फिर तो कोई पत्रिका कभी भी नहीं छप पायेगी…. पहले या अस्वीकृत करने पर सम्पादक सदन के पटल पर रखें, बहस कराएं और फिर…..! कल को कानून भी पास कराया जा सकता है।आमतौर पर साहित्य में लेखक और सम्पादक का सम्बन्ध बहुत हद तक व्यवहारिक और वैचारिक होता है तथा दोनों की भी अपनी अपनी जगह पर बहुत ही महत्त्वपूर्ण होती है।लेखक और सम्पादक एक दूसरे के पूरक हैं।
इसमें दो राय नहीं कि पूर्व में अनिल यादव ने अच्छा रचा है।लेकिन अकसर ‘मूँड़’ मार ही देते हैं।यदि वे सुभाष राय कि एक छोटी सी राय मानें कि “यह समझना भी जरूरी है कि हर जगह लड़ने की नहीं होती।जहां एक लेखक को लड़ना चाहिए, वहां हम सब अनिल जी के साथ हैं लेकिन आदतन कहीं भी सर टकराने का कोई फायदा नहीं।”
सुभाष जी की ही यह बात, “अगर संपादक ने आप से रचना मांगी है तो भी इस मांगने को छपने की गारंटी की तरह नहीं लिया जाना चाहिए।यह निर्णय संपादक को ही करना होता है कि वह उसे छापे या न छापे।” सहमत हुआ जा सकता है।
किसी भी अच्छी पत्रिका के लिए अच्छी सामग्री का कई चरणों में चयन चलता रहता है और यह प्रक्रिया अंत तक चलती है, जब तक कि पत्रिका छपने प्रेस में छपने ना चली जाय।जिन सामग्री में प्रकाशन योग्य संभावना होती उन्हें अन्त तक कोशिश करके रखा जाता है।कुछ सामग्री को तुरंत (आउट राइट) खारिज किया जाता है…बाद में भी पत्रिका के पृष्ठादि के मद्देनजर सामग्रियों को ‘लिया-छोड़ा-आरक्षित’ रखा जाता है।मुझे लगता है कि इन प्रक्रियाओं से अनिल भी वाकिफ होंगे।फिर भी….हँउहाँ कर सहजयोग में उलझ गये।
जो लोग भी गंभीरता से पत्रिकाएँ निकाल रहे हैं, वे उसकी तमाम चुनौतियों को समझते हैं।इसे केवल लेखक के नजरिए से नहीं समझा जा सकता है।यह चुनौती-सामग्री के स्तर के साथ-साथ उसे प्रकाशित करने के आर्थिक पक्षों समेत बहुत सी हैं।वह शायद आप ना समझेंगे।
अनिल यादव ने यह लिखा कि ‘वे (अखिलेश) कुछ गठियाये’ थे; हो भी सकता है, लेकिन इनकी (अनिल) गठरी तो बहुत ही बड़ी निकली।यदि ऐसा होता तो अखिलेश जी अनिल के पास क्यों फटकते ? उनसे लिखने को क्यों कहते ? यह बात समझ में नहीं आती; फिलहाल यह निजी बातें थी, परन्तु अब तो बात फैल गयी; रायता तो हो ही गया।
तमाम सम्पादकों का यह भी अनुभव है कि लेखकों से आग्रह करते रहिए परन्तु वे भी मना भी नहीं करते और या तो ‘रटते-रटते’ पत्रिकाएं छपने को चली जाती हैं, या रुकने की गुंजाइश की स्थिति में इंतजार करती हैं, बहुत बार तो लेखक अंतिम समय में मना कर देते हैं।यह भी सहजयोग है।
किसी को भी शायद ही ऐसी कोई घटना याद हो कि कभी किसी सम्पादक ने इस निजता को सार्वजनिक किया हो, वह कभी भी इसे अलोकतांत्रिक कहकर ‘छीछालेदर’ नहीं करता।मुझे लगता है कि करना भी नहीं चाहिए…
प्रतिवाद अच्छा, अपमान नहीं।किसी का भी।अभी भी लेखक के रूप में अखिलेश जी और अनिल यादव में जमीं और फलक का फासला है और सम्पादक के रूप में तो अनिल की पारी भी नहीं शुरू हुई है, पता होगी भी या नहीं।
उम्मीद करता हूं कि अनिल भाई जल्द ही सहज होंगे…लेखक-सम्पादक का सम्बन्ध अक्षुण्ण रहे।जैसे उनका आदर अस्थायी रहा, वैसे ही उनका मलाल/अनादर भी अस्थायी सिद्ध होगा।
मैंने ‘साफ और ऊँचा’ कहने की कोशिश की कि ‘कहां फँसे हो महराज’……! जो भी है यही है। अब कुछ अच्छा हो जाय।अब कुछ नया हो जाय।
जब कोई फैसला कीजिए।
दिल से भी मशवरा कीजिए।।
……और अंत में ( जनहित में जारी)
सहजयोग के साथ धनुरासन
विधि: सबसे पहले पेट के बल लेट जाएं और हाथ पीछे करते हुए पैरों को पकड़ें।सांस भरते हुए सीने और पैरों को ऊपर उठाएं और हाथों को सीधा रखते हुए कूल्हों को ऊपर उठाकर, पैरों को पीछे की ओर खींचें। सिर और जांघों को जमीन से यथाशक्ति ऊपर उठाएं। लंबी सांसों के संग लगभग 20 सेकेंड तक करें।सांस छोड़ते हुए वापस सामान्य स्थिति में आ जाएं।यही प्रक्रिया तीन से पांच बार दुहराएं।
लाभ: धनुरासन करने से दिमागी खराबी में तो लाभ होता ही है, मानसिक रोगों से बचना भी संभव होता है।मन की चंचलता दूर होती है।यह आसन उत्तेजना से दूर रखता है, जिससे कई मानसिक रोगों से बचाव होता है। मस्तिष्क का संतुलन बना रहता है। सिरदर्द या माइग्रेन के रोगी और गर्भवती महिलाएं यह आसन न करें।
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