तेजेंद्र शर्मा-
दोस्तो, जिस इन्सान के साथ वर्षों तक साल में दो महीने इकट्ठे बिताए गए हों… वो भी लन्दन जैसे शहर में… उसको काले रंग के कचरे की बड़ी सी थैली में लिपटा हुआ एंबुलेंस में जाना जब देखना पड़ता है तो भावनाएं व्यक्त करना बहुत मुश्किल हो जाता है… शब्द साथ छोड़ देते हैं।
अजित राय से पहली मुलाकात 2007 में दुबई के एक कार्यक्रम में हुई थी। उस कार्यक्रम में राजेन्द्र यादव, विभूति नारायण राय, अनिल जनविजय के अलावा बहुत से साहित्यकार पत्रकार शामिल हुए थे। और मुझे सबसे अच्छा वक्तव्य इस युवा पत्रकार का लगा था। उसके बाद तो अजित का हर साल लन्दन आना और मेरे घर रहना हम दोनों की आदत बन गई थी।
मेरी मुलाक़ात Ajit Rai, Ajay Navaraia और Geetashri से एक ही साल में हुई थी। और तीनों के नामों के पहले अक्षरों को मिला कर मैं AAG कहा करता था। मैं मज़ाक में अजित से कहा करता था कि मैंने आग से दोस्ती की है… वो भी इस बात पर ठहाका लगा कर हँसता था।
अजित की दोस्ती हिंदुजा बंधुओं से ख़ासी गहरी थी। जीपी हिंदुजा, प्रकाश हिंदुजा और अशोक हिंदुजा मुझे अजित राय के बड़े भाई के तौर पर जानते हैं। हिंदुजा बंधुओँ के साथ काम करने वाले कल्पेश शाह और विवेक दवे भी अजित के सबसे नज़दीकी दोस्तों में शामिल थे। अजित के ना रहने की ख़बर सबसे पहले मैंने कल्पेश, विवेक और अशोक हिंदुजा को दी।
उसके बाद अजित के भाई दिनेश और अजित के बेटे भार्गव से बात हुई। दरअसल इस ट्रिप पर अजित आदरणीय ज़किया जी के घर ठहरा हुआ था। एक अलग कमरा मिला हुआ था जहां वह अपनी पढ़ाई लिखाई करता रहता था। कई बार तो ऐसा हुआ कि अजित ज़किया जी को ही तीन-तीन दिन तक दिखाई नहीं देता था।
कल दोपहर एक बजे जब ज़किया जी की हेल्पर ने उन्हें बताया कि अजित राय ब्रेकफ़ास्ट के लिये कमरे से बाहर नहीं निकले, तो ज़किया जी ने पहले से आधे खुले दरवाज़े को थोड़ा और खोल कर देखा तो अजित राय प्राण छोड़ चुके थे। तुरंत पुलिस को फ़ोन किया गया और फिर मुझे।
मैं सुबह की शिफ़्ट में काम कर के घर लौट रहा था जब मुझे सूचना मिली। मैं तुरन्त टैक्सी लेकर ज़किया जी के घर पहुंचा। वहां पुलिस ने करीब 9 घंटे तक हमसे पूछताछ की। यहां एक बात मार्के की लगी कि तमाम पुलिस अधिकारी (पुरुष एवं महिला) बहुत तमीज़ तहज़ीब से बात कर रहे थे। केवल एक अधिकारी तहज़ीब के दायरे से बाहर होता दिखाई दिया – और वह देखने में भारतीय उपमहाद्वीप का लग रहा था। सच में मन को कष्ट हुआ। एक तो अजित का दुःख और दूसरा अपने भारतीय उपमहाद्वीप के पुलिस वाले ने जो दुःख दिया… यह पोस्ट लिखते वक्त तक उस पुलिस वाले का चेहरा आँखों के सामने है।
अजित 14 जुलाई को अस्पताल में अपना चेक-अप करवाने गये थे। दो दिन अस्पताल में रहे। उनका दिल 42% काम कर रहा था। उन्हें पेस-मेकर लगवाने की मेडिकल सलाह दी गई। उन्होंने तय किया कि वे भारत जा कर लगवाएंगे। वे वापिस भारत यात्रा की तैयारी में थे। मगर उनके दिल ने साथ नहीं दिया और वे किसी दूसरी यात्रा पर निकल गये।
अजित का पार्थिव शरीर इस समय नॉर्थविक पार्क अस्पताल के शवगृह में रखा गया है। पोस्ट मार्टम के बाद हमें सूचित किया जाएगा कि हम कब वहां से शव ले सकते हैं। अजित के परिवार की इच्छा के अनुसार उनके अंतिम संस्कार का इंतज़ाम लन्दन या भारत में किया जाएगा।
मुझे भारत, फ़्रांस और ब्रिटेन से करीब 60/70 फ़ोन आए जिसमें मित्रों ने अजित के निधन पर शोक प्रकट किया गया और मुझ से जानकारी हासिल की गई। सभी के नाम देना ठीक नहीं रहेगा।

जो चित्र इस पोस्ट के साथ लगाया जा रहा है, वह अजित राय की अंतिम फ़ोटो है जो कॉलिंडेल के मैक्डॉनल्ड रेस्टॉरेंट में आदरणीय ज़किया जी ने खींची है। आदरणीय ज़किया जी का कहना है कि किसी भी फ़ोटो में अजित की आँखें ठीक से दिखाई नहीं देती हैं। इसलिये उन्होंने मेहनत करके इस फ़ोटो में अजित की आँखों को फ़ोकस किया है।
कथा यूके एवं पुरवाई परिवार अजित राय को अश्रु पूरित श्रद्धांजलि! अजित की मृत्यु से भारत में एकमात्र अंतरराष्ट्रीय सिनेमा क्रिटिक का स्थान रिक्त हो गया है।


