चहेते पत्रकारों पर करोड़ों उड़ाने वाली सरकार अमित पांडेय जैसे छोटे पत्रकार की जान बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकती!

Alok Ranjan : बहुत ही दुखद खबर आयी है… सहारा के न्यूज चैनल ‘समय’ उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड में 35 साल के असिस्टेंट प्रोड्यूसर अमित पांडेय की मौत हो गयी है… मौत की वजह तो और भी ज्यादा झकझोर देने वाली है… दो महीने से अमित सिर्फ बिस्किट के सहारे ज़िंदा थे… क्योंकि दो महीने से सैलरी नहीं आयी थी… दो महीने से वो ब्रेकफास्ट… लंच और डिनर में बिस्किट खा कर ऑफिस आ रहे थे… ज्यादा दुख इस बात का है कि…

 

मीडिया संस्थानों में काम करने वाले लोग…जो पूरी दुनिया के हक की आवाज़ बनने का ढोंग रचते हैं… वो अमित पांडेय की जान ना बचा पाए… सहारा की हालत फिलहाल क्या है ये किसी से छुपी नहीं है… लेकिन क्या पत्रकारों की जान इतनी सस्ती हो गयी है… क्या अपने चहेते पत्रकारों पर करोड़ों रूपए उड़ाने वाली सरकार अमित पांडेय जैसे छोटे पत्रकार की जान बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकती थी… या फिर हमारे जैसे पत्रकार सिर्फ इसलिए इस पर बात करने से कतराते रहेंगे कि अपनी तो चल रही है.. दूसरों से हमें क्या मतलब… लानत है…

Chitra Tripathi : सहारा मीडिया में काम कर मैंने बहुत कुछ सीखा, मुझे पहचान मिली , लेकिन आज जब ये पता चला कि अब पैसे नहीं होने की वजह से वहां के लोगों की जान जा रही है और लोग बिस्किट खाकर पेट भर रहे हैं और कई महीने से सेलरी नहीं होने से लोग उम्मीदें छोड़ रहे हैं तो बहुत तकलीफ हो रही है।

उन लोगों से निवेदन है जो सहारा में काम कर चुके हैं और आज अलग अलग जगहों पर अच्छे पोजीशन पर हैं वो थोड़ी मदद इन लोगों की जरुर करें। इनके बुरे वक्त में हम इनका सहारा जरूर बनें। भूख किसी की आंखों में आंसू ना लाये, दोबारा किसी पत्रकार की भूख की वजह से मौत ना हो , सिर्फ इतनी मदद कर दीजिये इनकी।

आलोक रंजन और चित्रा त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से.



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