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सियासत

2300 साल पहले भारत ऐसा था!

सिद्धार्थ ताबिश-

किस सभ्यता और किस जागरूक क़ौम का हिस्सा हैं हम लोग.. ये अगर आप सच मे पढ़ सकें तो आप प्रेम और गर्व से भर जाएंगे.. मगर हम तो ऐसे अभागे लोग हैं जिनका इतिहास से लेकर भूत तक सब कुछ पूरी तरह से मिटाने और विकृत करने की कोशिश की गई.. और उसका नतीजा ये हुवा कि आज हम अपने इतिहास और अपने लोगों से घृणा करने वाले दुनिया के पहले और अनोखे प्राणी बन गए हैं।

क़रीब दो हज़ार तीन सौ (2300) साल पहले महाराज चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल मे आये ग्रीस के इतिहासकारों ने लिखा है कि:

“भारत के लोग दुनिया के ऐसे अनोखे लोग हैं जो किसी वस्तु और पदार्थ के संचय में विश्वास नहीं करते हैं.. ये लोग वर्तमान में जीते हैं.. जितनी ज़रूरत होती है उतना रखते हैं.. ये क़ीमती रत्न सोने के साथ पहनते हैं.. ये ऐसे अनोखे लोग हैं जो हर परिस्थिति में सुखी रहना जानते हैं.. ये लोग लिखने में विश्वास नहीं करते हैं और बिना किसी लिखित क़ानून के यहां चोरी और लूटमार लगभग शून्य है.. एक भी मुक़दमे नहीं होते हैं यहां और इसलिए इन्होंने मुकदमों का कोई लिखित क़ानून नहीं बनाया है.. ये एक दूसरे पर विश्वास करते हैं और यही विश्वास इनका क़ानून होता है.. लेनदेन सिर्फ़ इनके विश्वास पर आधारित होता है जिसमें ये कभी घपला नहीं करते हैं.. इनके घरों के बाहर कोई सुरक्षा नहीं होती है क्योंकि चोरी और लूटमार लगभग नगण्य है यहां.. महाराजा चंदगुप्त मौर्य की सैनिक छाँवनी, जिसमे लगभग चालीस हज़ार सैनिकों के शिविर हैं, यहां कभी भी मैंने 100 ग्रीस पैसे से अधिक का हेर फेर की कोई शिकायत नहीं देखी.. जो हमारे देश के मुकाबले नगण्य है.. (किसी ने किसी का घर लूटा या बड़ी संपति लूटी, ऐसा कभी नहीं देखा).. ये ऐसे लोग हैं जो अगर किसी महान अपराध पर किसी को मृत्यु दंड भी देते हैं तो कभी उसका गला नहीं काटते हैं क्योंकि ये लोग ऐसा मानते हैं कि जिस व्यक्ति को मृत्यु दंड देकर हम ईश्वर के पास भेज रहे हैं उसे क्षत विक्षत करके नहीं भेजना चाहिए बल्कि सम्पूर्ण शरीर के साथ प्रभु के पास भेजना चाहिए.. इसलिए इनके यहां सबसे बड़े अपराध की सज़ा सिर्फ फांसी होती है”

सोचिए.. ये छोटा सा वर्णन.. वो भी ग्रीस इरिहासकार द्वारा.. बताता है कि दरअसल हम लोग बेवकूफ़ी और बदहाली में किस हद तक गिर चुके हैं और अपने ऐसे स्वर्णिम इतिहास और पुरखों की विरासत छोड़ कर अरब वालों जैसा बर्बर और अमानवीय बनने की ओर अग्रसर हैं

ये दरअसल हम नहीं हैं जिसे आजकल आप भारत मे देख रहे हैं.. हम और हमारा इतिहास जाने कहाँ अब पीछे छूट चुका है.. हम कलंक हैं अपनी सभ्यता और अतीत पर

~सिद्धार्थ ताबिश

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