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सुख-दुख

अपने साथी वैभव वर्धन को संपादक राणा यशवंत ने यूँ किया याद!

राणा यशवंत-

अज्ञेय की यह कविता पता नहीं तुमने मुझे कितनी बार सुनायी होगी. आज तुम्हारे टाइमलाइन पर दिखी तो तुम्हारी वह पीड़ा फिर महसूस हुई कि निर्माण का श्रेय देने का चलन दुनिया ने सीखा ही नहीं.

“अरे दादा ग़ुस्सा मत होईए, ७० पर्सेंट तो ठीक है ही. बाक़ी आगे ठीक कर लेंगे”.

तुम्हारी लगन और लापरवाहियाँ दोनों देखा करता. कभी पास बिठाकर समझाता, कभी डाँट लगाता, मगर तुम मुस्कुराते ही रहते. जीवन के न जाने कितने घंटे तुम्हारे साथ रहे. दुनिया जहान की बातें किया करते.

तुम अल्हड़ थे, मगर आदमियत से भरे थे. कुछ लापरवाह थे मगर हुनरमंद थे. तुम्हारी तकलीफ़ ने डेढ़ साल से परेशान रखा था, आज वह परेशानी असहनीय पीड़ा बन गयी है.

बहुत प्यार वैभव. ईश्वर तुम्हें आपने पास जगह दे. उसको भी एक अच्छी सोहबत मिलेगी. ॐ शांति:


संजय द्विवेदी-

स्मृति शेष… लिखते हुए हाथ कांप रहे हैं कि वरिष्ठ पत्रकार और मेरे प्रिय मित्र श्री वैभव वर्धन अब हमारे बीच नहीं हैं। सुबह चंडीगढ़ में उनका निधन हुआ, अंतेष्टि आज हरिद्वार में होगी। वैभव लंबे समय से बीमार थे, चंडीगढ़ में उनका इलाज चल रहा था। ऐसे प्रतिभाशाली, मददगार और संवेदनशील युवा का हमारे बीच न होना बहुत दुखद है। भावभीनी श्रद्धांजलि! ऊं शांति!


अमिताभ श्रीवास्तव-

आज तक में साथी रहे वैभव वर्धन के निधन की खबर से मन बहुत दुखी है। न्यूज रूम की बहुत सी यादें हैं वैभव से जुडी हुई। बहुत विनम्र, हंसमुख, सादादिल, मेहनती इनसान और टीम भावना वाले शानदार सहयोगी। विनम्र श्रद्धांजलि।

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