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बंद होंगे टाइमआउट इंडिया के प्रिंट संस्करण, अक्टूबर से सिर्फ डिजिटल संस्करण

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एन्टरटेनमेंट और लाइफस्टाइल की पाक्षिक मैगज़ीन ‘टाइमआउट’ ने भरतीय प्रिंट संस्करण बंद करने की घोषणा की है। लगातार बढ़ रहे घाटे के कारण प्रबंधन ने ये फैसला किया है। इसके चलते अधिकतर कर्मचारियों को कंपनी छोड़ने के लिए कह दिया गया है। टाइमआउट का अंतिम प्रिंट संस्करण 15 सितंबर को आएगा। इसके बाद कंपनी अक्टूबर से मैगज़ीन के डिजिटल संस्करण का ही प्रकाशन करेगी।

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एन्टरटेनमेंट और लाइफस्टाइल की पाक्षिक मैगज़ीन ‘टाइमआउट’ ने भरतीय प्रिंट संस्करण बंद करने की घोषणा की है। लगातार बढ़ रहे घाटे के कारण प्रबंधन ने ये फैसला किया है। इसके चलते अधिकतर कर्मचारियों को कंपनी छोड़ने के लिए कह दिया गया है। टाइमआउट का अंतिम प्रिंट संस्करण 15 सितंबर को आएगा। इसके बाद कंपनी अक्टूबर से मैगज़ीन के डिजिटल संस्करण का ही प्रकाशन करेगी।

मैगज़ीन के भारतीय संस्करण के प्रकाशन के लिए एस्सार ग्रुप की कंपनी पैपरिका मीडिया ने टाइमआउट के साथ करार किया था। वर्तमान में इसके मुंबई, बैंगलोर और दिल्ली के तीन शहर केन्द्रित संस्करण प्रकाशित होते हैं।

पैपरिका के सीओओ के अनुसार उपभोक्ताओं के व्यवहार और आदतों में आए परिवर्तनों के कारण प्रिंट से डिजिटल में संक्रमण ज़रूरी हो गया था। कंपनी ने इस बात को देखा कि उसके पाठक शहर केन्द्रित कंटेंट के लिए मोबाइल और कंप्यूटर पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। टाइमसिटी और ज़ोमाटो जैसी सेवाओं ने भी ऐसी पाक्षिक मैगज़ीनों पर असर डाला है।

ये पहली बार नहीं है कि टाइमआउट ने डिजीटल संस्करण के लिए अपने प्रिंट संस्करण को बंद किया है। पिछले साल मार्च में टाइमआउट ने शिकागो के प्रिंट संस्करण को बंद कर डिजिटल संस्करण में परिवर्तित कर दिया था। 

इस साल अप्रैल में टाइमआउट के एमडी(विज्ञापन) ने घोषणा की थी कि कंपनी डिजिटल क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करेगी और उसके यूज़र्स को पर्सनलाइज़्ड कंटेंट उपलब्ध कराएगी.

टाइमआउट जैसी एन्टरटेनमेंट और लाइफस्टाइल मैगज़ीन जो कंटेंट उपलब्ध करातीं हैं उस तरह का कंटेंट बहुत से ऑन-लाइन सेवा प्रदाता करा रहे हैं। बदलाव इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि पाठक संख्या प्रिंट से डिजिटल क्षेत्र की तरफ जा रही है। 2012 में न्यूज़वीक मैगज़ीन ने भी ऑन-लाइन संस्करण को चालू रखते हुए प्रिंट संस्करण को बंद कर दिया था।

पाठकों की रुचि डिजिटल मैगज़ीनों की ओर ज्यादा बढ़ने से विज्ञापनों का पैसा भी डिजिटल क्षेत्र में बढ़ा है। ऐसे में मैगज़ीनों के धंधे में बहुत ही कम विकल्प बचे हैं। संभव है कि आने वाले समय में अन्य प्रकाशन भी इस प्रकार के बदलाव करें।

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