मोदी के दो साल : मीडिया को डरा फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया… अब ‘दिक्कत’ दे रहीं अदालतों को ठीक करेंगे साहब लोग

Sanjaya Kumar Singh : सत्ता मिली तो ये कर दूंगा, वो कर दूंगा। ऐसे, वैसे। अब विपक्ष (जो बचा ही नहीं था) सहयोग नहीं कर रहा है। मीडिया को डरा कर और फुसला कर सेल्फी में फंसा दिया। अधिकारियों को पहले ही कसने का दावा किया गया। यह भी कि सब समय से आते-जाते हैं। प्रधानमंत्री 18 घंटे काम करते हैं। अधिकारी परेशान हैं, काम करते करते। नालायकों को दो साल पहले ही हटा दिया गया था।

पहले जनधन खाते के नाम पर फिर सबसिडी छोड़ने की अपील करके जनता से लिया ही है, दिया कुछ नहीं। सफाई नगर निगमें कराती हैं पर स्वच्छता टैक्स केंद्र सरकार लेती है। सर्विस टैक्स बढ़ा दिया सो अलग। इन सबके बावजूद जनता को क्या मिला उसकी बात नहीं करेंगे। अब अदालतें दखल ना दें ताकि हम उत्तराखंड करें या डिग्री पर चुप रहें। आरटीआई कानून से तकलीफ हो ही रही है। देखते हैं पांच साल में और क्या क्या मांगते हैं। दिया क्या है ये मत पूछिए। राज करेंगे (मूंग दलेंगे) 2024 तक। मुंगरी लाल के हसीन सपने याद आ गए।

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सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल न दें अदालतें : अरुण जेटली

नई दिल्ली: वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आज फिर कहा कि अदालतों को सरकार और राजनीतिक दलों के कामकाज में दखल नहीं देना चाहिए। इंडियन वीमेंस प्रेस कोर के एक कार्यक्रम में उन्होंने आरबीआई गवर्नर से सरकार के टकराव की खबर को भी गलत बताया।

“कोर्ट कार्यपालिका का विकल्प नहीं हो सकती। कोर्ट उसकी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर सकती। सभी संस्थाओं को लक्ष्मण रेखा खींचना होगी।” वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को दिल्ली में पत्रकार वार्ता में यह बात कही। कानून के जानकार वित्त मंत्री ने बहुत सतर्क होकर ये साफ किया कि अदालत और सरकार के कामकाज के दायरे अलग हैं। अदालतों को अपनी लक्ष्मणरेखा खींचनी होगी।

वित्त मंत्री की इस सलाह के पीछे हाल के कई मसले हैं। उत्तराखंड पर राष्ट्रपति शासन के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया; आधार को वित्त विधेयक बनाने का मामला अदालत में है; दिल्ली में डीज़ल गाड़ियों पर बैन लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी सरकार निराश है और ताज़ा मामला मेडिकल एंट्रेंस को लेकर एनईईटी का है। जेटली ने कहा, “मेरी नज़र में मेडिकल संस्थाओं में दाखिले का मामला कार्यपालिका के अधीन आता है।”

लेकिन संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बनाने के इल्ज़ाम को लेकर जेटली किनाराकशी कर गए। आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन पर बीजेपी के हमले को भी उन्होंने मीडिया के मत्थे मढ़ दिया और कहा कि आरबीआई से सरकार का कोई टकराव नहीं है। अरुण जेटली ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंधों को लेकर मीडिया में छपने वाली खबरों को आपको गंभीरता से लेना चाहिए।” वित्त मंत्री से कहा कि RBI और वित्त मंत्रालय के बीच संबंध मजबूत हैं।

सूखा और NEET जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को लेकर अरुण जेटली ने अपनी चिंताएं जताईं, लेकिन जिस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में हस्तक्षेप किया …उससे यह सवाल उठता है कि क्या सरकार और राजनीतिक दलों ने इन मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाहन सही तरीके से किया था। क्या उनकी कमजोरियों की वजह से ही कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा था। (साभार एनडीटीवी डाट काम)


वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के इस एफबी स्टेटस जिसे दर्जनों लोगों ने शेयर किया है, पर आए कुछ प्रमुख पठनीय कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Priyadarshan Shastri : पहले दीवानी मुकदमों में वादी के बयान जज के सामने मौखिक होते थे वादी का वकील सवाल करता था तथा वादी अपनी याददाश्त के आधार पर जवाब देता था कि उसने मुक़दमा क्यों पेश किया है उसे समस्या क्या है ? इसमें फायदा ये होता था कि कई बार दावे में कोई झूठी मनगढ़ंत बात लिखी होती थी वह पकड़ में आ जाती थी …. फिर नंबर आता था प्रतिवादी के वकील का कि वह वादी से ज़िरह में सवाल पूछे …. ऐसे में होता ये था कि वकील अपनी चतुराई से असत्यता को उगलवाने की पूरी कोशिश करता था …. ये सारी प्रक्रिया न्यायालय द्वारा रिकॉर्ड की जाती थी । पहली बार अटल जी के समय जब जेटली जी लॉ मिनिस्टर थे तब सीपीसी में संशोधन कर उक्त सिस्टम में बदलाव कर लिखित में शपथपत्र प्रस्तुत करने की व्यवस्था लागू कर दी । अब याददाश्त पर बयान वाली प्रक्रिया समाप्त हो गई । अब तो दावे को ही शपथपत्र के रूप में टाइप कर प्रस्तुत कर दिया जाता है … कई बार ज़िरह के नाम पर न्यायालय प्रश्नावली पहले ही मांग लेता है। कहने का मतलब ये है कि न्यायिक प्रक्रिया का मूल जिससे वकील सत्यता को उजागर करते थे वह समाप्त हो ही गयी है अब मुक़दमा केवल कागज़ी कार्यवाही रह गया है।

Mrinal Singh : बात इससे कहीं ज़्यादा गंभीर है! ये वक्तव्य इस बात का संकेत है की अब सरकार अदालत पर नकेल कसने के लिए कदम उठाने जा रही है! अघोषित एमर्जेन्सी अब अगले चरण की ओर जा रही है जहाँ संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण होगा! पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विश्वविद्यालयों का तो हाल देख ही लिया जहाँ से विरोध के स्वर उभर रहे थे! मेरा अनुमान है की अगला हमला संविधान पर होगा और समय आ गया है की जनता इसका पूरी ताक़त से विरोध करे जैसे एमेरजेंसी में किया था!

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