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सुख-दुख

मैं हर पल ख़ुद की निरर्थकता के बोध से भरा होता हूँ और लगता है आज का दिन भी एवें गया : यशवंत

यशवन्त सिंह-

कुछ विचार ऐसे होते हैं जो जन्म लेते ही पूर्ण होते हैं। उन्हें किसी मरम्मत, विकास या आधुनिकीकरण की ज़रूरत नहीं होती। वे जैसे हैं, वैसे ही बने रहते हैं।

इसका एक उत्तम उदाहरण है — सेफ़्टी पिन, जिसे वॉल्टर हंट ने 1849 में आविष्कृत किया था।

धातु का एक छोटा-सा टुकड़ा, जिसे बड़ी चतुराई से मोड़ा गया है, 170 वर्षों से अधिक समय से लगभग बिना किसी बदलाव के उपयोग में आ रहा है।

हर बार बात जटिलता या निरंतर नवाचार की नहीं होती। कभी-कभी किसी विचार की महानता इस बात में होती है कि वह जन्म के समय ही रूप और कार्य दोनों में सर्वोत्तम होता है — और उसे बदलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

मनुष्य कहाँ से आया है, कहाँ जाएगा, ये सवाल लंबे समय से रहस्य है! जीने का बहुत थोड़ा सा वक्त जो मिला है, उसमें हम अहंकार राग द्वेष प्रेम घृणा हवस वासना से इतने घिरे होते हैं कि सोच भी नहीं पाते- हम कौन हैं और हमारे होने, हमारे जीवन का मकसद क्या है?

इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें वाह्य जगत से धीरे धीरे तटस्थ होना पड़ेगा। फिर ख़ुद के अंदर उतरना होगा।

ये ख़ुद के अंदर उतरने का जो मामला है, वह सबका अलग अलग होता है।

मैं आजकल ज़्यादा से ज़्यादा सोने की कोशिश करता हूँ।

मैं आजकल जागते हुए हर पल ख़ुद की निरर्थकता के बोध से भरा होता हूँ और लगता है आज का दिन भी एवें गया।

कभी कभी लगता है मैं किसी भी भाव या बोध से क्यों भरा होता हूँ। संसार में ऐसा क्या सार्थक है जिसके होने से सार्थक बोध से भरा जाए!

भावों के दो पालों में झूलते रहना भी एक किस्म की दुनियादारी ही है। भाव वाली पेंडुलम की सुई स्थिर हो जाए, बीच में, मध्यम मार्ग में, तो ज़्यादा अच्छा है न!

योजनाबद्ध आंतरिक यात्रा की शुरुआत में मन करता है पूरे दिन मौन रहें
पर संसार में रहते ये संभव नहीं हो पाता
ये अभ्यास ज़रूरी है
भोजन से एडिक्शन का खात्मा भी एक प्रयोग है
समाज में रहते ये भी थोड़ा मुश्किल है

अब समझ आता है लोग घर बार त्याग कर क्यों किसी एकांत में चले जाते हैं

संसार समाज में रहोगे तो भोगोगे, रोओगे! ऐसा मुझे अब महसूस होता है!

इस आंतरिक चिंतन से तपकर निकली एक टोली उस सेफ़्टी पिन सरीखी हो जाती है जिसमें फिर किसी बदलाव की गुंजाइश नहीं बचती क्योंकि ये पूर्ण अवस्था होती है, सिद्ध अवस्था होती है।

आइए हम मनुष्य की सेफ्टी पिन प्रजाति में तब्दील हो जायें!

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1 Comment

1 Comment

  1. Anand shuklaa

    May 14, 2025 at 5:00 pm

    यशवंत जी आपके विचार और संदेह दोनो उचित है।।मैं भी बीस साल की पत्रकारिता के बाद यही महसूस करता हूँ कि सेप्टी पेन क्यो नही बन पाया।।शायद समाज का बदलाव भी इसका एक पहलू है।आपने संशयों का उत्तर भी लिख दिया।एक विचार है खुद का इस जीवन मे रहकर जिसने अपना अगला जीवन सवाँर लिया वही सफल और ज्ञानी है।।अच्छे कर्म ही जीवन को संवारते है अच्छे और बुरे दोनो कर्म साथ जाते है।धन दौलत परिवार यही रह जाते है।शास्वत सत्य यही है।

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