भारत के 78 प्रतिशत लोग वधिक और रक्तपिपासु हैं!

सुशोभित-

क्या आज भारत में 78 प्रतिशत लोग माँसाहारी हैं? मुझे नहीं मालूम यह आँकड़ा किस आधार पर प्राप्त किया गया, किन्तु अगर यह सच है तो घोर निराशा में डूबने का यह प्रयोजन है। भारत के नैतिक पतन का यह सबसे बड़ा साक्ष्य है कि आज यहाँ 78 प्रतिशत लोग वधिक और रक्तपिपासु हैं। जैनों, बौद्धों, वैष्णवों, अहिंसकों के देश में आज शाकाहारी अल्पसंख्यक हो चले हैं। और सबसे बड़े अल्पसंख्यक तो पशु हैं। पूरी दुनिया में पशुओं से बड़ी वंचित जाति कोई दूसरी नहीं। वे किसी पहचान-समूह का हिस्सा नहीं और किसी सामाजिक और राजनैतिक समीकरण को प्रभावित नहीं कर सकते, वे तो बोल तक नहीं सकते, इसलिए मनुष्यों ने उन्हें क्रूरता से कुचलने का निर्णय ले लिया है, और वो भी इतने निश्चल होकर, जैसे उनमें कोई प्राण नहीं, चेतना नहीं, जीवेषणा नहीं, भावना नहीं, बुद्धि नहीं। इससे बड़ा महापाप और क्या हो सकता है कि आप एक सजीव-सचेत प्राणी की अस्मिता, जीवनेच्छा और सम्भावना को 78 प्रतिशत निर्लज्जता से रौंदने का निर्णय कर लें?

आज भारत में 78 प्रतिशत माँसभक्षी हैं किन्तु आज से 20 साल पहले कितने थे, 50 साल पहले कितने थे? मुझे कोई संदेह नहीं, यह आँकड़ा पहले कम था, अब निरन्तर बढ़ता गया है। जैसे भारत का माँस-निर्यात ही विगत एक दशक में बढ़कर लगभग दोगुना हो गया है। क्योंकि समाज में पाप बढ़ रहा है, पतनशीलता चरम पर है। “मुझे अभी कैसे भौतिक सुख मिले”- इसी पर चिंतन केंद्रित हो गया है- “फिर चाहे उससे किसी पर भी, कैसी भी बीतती हो।” बीते वर्षों में समाज में उग्र और मुखर प्रकार की धर्म-भावना बढ़ी, और उसी अनुपात में माँसाहार भी बढ़ा, यह कैसी विडम्बना है। धर्म बढ़ने से अधर्म कैसे बढ़ सकता है? आज समाज में साम्प्रदायिकता है। माँसभक्षण का विरोध भी साम्प्रदायिक नीति बन गई है। क्योंकि धर्मालु भला कैसे माँसभक्षण का विरोध कर सकता है, जबकि उसके स्वयं के धर्म में पशुबलि का प्रावधान हो? वैसे धर्म को त्यागे बिना वह इसका विरोध नहीं कर सकता। इस बात की कोई तुक नहीं कि जो चीज़ नौ दिन, अठारह दिन, या सत्ताईस दिन के लिए पाप है, वह शेष दिनों में स्वीकार्य हो जावेगी। जो पाप है, वो सार्वभौमिक और सार्वलौकिक रूप से पापाचार ही कहलावेगा।

कितने शोक और लज्जा की बात है कि आज हिंदुओं में माँसभक्षण बढ़ रहा है। अब्राहमिक धर्मावलम्बियों से तो उम्मीद नहीं की जा सकती, मध्यपूर्व से नहीं, यूरोपियनों से नहीं, चीनियों-मंगोलों से नहीं, किन्तु भारतीय? जीवदया यहाँ धर्म का आधार है। जैनियों के पंचमहाव्रतों में अहिंसा सर्वोपरि है। आज तमाम धर्मों में जैन ही ऐसा धर्म है, जो पशुहत्या के विरोध में निरंतर बना रहा है, वे साधुवाद के पात्र हैं। मैं उनका अभिवादन करना चाहूँगा। आज जैनियों में बहुसंख्य शाकाहारी हैं। क्या यही बात हिंदुओं के बारे में भी कही जा सकती है? काश कि कही जा सकती। वेदों में पशुबलि के कितने निर्देश हैं, इस पर विवाद है। अनेक जन इसे वामाचारियों के माँस, मदिरा, मीन, मैथुन का कुप्रभाव बतलाते हैं। किन्तु हिंदुओं में पशुबलि की रीति तो है- भारत की पूर्व-दिशा में तो अतिशय। इस्लाम के पिशाच-पर्व (ईदुज्जुहा) से वह कैसे श्रेयस्कर है? इधर मैं पं. गोपीनाथ कविराज की पुस्तक ‘तत्वानुभूति’ देख रहा था, उसमें एक अध्याय बलि के महत्व पर है। वे कह रहे थे- “मनुष्येतर जीव मनुष्य द्वारा बलि दिए जाने पर देवत्व-लाभ प्राप्त करता है, क्योंकि पशु में कर्म-संस्कार नहीं होता!” बड़ी अच्छी धारणा है किन्तु है धारणा ही, प्रमाणित नहीं है। प्रत्यक्ष प्रमाण तो यही है कि एक जीव जो जीवित रहना चाहता था, उसे मारा जा रहा है। कालान्तर में महर्षि दयानंद ने वेदभाष्य में माँसभक्षण और पशुबलि में निहित भ्रान्तियों को दूर किया। आज फिर किसी दयानंद की आवश्यकता है। जब तक भारत में माँसभक्षी अल्पसंख्यक और न्यूनतम नहीं हो जाते, भारत का नैतिक पराभव होता रहेगा। निर्दोष की हत्या से बड़ा महापाप कोई दूसरा नहीं। भारत में शाकाहारी 78 प्रतिशत कब होंगे? माँसभक्षण को लेकर समाज में पहले जो ग्लानि और अपराध-चेतना थी, उसका क्या हुआ? माँसभक्षी अपराधियों में आज यह निर्लज्ज आत्मविश्वास कहाँ से आया? फ़िल्मों में यह दिखाने का साहस कहाँ से आया कि बेटी को पहलवान बनाना है तो माँस खिलाओ? अख़बार कैसे लिख देते हैं कि प्रोटीन के लिए माँस खाओ? कितना विशद् सार्वभौमिक पतन है!

नवबौद्धों की दोहरी समस्या है। एक तो शूकर-मार्दव की भ्रान्तिपूर्ण व्याख्या, दूसरे बुद्ध के त्रि-कोटि परिशुद्ध के निर्देश पर अनिश्चय। किन्तु अहिंसा परमधर्म का विचार तो बौद्धों में मूल है ही, भले जैनियों जितना प्रबल न हो। बलि का स्पष्ट
निषेध तो है ही। किन्तु नवबौद्ध आंदोलन को दलितों ने अपहृत कर दिया। दलित ब्राह्मणवाद के धुर विरोधी। किसी ने उड़ा दी कि शाकाहार तो ब्राह्मणवादी मूल्य है- जो कि बिलकुल नहीं है- तो दलित माँसभक्षण करके प्रतिरोध करने लगे। प्रतिरोध करने से पहले पशुओं से अनुमति ली कि क्या हम आपके प्राणों का उपयोग राजनैतिक हितसाधन के लिए कर सकते हैं? यह बड़ी अच्छी बात है कि एक वर्ग की राजनीति दूसरे के विरुद्ध और हत्यापर्व पशुओं का? दलित चिंतक माँसभक्षण के घोर-समर्थक क्यों बन गए हैं? क्योंकि हिंदुओं में शुचिता का यह विचार कि वर्ष के कुछ दिन हम माँस का परित्याग करेंगे? आप इस पाखण्ड पर प्रहार कीजिये किन्तु पशुओं को जीवित रहने का अधिकार है या नहीं, इस पर तो आपको पृथक से विचार करना ही होगा। और इस पर सोचने पर एक ही उत्तर हमेशा मिलेगा कि पशुओं को जीवित रहना है या नहीं, यह तय करने वाले मनुष्य कौन (ठीक उसी तर्ज पर, जैसे माँसभक्षी कहते हैं कि हम माँस खाएँ या नहीं यह तय करने वाली सरकार कौन? कितने आश्चर्य की बात है कि वो अपने लिए भोजन की स्वतंत्रता चाहते हैं किन्तु पशुओं के लिए जीवन का स्वतंत्रता उनके चिंतन का विषय नहीं)।

तब भी इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए और हमेशा इसे बल देकर कहना चाहिए कि पशुओं के जीवन का अधिकार आज एक वैश्विक और सेकुलर आँदोलन है। इसका कोई सम्बंध धर्म से नहीं। जहाँ कोई धर्म का हवाला देकर
माँसभक्षण की बात करे, उसे चुप करा दीजिये। वीगन-मूवमेंट सेकुलर है। पंथनिरपेक्ष है। और यूनिवर्सल है। अनेक नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक माँसभक्षण के विरुद्ध हैँ। वोक्वीम फ़ीनिक्स ऑस्कर पुरस्कार जीतता है तो पडियम पर एनिमल-राइट्स के लिए स्पीच देकर आता है। वह हिंदुत्ववादी नहीं है। वह एक सचेत मनुष्य भर है। जिन देशों और जिन जातियों में माँसाहार की सदियों की परम्परा है, उन्होंने आत्मचिंतन से यह प्रश्न उठाया है कि पशुओं के साथ क्रूरता क्यों और कब तक? उनमें से कुछ पर्यावरणवादी हैं और यह कहते हैं कि माँसाहार से पर्यावरण को क्षति होती है। कि मीट-इंडस्ट्री और विशेषकर बीफ़-इंडस्ट्री कार्बन-उत्सर्जन में कारक है। मैं तो इस विचार को भी दोषपूर्ण कहूँगा। अगर प्रकारान्तर से हत्या को पर्यावरण-हितैषी सिद्ध कर दिया जाए तो क्या उसकी अनुमति दी जा सकती है? क्या क़ानून और संविधान ने मनुष्यों की हत्या पर इसलिए रोक लगाई कि इससे कार्बन-उत्सर्जन होता है? कुल-मिलाकर प्रश्न यही है कि जो महत्व मनुष्य के जीवन की अस्मिता को दिया गया है, वह पशुओं के जीवन की अस्मिता को क्यों नहीं दिया जा सकता? कहाँ लिखा है यह प्रकृति की पुस्तक में कि मनुष्यों को जीने का अधिकार है, किसी और प्राणी को नहीं? जंगल में शक्तिशाली दुर्बल को मारकर खा जाता है, किन्तु जंगल के नियम को तो मनुष्य सदियों पीछे छोड़ चुका। आज मनुष्य-सभ्यता का बुनियादी नियम यह है कि दुर्बल और वंचित का संरक्षण किया जाएगा। समस्या इतनी भर है कि दुर्बल और वंचित भी मनुष्य ही माने गए हैं, मनुष्येतर जीवों को इन कोटियों से वंचित रखा गया है।

आज संविधान को हर प्रश्न का स्वत:प्रमाणित उत्तर मान लिया गया है। संविधान में यह लिखा है कि देशवासियों को अपनी पसंद का भोजन करने का अधिकार है। किन्तु संविधान किसने लिखा? संविधान तो मनुष्यों ने लिखा। वह कोई ईश्वरीय-वचन नहीं जिसमें दोष सम्भव नहीं। संविधान-निर्माताओं में क्या पशुओं का प्रतिनिधिमण्डल भी उपस्थित था, जिन्होंने यह सहमति दी हो कि मनुष्य हमें मारकर खा सकते हैं? मुझे आज तक कोई पशु ऐसा नहीं मिला, जो मरना चाहता हो। जीवेषणा के तल पर पशु और मनुष्य समान हैं। जीवन की कामना पशुओं में मनुष्य जितनी ही सघन है, शायद मनुष्यों से अधिक ही होगी। क्योंकि मनुष्य तो अवसाद में आकर आत्मघात कर बैठते हैं, जीवन से ऊब जाते हैं, कोई पशु आत्मघात नहीं करता। मनुष्य तो किसी महान विचार या मूल्य से जोड़कर आत्मोत्सर्ग को तत्पर हो जाते हैं, पशु आत्मोत्सर्ग नहीं करते। उनके लिए जीवन ही इकलौती सम्पदा है। उनका जीवन वास्तव में उनके लिए मनुष्यों के जीवन से अधिक मूल्यवान है। मनुष्यों ने कब यह तय कर लिया कि पशुओं को जीवित रहने का अधिकार नहीं है? इस निर्णय की नैतिक या बौद्धिक वैधता क्या है?

माँसभक्षियों ने कभी सोचा है कि उनकी थाली में यह द्रव्य कहाँ से आता है? यह पेड़ से तो गिरता नहीं। इसके लिए किसी पशु को मारा जाता है। कैसे मारा जाता है? मारने से पहले वह कैसा जीवन जीता है? उसका जन्म कैसे होता है, किसलिए होता है? कभी कायान्तर करके स्वयं को उनकी जगह रखकर सोचें। मैंने तो बहुत सोचा है और सिहर उठा हूँ। अपने बच्चों का चेहरा पशुओं में देखें, पशुओं की आँखें बच्चों-सी ही निर्दोष होती हैं। क्या आपको पता है गर्दन पर छुरी चलाते समय कैसा अनुभव होता है, जब आपके हाथ-पैर बाँध दिए गए हों? जिस चेतना में यह अनुभूति निर्मित होती है कि मुझे मारा जा रहा है, उसका दमन कैसी वस्तु है? उसका भय, उसका शोक, उसकी असहायता, उसका आत्मदैन्य, माँ के सामने बच्चों को मारना, साथी के सामने सहचर को कुचल देना, केवल भोजन के लिए? जीवन नैतिक-निर्णयों का नाम है। हर व्यक्ति को यह निर्णय लेना होता है कि मेरे इस चयन से किसी पर क्या बीतेगी। माँसभक्षी यह निर्णय ले सकते हैं, किन्तु लेते नहीं। इसलिए उनकी चेतना कलुषित है, वे मनुष्य से अधिक राक्षस हैं। आज भारत में 78 प्रतिशत लोग कलुषित, पतित और राक्षसी हैं। यह आँकड़ा लज्जास्पद है। इस आँकड़े को बदल डालिये।

किसी को मारने और किसी को बचाने में हमेशा दूसरे विकल्प को चुनें। जितनी बार सम्भव हो उतनी बार। केवल चार दिन ही क्यों, नौ दिन ही क्यों, पंद्रह या पच्चीस दिन ही क्यों- वर्ष के हर दिन पशुवध और माँसभक्षण के विरोध का संकल्प उठावें तो ही मनुष्य-धर्म है। शेष जो कुछ है, वह अधर्म है। इति।

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ज़रूर पढ़ने लायक़ एक शानदार पोस्ट : मांसाहार पर अच्छी पंचैती बैठी है! ☛ https://www.bhadas4media.com/non-vegetarian-verses-vegetarian/


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Comments on “भारत के 78 प्रतिशत लोग वधिक और रक्तपिपासु हैं!

  • Faisal khan Khan says:

    बेवकूफी से भरपूर पोस्ट आपकी,पूरी दुनिया मे सबसे ज़्यादा मांस खाया जाता है अगर मांस न हो तो सब्ज़ी आपको एक हज़ार रुपये किलो भी नही मिलेगी,दूसरी बात ये की अगर ये करोड़ो जानवर जो रोजाना काटे जाते हैं सिर्फ एक महीने न काटे जाएं तो धरती पर पैर रखने की जगह न बचेगी हर जगह सिर्फ जानवर ही होंगे,और बाक़ी शाकाहारी कितने बड़े दयालु होते हैं उसकी मिसाल हिंदुस्तान से अच्छी तो कहीं न मिलेगी,खैर आपकी बुद्धि पर तरस आता है महाशय

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  • Faisal khan Khan says:

    लेखक महोदय शाकाहारी कितने बड़े सदाचारी होते हैं इसकी मिसाल आसाराम बापू, बाबा राम रहीम बाबा रामपाल समेत बहित से शाकाहारी हैं,

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