पिता के पहलवानी दांव पेचों का फन अखिलेश को मिला विरासत में

Krishan pal Singh-

उत्तर प्रदेश की राजनीति में शिफर से शिखर पर पहुंचे समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव पहलवानी के शौकीन रहे हैं। राजनीति में उनके चर्खा दावों की चर्चा बहुत हुई है। लेकिन उनके पुत्र और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का मामला अलग है। आस्ट्रेलिया से पर्यावरण इंजीनियरिंग में स्नातक करने वाले अखिलेश यादव की शैली में भदेसपन नहीं है। उनकी शैली आधुनिक है जिससे उनके भाषणों से लेकर प्रतिक्रिया तक में नफासत दिखाई देती है। इसके बावजूद दांव पेचों में भी अपने पिता से अंदाज जुदा होने के बावजूद वे कम नहीं हैं।

मोदी से कतराये योगी को कोसा

अखिलेश में तीखापन भले ही न दिखाई दिया हो लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर उन्होंने चुनावी जनसभा में चिलम वाले बाबा जी जैसे संबोधनों के माध्यम से भरपूर व्यक्तिगत आक्रमण किये हैं। दूसरी ओर मार्के की बात यह है कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना के नाम पर औपचारिकता तक सीमित रहे जिसके निहितार्थ को समझा जाना चाहिए जबकि मोदी ने प्रथम तीन चरणों में उन्हें भारी पड़ता देख अखिलेश और उनकी पार्टी के लिए अब सपा के चुनाव चिन्ह आतंकवादी बम धमाकों से जोड़ने जैसी हरकतों के जरिए जाहिर कर दिया है कि वे इस मुकाबले में आपा खो रहे हैं और निजी हमले न करने की लक्ष्मण रेखा भुला बैठे हैं।

2017 में मोदी और केशव मौर्या के कारण अखिलेश का पिछड़ा चेहरा बन गया था अप्रासांगिक

दरअसल पिछली बार यानी 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश के खाते में बहुत कुछ ऐसा था जिसका लाभ उन्हें मिलना चाहिए था। मुख्यमंत्री के रूप में लोगों ने उनके कार्यकाल को देखा था जिसमें पहले के तीन वर्षो में तो चचा, चाचा साहबान उनके सत्ता संचालन में हावी रहे जिन्होंने सरकार की छवि को बट्टा लगाने में कोई कसर नहीं उठा रखी थी लेकिन बाद के दो वर्षो में इनके शिकंजे को खत्म करने के लिए बगावत पर उतर आये अखिलेश अपेक्षाकृत स्वतंत्र होकर कार्य कर सके जो मतदाताओं के दिलों में छाप छोड़ने में सफल रहे थे। पुलिस की 102 नम्बर हेल्प लाइन योजना, मेट्रो का संचालन, आगरा एक्सप्रेसवे आदि इसकी मिशाल हैं। लेकिन पुलवामा के बाद राष्ट्रवाद का उन्मादी स्तर का ज्वार और मुजफ्फरनगर दंगे की काली छाया का मुकाबला होना असंभव रहा। इसके साथ अपने को देश के पिछड़े वर्ग के सबसे बड़े चेहरे के रूप में सायास स्थापित कर चुके नरेन्द्र मोदी के विराट स्वरूप के सामने अखिलेश का कद बौना पड़ गया। पिछड़ों की आबादी प्रदेश में सबसे ज्यादा है जिन्हें लगा कि उनके समाज को मोदी के देश के सबसे शक्तिशाली नेता बनने से जो गौरव हासिल हुआ है उसे सहेजे रखने में कोई गफलत नहीं बरतना चाहिए।

पिछड़ी आबादी के मन में अखिलेश के मुंह में उत्तर प्रदेश में कोई ढ़ील देने पर मोदी की विराटता खंडित होने के भय ने ऐसा असर किया कि वे किसी कीमत पर इस मामले में गलती न होने देने के लिए संकल्पित हो उठे जिससे उनका रूझान भाजपा की तरफ मुड़ गया और चुनाव परिणामों में यह फैक्टर भाजपा की प्रचंड जीत के रूप में जा उभरा। राजनीति में पुस्तैनी परंपरा से हमेशा नुकसान ही नहीं रहता जिसका फोबिया तारी हो जाने पर इसके सकारात्मक पहलुओं का आंकलन करने में चूक हो सकती है। इंजीनियरिंग पढ़े होने के बावजूद अखिलेश की अपने डीएनए के कारण राजनीतिक घ्राण शक्ति बहुत तेज है। इसलिए उन्होंने चुनावी रणनीति में प्रधानमंत्री मोदी के मूर्तिभंजन का जिम्मेदार बनने से एकदम परहेज रखा। मोदी से भी जाने अनजाने में अखिलेश की उनके और मोदी के बीच टकराव का कोई कोण न बनने देने की मंशा की पूर्ति में सहयोग हुआ। पहले के तीन चरणों में ओमिक्रोन के बहाने मोदी ने प्रदेश में फिजिकल चुनावी उपस्थिति से अपने को दूर रखा। इस बारे में कहा यह जाता है कि मोदी ने चुनावी हवा का रूख भांपकर बंगाल की तरह का मामला न बनने देने के लिए यानी मोदी बनाम अखिलेश न होने देने की गरज से काम किया ताकि उनकी कद्दावर छवि को किसी भी विपरीत चुनावी स्थिति के कारण आंच न आ पाये।

मुख्यमंत्री के आवास के शुद्धिकरण पर अखिलेश की लगातार आवाज की अनदेखी योगी को पड़ी भारी

दूसरी ओर अखिलेश योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के पहले दिन से ही उनके द्वारा सीएम के सरकारी आवास का गंगाजल से शुद्धिकरण कराये जाने के मसले को मुद्दा बनाये हुए थे। योगी यह सोचते रहे कि लोगों के बीच इसका संदेश उनकी भड़ास से अधिक नहीं जायेगा और लोग उनके इसमें निहित आक्षेप को नजरंदाज कर जायेंगे। लेकिन इसकी रासायनिक जैसी गुप्त प्रतिक्रिया हो रही थी। यह मुद्दा अंदर ही अंदर पिछड़ों के आत्मसम्मान को झकझोरता रहा।
महत्वपूर्ण तत्व यह भी है कि 2017 में भाजपा के चुनाव अभियान में योगी आदित्यनाथ का चेहरा कहीं लोगों के सामने नहीं था। उत्तर प्रदेश के लिए भाजपा में चेहरे के बतौर केशव प्रसाद मौर्य दिखाये जा रहे थे जो पिछड़े वर्ग से थे। इसके मोदी के चेहरे से जुड़ जाने से अखिलेश के पिछड़े चेहरे की प्रासंगिकता पूरी तरह खत्म होती गई पर चुनाव परिणाम आने के बाद जब योगी का वरण भाजपा में अप्रत्याशित रूप से मुख्यमंत्री के लिए हो गया तो पिछड़ों के अरमानों को धक्का पहुंचा। उस पर तुर्रा यह रहा कि योगी ने वर्ण व्यवस्थावादी मानसिकता के कारण चाहे मंत्रियों को अहमियत देने के मामले में हो या डीएम एसपी की पोस्टिंग में पिछड़ों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के तकाजे की अनदेखी का उनकी आपत्ति को और ज्यादा गहरा कर दिया। शुरूआत में तो योगी ने अधिकांश जगहों पर बहुत ही कट्टर पूजा पाठी अधिकारियों को जिलों में प्रशासन और पुलिस का प्रमुख बनाया जो शूद्रों फिर उनमें चाहे पिछड़े वर्ग के भाजपा कार्यकर्ता हों या दलित वर्ग के उनसे घनिष्ठ होने पर अशुद्ध होने के खतरे से ग्रसित रहते थे। इसलिए उनसे दूरी का संबंध रखते थे। जिससे उनमें तिरस्कार का अहसास पनपना लाजिमी था।

भाजपा के पिछड़े नेताओं में भगदड़ नहीं थी आकस्मिक

चुनाव के ठीक पहले स्वामी प्रसाद मौर्य ने और दारा सिंह चौहान जैसे पिछड़े वर्ग के नेता भाजपा छोड़कर सपा के शरणागत हुए जिसके पीछे हालांकि व्यक्तिगत कुंठायें भी थी लेकिन ये नेता सत्ता में अपने वर्ग की हिस्सेदारी के लिए आक्रामक अधिकार बोध का परिचय सदा देते आये थे और मूल रूप से इसी कारण ये शुरू से ही योगी के साथ सहज नहीं रह पाये थे। यही बात ओमप्रकाश राजभर के भाजपा के साथ गठबंधन से छिटकने में थी।

नतीजतन जो पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी उसमें अखिलेश के कारण योगी द्वारा मुख्यमंत्री आवास का शुद्धिकरण कराये जाने का मामला बहुगुणित प्रभाव पैदा करने लगा था। पिछड़ों में इससे अपने आत्मसम्मान पर चोट का बदला लेने का इरादा पुख्ता होता गया। भले ही चुनाव के पहले यह प्रतिक्रियायें अवचेतन में सिमटी थी। एक समय मंडल बनाम कमंडल की लड़ाई में कमंडल इसलिए बाजी मार ले गया था क्योंकि भाजपा ने कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना रखा था। पर जब सामाजिक न्याय के इस सिलसिले को आगे बढ़ाने में स्व0 रामप्रकाश त्रिपाठी जैसे नेता सवर्णवादी सोच के कारण ब्रेकर बने तो भाजपा पतन की शिकार होती गई। बीच में कुछ समय के लिए जोड़तोड़ करके भाजपा सत्ता में आयी भी तो उसने कल्याण सिंह को फिर पार्टी से बिदा हो जाने के लिए मजबूर कर दिया और उनके विकल्प में रामप्रकाश गुप्ता व राजनाथ सिंह को क्रमशः मौका दिया गया। लेकिन वर्ण व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की यह कोशिशें उसे बहुत महंगी पड़ी और प्रदेश में लंबे समय के लिए सत्ता की दौड़ से बाहर हो जाने के रूप में इसका खामियाजा उसे भोगना पड़ा।

बेहतर होता भाजपा ने कांग्रेस के इतिहास से लिया होता सबक

भाजपा को चाहिए था कि इस मामले में वह कांग्रेस के इतिहास से सबक लेती। संविद सरकारों के दौर में कांग्रेस ने पिछड़ों की महत्वाकांक्षा को समायोजित न करने से झटका झेला और 1977 में इमरजेंसी के बाद उसे उत्तर प्रदेश में पिछड़ों के उसके खिलाफ सत्ता संघर्ष के कारण ही मुख्य रूप से केन्द्र की सत्ता से पहली बार बेदखल होना पड़ा था। इसलिए 1980 में वापिसी के बाद कांग्रेस में थिंकटैंक का एक वर्ग हासिये पर पड़े समाज को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाने की पैरवी करता रहा। इस बीच 1989 तक कांग्रेस ने प्रदेश में चार बार नेतृत्व परिवर्तन किया और हर बार पिछड़े वर्ग या दलित वर्ग के किसी नेता को अवसर देने पर विचार होता रहा लेकिन पार्टी पर हावी वर्ग सत्ता के कारण यह कदम उठाने का साहस कांग्रेस नहीं कर पायी और 1989 के बाद इसके चलते कांग्रेस उत्तर प्रदेश में स्थायी रूप से सत्ता से बाहर हो गई।

भाजपा ने भी 2017 में प्रदेश में बहुमत मिलने क बाद कांग्रेस का पिछड़ों के लिए मुकरने का इतिहास दोहरा दिया। ध्यान रखा जाना चाहिए कि सामाजिक न्याय की अवधारणा पिछड़े या दलित प्रभुत्व का पर्याय नहीं है। बाबा साहब डा0 अम्बेडकर जब कहते थे कि लोकतंत्र की व्यवस्था को सफल करने के लिए पहले सामाजिक लोकतंत्र के सपने को पूरा किया जाना चाहिए तो उनकी भावना आधिपत्य के अदल बदल की नहीं थी। इसकी बजाय वे नागरिक चेतना पर आधारित लोकतंत्र बनाना चाहते थे जिसके लिए वर्ण व्यवस्था को मिटाना अनिवार्य शर्त है। यह मानवाधिकारों पर आधारित सार्वभौम कानूनों के शासन के लिए भी जरूरी है। चूंकि वर्ण व्यवस्था या कोई भी व्यवस्था के खात्मे के लिए एक प्रक्रिया खोजनी पड़ती है इसलिए राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में आरक्षण पर आधारित सामाजिक न्याय के सिद्धांत को जिसे विशेष अवसर का सिद्धांत भी कहते हैं उन्होंने अंतरिम तौर पर लागू कराया था। डा0 राममनोहर लोहिया तो सवर्ण थे लेकिन लोकतंत्र के लिए अगाध निष्ठा होने के कारण उन्होंने भी पिछड़ों ने बांधी गांठ सौ में पावे साठ का नारा देकर सामाजिक न्याय के जज्बे को स्फूर्ति देनी चाही थी। बिडम्वना यह है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी सत्ता मिलने पर सामाजिक न्याय के नारे को तार्किक परिणति पर पहुंचाने की जिम्मेदारी पूरी करने से पीछे हट गयी जिससे अतृप्त सामाजिक क्रांति का प्रेत राजनीतिक परिदृश्य पर भटक रहा है और जिसको तर्पण न होने तक इस प्रेत को मुक्ति नहीं मिलेगी और न ही सामाजिक, राजनीतिक उथल पुथल शांत होगी।

बहरहाल वहीं पर आना चाहिए जहां से बात शुरू हुई थी। सपा के मुखिया अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री आवास के शुद्धिकरण के मुद्दे को पिछड़ों को दुखती रग छूने के लिए जिस तरह से अंत तक जिंदा रखा उसने चुनाव में पूरा रंग दिखाया है और भाजपा की काफी मेहनत से बुनी गई सामाजिक गोलबंदी में इसी कारण तेज बिखराव नजर आया है।



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