अजय तिवारी-
कवि-लेखक-अनुवादक और सदानीरा के संस्थापक-संपादक आग्नेय जी [ 24 जनवरी 1935 – 26 अगस्त 2023 ] नहीं रहे।

एक अच्छे कवि, अच्छे साथी और पवित्र गुस्सैल–आग्नेय के साथ कितना पुराना रिश्ता रहा है!
‘जनयुग’ के समय से ‘साक्षात्कार’ के समय तक!
माया जी रहते आग्नेय जी के घर रहा हूँ, उनके बाद ‘पहल’ वाले इंटरव्यू के लिए तीन दिन उनके घर पर ही रहना हुआ था।
आग्नेय पक्के वामपंथी थे लेकिन साहित्य मेँ संकीर्ण नहीँ थे। अज्ञेय के इतने प्रशंसक थे कि अपनी पत्रिका का नाम ‘सदानीरा’ रखा जो अज्ञेय जी की सम्पूर्ण कविताओँ का नाम है।
आग्नेय जी का नैतिक और वैचारिक आग्रह इतना कट्टर होता था कि अपने सभी मित्रोँ से उनका टकराव रहता था।
भोपाल मेँ रहकर कुलीनतावादयोँ से संघर्ष के बिना उनका निर्वाह नहीँ हो सकता था। लेकिन उनके विरोधी उनके बारे मेँ छोटी बात करते थे पर आग्नेय छोटी बात करने से बचते थे।
युवाओँ के प्रति वे बहुत सकारात्मक रहते थे।
आग्नेय जी की स्मृतियों को नमन !
जयंत सिंह तोमर-
‘ सदानीरा’ के संस्थापक आग्नेय नहीं रहे। यह दुखद सूचना पत्रिका के संपादक अविनाश मिश्र ने दी है।
महाकवि मुक्तिबोध के वे प्रिय थे। मुक्तिबोध चिठ्ठियाँ उनके प्रति स्नेह और आत्मीयता को बयान करती हैं। सन् 1995-96 में भोपाल के संस्कृति भवन में उन्हें देखने- सुनने के अनेक अवसर मिले। वे मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के निदेशक थे। युवा लेखकों को वे खूब प्रोत्साहित करते थे। मुझे पहली ही भेंट में एक किताब समीक्षा लिखने के लिए दी थी।
मुझ पर उनका एक बड़ा उपकार है। जब मुझे किसी अखबार में काम नहीं मिल रहा था तब उन्होंने मध्यप्रदेश में ‘ माया ‘ के जाने माने पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक सुधीर सक्सेना जी के पास भेजा था। सुधीर जी ने तब शाम का अखबार ‘ सांझ तक ‘ सात नंबर चौराहे के बीडीए काम्प्लेक्स से शुरू किया था।
आग्नेय जी के नाम के उल्लेख से सुधीर जी और उनकी जीवनसंगिनी सरिता जी ने चार सदस्यीय सम्पादक मंडल में शामिल किया। ‘ सांझ तक ‘ में मैं एक महीने ही रहा, फिर मुंबई चला गया। सुधीर जी और सरिता जी की यह सदाशयता थी कि उन्होंने मुझे एक महीने का पूरा वेतन दिया और मुम्बई के कुछ पत्रकारों के नाम पते भी दिये। फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज से मिलवाया। मुझमें यह कमी रही महत्वपूर्ण और बड़े लोगों से परिचय कायम करने से ज्यादा अपनी ओर से कुछ कर नहीं पाता। संकोच रहता है कि किसी को यह न लगे कि कुछ पाने के लिए घनीष्ठता बढ़ा रहा हूँ।
आग्नेय जी ने जो ‘ सदानीरा ‘ पत्रिका शुरू की वह हिन्दी साहित्य जगत का एक रत्न है। अविनाश मिश्र के सुयोग्य हाथों में वह सुरक्षित है। आग्नेय जी प्रचार संकोची थे। अपने समकालीन अन्य कुछ साहित्यकारों की तरह मठ बनाकर उस पर काबिज होने और अपने चहेतों को उपकृत करने में उनकी कोई रुचि नहीं रही।
‘ सदानीरा ‘ उनकी स्मृति का संवाहक है। हम सब उसे संबल देकर आग्नेय जी के प्रति अपनी आत्मीयता और कृतज्ञता प्रकट कर सकते हैं। कवि लेखक आग्नेय को नम आंखो से श्रद्धांजलि।



