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सुख-दुख

टैलेंटेड पिता-पुत्र पत्रकार हैं, काम न होने से बेकार हैं, मदद की अपील

सत्येंद्र पीएस-

नचिकेता देसाई, नारायण देसाई के पुत्र और महादेव देसाई के नाती हैं। कई बड़े अखबारों में काम करने के बाद सेवानिवृत्त हैं। आजीविका चलाने के लिए फेसबुक पर अपील करके लोगों से अपने लिए काम मांग रहे हैं। बेटा टाइम्स ऑफ इंडिया में काम कर रहा था, वह पिछले साल छंटनी का शिकार होकर बेरोजगार हो गया है।

हर एक ईमानदार कर्मठ इंसान के ऊपर यह सरकार एक कहर है। Nachiketa Desai वरिष्ठ पत्रकार हैं। देश के तमाम प्रतिष्ठित अखबारों में उन्होंने काम किया है। अब सेवानिवृत्त हैं। लम्बे समय से हार्ट की बीमारी से जूझ रहे हैं। मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता। फेसबुक से ही जुड़ा हुआ हूँ। वह फेसबुक पर सक्रिय रूप से लिखते हैं।

ये महात्मा गांधी के अनन्य सहयोगी रहे महादेव देसाई के नाती हैं इनके नाना ओडिसा के मुख्यमंत्री रहे हैं
पत्रकारिता के तमाम बड़े संस्थानों में काम किया है इन्होंने

कल उन्होंने साझा किया कि वह आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। उनका बेटा टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी करता था, छंटनी का शिकार हो गया, तबसे बेरोजगार है। नचिकेता देसाई गुजराती और हिंदी से अंग्रेजी में ट्रांसलेशन करते हैं, लेकिन उनको काम नहीं मिल रहा है।

नचिकेता देसाई की पृष्ठभूमि के बारे में थोड़ा सा लिख दूं तो उनके बारे में समझना आसान हो जाएगा। उनके बाबा महादेव देसाई गांधीजी के सचिव थे। उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ बारडोली सत्याग्रह चलाया। सत्याग्रह पर लिखी गई महादेव भाई की किताब से ही सरदार की शुरुआती उपलब्धियों का पता चलता है। उसके बाद उन्होंने सरदार पटेल की जीवनी लिखी, शायद वह पटेल की पहली जीवनी है, जो पटेल के जीते जी लिखी गई थी और पटेल के कार्यो पर प्रकाश डालती है। महादेव देसाई ने इसके अलावा तमाम किताबें लिखीं। उनकी डायरी कई वॉल्यूम में प्रकाशित हुई, जिससे गांधीजी के कार्यों और स्वतन्त्रता आंदोलन के बारे में जानकारी मिलती है।

नचिकेता देसाई के पिता नारायण देसाई भी गांधीवादी थे। उन्होंने भी तमाम किताबें लिखीं जिसमें महादेव देसाई की जीवनी भी शामिल है। नारायण देसाई ने इंदिरा गांधी के खिलाफ आंदोलन किया और जनता पार्टी के साथ गए। नचिकेता देसाई के नाना उड़ीसा के मुख्यमंत्री थे।

यह है शार्ट में नचिकेता देसाई का बैकग्राउंड, जिन्हें आज बुढापे में ट्रांसलेशन का काम खोजना पड़ रहा है, जिससे उनके परिवार की आजीविका चल सके।

कभी कभी सोचता हूँ कि सिर्फ मेरी ही जिंदगी झंड है। रोजी रोटी के लिए छोटा मोटा काम तलाशता हूँ जिससे आजीविका चलती रहे। लेकिन आज हर ईमानदार व्यक्ति की जिंदगी झंड है। वह काम करना चाहता है लेकिन उसके पास काम नहीं है। रोजगार और काम बाजार से गायब है।

आज की तारीख में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि किसी इतने बड़े परिवार को आर्थिक संकट झेलना पड़ सकता है, जिसके बाबा सरदार पटेल और गांधी के सहयोगी रहे हों और नाना मुख्यमंत्री रहे हों। वह महात्मा गांधी ही थे जिन्होंने इतने बड़े और पढ़े लिखे और अंग्रेजों के दौर में नोटों में खेलने वाले सरदार पटेल और महादेव देसाई जैसे लोगो को खादी पहनकर घूमने को बाध्य कर दिया। वह गांधी ही थे जिन्होंने इतने उच्च स्तर के पढ़े लिखे लोगों को निजी सम्पदा नहीं बनाने दिया, न खुद निजी सम्पदा बनाई।

एक रोज राणा कपूर का बयान पढा था कि Priyanka Gandhi Vadra ने राजीव गांधी की जो पेंटिंग बेची थी, उसके पैसे का इस्तेमाल सोनिया गांधी के इलाज के लिए हुआ था। लोगों ने उस पर तरह तरह की टिप्पड़ी दी। लेकिन मुझे 90% यकीन है कि सोनिया गांधी के पास इलाज के लिए पैसे नहीं रहे होंगे जिसके चलते उस खुद्दार महिला को अपने दिवंगत पति की अनमोल पेंटिग बेचनी पड़ी थी, जिसे मकबूल फिदा हुसैन ने बनाई थी।

नचिकेता और प्रियंका की स्थिति पर मुझे यकीन इसलिए हो जाता है, क्योंकि मैं भी नचिकेता या सोनिया की तरह ही हूँ। लोगों के लिए यकीन करना मुश्किल होता है कि महीने के आखिर में कभी कभी मेरे अकाउंट में 2000 रुपये भी नहीं बचते। कहीं किसी तरह की कोई बचत नहीं है, न कोई छिपी निधि, न कोई निजी सम्पदा, न कोई बड़ा बीमा। अभी जब बिटिया का ऑपरेशन होना था और हॉस्पिटल में जमा करने के लिए 70 हजार रुपये मांगे गए तो मेरे खाते में 30 हजार रुपये थे, वह भी इसलिए कि 9 दिन पहले ही वेतन आया था।

खैर….

हम यूँ ही बने रहेंगे। कल ही Ashwini Kumar Srivastava जी से बात हो रही थी। हम दुनिया के इस रंगमंच की कठपुतली हैं। क्या होना है, किसी को कुछ नहीं पता। ऐसे में धन रहे भी तो क्या, न रहे भी तो क्या? हम एक दूसरे के सहारे चलते रहेंगे। कम से कम आज के चोरी चकारी, लूट खसोट, रिश्वतखोरी, हर पल ड्रेस बदलने वाले नशे में लुढ़कते बहकते सत्तानशीं लुटेरों और उनके समर्थकों के राज में हमारी कौन सुनेगा?

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता देसाई फ़ेसबुक पर लिखते हैं-

We are facing dire financial crisis. My son, also a journalist, lost his job last year January when the Times of India laid off hundreds of journalists across the country. Right now, I am the only earning member who slogs as an editor, writer, translator for anyone who needs their work to be done. Both my son and I can take up writing, editing, translation (from Gujarati to English, Hindi to English and vice versa). Please spread the word – we are up for hire.

इसके बाद नचिकेता की ये पोस्ट आई-

A couple of friends offered money after they read my post that my family is in a money crisis as there is no work for me and my son. I am not seeking alms, I am seeking work that pays.

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