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सियासत

भारत का कथित प्रगतिशील तबका आज मोहम्मद यूनुस को क्रांति का मसीहा साबित करने पर तुला है!

विश्वदीपक-

मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया को अमेरिकी साम्राज्यवाद का दलाल बताने वाला भारत का कथित प्रगतिशील तबका आज मोहम्मद यूनुस को क्रांति का मसीहा साबित करने पर तुला है.

पहली बार देख रहा हूं कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA की देखरेख में, बांग्लादेश की फौज, सांप्रदायिक जमात-ए-इस्लामी, बीएनपी + इंटरनेशनल एनजीओ लॉबी द्वारा किए गए overthrow का समर्थन या बचाव भारत में ‘लेफ्ट’ की तरफ से आ रहा है.

यहां का फर्जी ‘गांधीवादी-लिबरल-सेक्युलर’ तबका भी इस खेल में शामिल हैं. बांग्लादेश में इस बार भी फौज के नेतृत्व में खूनी सांप्रदायिक तख्तापलट का इतिहास दोहराया गया. छात्र आंदोलन का इस्तेमालकिया गया,बस. आगे भी यही होने की संभावना है क्योंकि बांग्लादेश पूरी तरह से monolithic society है. वहां की ज़मीन कट्टरपंथ के लिए बहुत उपजाऊ है. अंग्रेज़ों के ज़माने में बनकर तैयार हुई थी.

परेशानी वाली बात यह है कि भारत के लिए इस लीपापोती के परिणाम खतरनाक होंगे. प्रतिक्रिया में हिंदू राइट विंग ही मजबूत होगा.

बांग्लादेश में खूनी तख्तापलट हुआ है. उसे ‘क्रांति’ का तमगा देना हास्यास्पद है. इसके पीछे कौन सी इस्लामिस्ट शक्तियां काम कर ही थीं, उनका मकसद क्या था? पड़ताल कोई मुश्किल काम नहीं. पर्दा हटाइए. पीछे सब कुछ नंगा दिखाई देगा.

भारत का बौद्धिक तबका लंबे समय से मुस्लिम सांप्रदायिकता का बचाव करता आया है. भारत का हिंदू राइट विंग यूं ही इतना ताकतवर नहीं हुआ है. इसके कारण हैं जो साफ दिखाई पड़ते हैं. Politically correct बने रहकर, मुस्लिम सांप्रदायिकता का बचाव करके, हिंदू सांप्रदायिकता को नहीं रोका जा सकता.

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