एक शानदार पोस्ट : मांसाहार पर अच्छी पंचैती बैठी है!

प्रवीण झा-

मांसाहार पर अच्छी पंचैती बैठी है। कश्मीरी पंडितों की क्या रीति रही है? उत्तराखंड में? मिथिला में? कामाख्या में? बंगाल में? छिन्नमस्ता मंदिर हो आइए। अभी तो दक्खिन कूच किया ही नहीं है।

वैष्णव संप्रदाय का प्रभाव कोई अजीब बात नहीं है। अच्छी चीज है। चैतन्य महाप्रभु से खूब सरोकार है। हरे कृष्ण, हरे राम सभी करते आ रहे हैं। उससे तामसिक गुण कम होते हैं, चेहरे पर तेज आता है। लोग सभी माँस-मछली छोड़ कर मीठी वाणी बोलते हैं। गाली-गलौज नहीं करते। वैष्णव शिष्टाचारों के समक्ष शाक्त और शैव का टेम्पर कहाँ टिक पाएगा? मगर अब उसमें भी मिलावट है।

वैष्णव विचारों के साथ अपशब्द कहते हैं, भिड़े रहते हैं। इसी पोस्ट में मधुमक्खियों का छत्ता उखड़ कर भिड़ जाएगा। इसलिए वह आकर्षण भी मद्धिम पड़ गया। जब क्रोध में तमतमाना ही है, तो अपना तंत्र ही ठीक है। वहाँ भगवती को केला-लड्डू नहीं चढ़ता। बाकी दिल्ली वाले करते रहें वह बिजनेस क्लास शाकाहारी शक्ति पूजा।

इसमें मेनका गांधी वाली मानवता तो न ही घुसेड़ें। वह अलग डिबेट हो जाएगा। वह करना है तो धर्म और रीति की बात ही न करें। जय मानव, जय होमो सैपिएंस करिए। वह तो बेस्ट चीज है, विथ एन ऑबवियस कैच। रीति बनाया कौन?

बलि पर भारत में कोई बैन नहीं है। खूब होता, खूब चढ़ता है। जो अनजान हैं, यूट्यूब पर ढूँढ लें। ऐसा करने वाले भी हाइट ही होंगे। माने गाँव-देश देखे ही नहीं है क्या? कुछ लोग कहेंगे चैती नवरात्रि। अब क्या बोलें? भगवती को भी व्रत-फलाहार करवा दिए कि अब चैत आ गया, केला-लड्डू खाइए। आश्विन में बलि चढ़ेगा। गजब।

अजीत भारती- एनाटॉमिकली कैनाइन दाँत हैं, और पाचनतंत्र है जो पचा सकता है तो स्पष्ट है कि माँस खाने के लिए शरीर अनुकूल बना हुआ है। करुणा और पीड़ा वाला विवाद अलग है। वह भी हर व्यक्ति के लिए अलग होता है। मैंने कई शाकाहारी क्रूर लोगों को भी देखा है और मांसाहारी करुण को भी।

भोजन जो मन को अच्छा लगे, चित्त को प्रसन्न करे और आपके शरीर को चलायमान रखे, वो करना चाहिए। शाकाहार को उत्तम मानने से तमाम मांसाहारी समाजों के मांसाहारी वैज्ञानिकों से ले कर हिन्दू धर्म के कई पंथों को हम स्वतः नीचे कर देते हैं जिन्होंने मानवता के उत्थान में योगदान दिया है। संवेदना निजी बात है, जो मांस खा रहा है वह संवेदनहीन होगा, यह आवश्यक नहीं।

फिर यही बकलोली गाय के दूध और घी तक पहुँचेगी। मैं कहूँगा कि पौधों में भी जीवन है, उसे काटने पर उसे दुख पहुँचता है, इसलिए अन्न त्याग दीजिए, दूध त्याग दीजिए। जल में कई माइक्रोब्स और जीवाणु होते हैं, मत पीजिए, मर जाएँगे!

व्यक्ति अपने मोरेलिटी के अनुपात में दूसरों को तौलता है। मंगलवार को न खाने वाला, सातों दिन खाने वाले से ऊपर हो जाता है: “अरे यार! तुम मंगलवार को भी खाते हो?” जो सिर्फ अंडा खाता है वो कहेगा कि अंडा तो वेज में आता है। मछली वाला उसको जल-फल कह कर नाचता रहेगा…

ये चर्चा अंतहीन और निरर्थक है। जब तक मैं दूसरे की मुर्गी चुरा कर नहीं काट देता, मैं नहीं मानता कि मैं किसी भी तौर पर गलत हूँ। मुझे अपने सर्वायवल के लिए किसी न किसी का जीवन लेना ही पड़ेगा चाहे वो पौधे हों या पक्षी।

मैं शाकाहारियों को प्रोटीन पर ज्ञान नहीं देता कि मांस खाया करो, तो वो भी मुझे मांस पर ज्ञान न दें। धार्मिकता मुझे गाय खाने से रोकती है, नहीं खाऊँगा। लेकिन अगर धर्म में मांसाहार है और मैं करता हूँ तो लोग मुझे इस बात पर नीचा दिखाना बंद करें।

वस्तुतः संघ के लोग इस मामले में आगे होते हैं जो हिन्दू समाज को वैष्णव जीवन में लपेट कर रख देना चाहते हैं। वो एक तरह से अब्राह्मिक अप्रोच है जो हिन्दुओं के प्लूरलिज्म और सर्वसमावेशन को बर्बाद कर देगा।

रावी सिंह- अजीत भारती खाने के लिए बहुत सारे चीज है ,क्यों एक जानवर जो अभी जिंदा है, सिर्फ अपने स्वाद के लिए,भूख के कारण नहीं ,मार कर खा जाये?? सिर्फ इसलिए मार दे कि वो हमसे कमजोर है! बांध कर पटक कर गला रेत दिया,मांस छील दिया,पीस पीस काट कर मसाला लपेट कर (स्वादिष्ट बनाने के लिए) पका कर खा लिया। पर मांस उबाल कर खा सकता है क्या कोई?

राज सिंह- अजीत भारती आपकी धार्मिकता बहुत भेदभाव वाली है जो गाय को खाने से रूकती है और बकरा मुर्गा और अन्य जीव को खाने के लिए प्रोत्साहित करती है वास्तव में यह शिवाय आदत के कुछ नहीं है कुछ लोग बचपन में खाना प्रारंभ कर देते हैं अच्छा लगता है खाते रहते हैं बस इसके पीछे मुख्य कारण यही है कुछ लोग छात्रावास में आकर के सीनियर के दबाव में खाना प्रारंभ कर देते हैं दया करुणा तो एक महत्वपूर्ण पक्ष है लेकिन उसके पहले यह है कि गाय को छोड़कर बाकी सब खाएं यह कैसी मानवता है यह कैसी धार्मिकता है और जो आपने कहा कि इंटेस्टाइन मांसाहार के अनुरूप है यह गलत है जहां तक केनाइन टीथ की बात है तो हमारा विकास एक क्रम में हुआ है कैन आई उसी रूप में बचा हुआ है लेकिन इंटेस्टाइन में बदलाव हो गया मांसाहारी जीवो की इंटेस्टाइन बहुत छोटी होती है किसी जीव को मारकर खा जाना केवल स्वाद के लिए यह मनुष्यता तो नहीं हो सकती।

सुमित द्विवेदी- जो लोग मांसाहार के पक्ष में यह तर्क देते हैं कि पेड़ पौधों में भी जान है जीवन यापन के लिए किसी न किसी के जान को लेना ही है चाहे वह पेड़ हो या जीव!ऐसे लोग तार्किक कम स्वार्थी ज्यादा होते हैं जो अपने पक्ष में उल-जुलूल तर्क लाते हैं।

अगर मैंने भिंडी के किसी पौधे से एक भिंडी तोड़ा तो कहीं से भी वह पौधा अपंग नहीं होता ,और न ही उससे पौधे के बाकी हिस्से या उस पर लगे अन्य भिंडियों के अस्तित्व पर कोई फर्क पड़ता है जब तक कि उन्हें स्वतंत्र रूप से तोड़ा न जाए।

वहीं अगर एक मुर्गे या बकरी से भोजन लेना है तो उनका पूरा अस्तित्व ही समाप्त करना पड़ता है।जबकि उसी तोड़े हुए भिंडी के एक दाने को यदि मैं सुखाकर मिट्टी में दबा दूँ, तो उससे सैकड़ो भिंडी वाले एक नए पौधे का जन्म हो सकता है। जबकि मुर्गे या बकरे के किसी अंग या शरीर के अन्य हिस्से से ऐसा कुछ होना संभव नहीं है।

मुर्गे बकरे तड़पते,छटपटाते हैं आंखों से आँसू भी निकलता है फल सब्जियों के साथ यह सम्भव नहीं। आम को यदि कच्चा न तोड़ा जाए पकने के बाद वह खुद ही नीचे गिर जाता है जो उसका स्वाभविक गुण है जाहिर है इस प्रक्रिया से उसे दर्द नहीं होता होगा। लेकिन पशु-जानवरो के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं की किसी समय विशेष पर वह अपने खाने वालों को खुद ही समर्पित कर देते हों।

धर्म और संवेदना तो मुख्य मुद्दा है ही इसलिए, पेड़-पौधों में भी जान है यह कहकर कोई माँस खाए यह सिर के ऊपर से जाने वाली बात है,ऐसा उदाहरण तो म्लेच्छ भी देते हैं जब उनके त्यौहार में गली,मोहल्ले की नालियों में लाल रंग का पानी बहने लगता है।
जो बुद्धिजीवी खाना चाहते हैं खाएं क्योंकि किसी के मना करने से कोई मानने वाला भी नहीं है। लेकिन जिह्वा के स्वाद के लिए इसका सामान्यीकरण न करें।

सुशोभित- I am an atheist, certainly not a Hindu, let alone Vaishnava, and when I last checked I was still a Homo Sapiens. And I say there should be complete ban on ritual animal slaughter all across the India, with force. Once this stops then you can talk about complete ban on all animal slaughter.

Animals have a right to life as much as humans think they have and if they will be killed with power then humans too will be subjected to such crimes. Law will be abolished.

Between killing someone and not killing someone, always choose latter, as many times as you could.

In your post you have described how Hindus perform ritual animal slaughter but you are not condemning it. You are only using it for whataboutary. May I know why you are not condemning killing of a creature which is concious and sentinel and intelligent and which doesn’t want to die? I know the answer already.

प्रवीण झा- Condemning on humanitarian ground doesn’t solve the purpose. Christianity flourished with condemning animal sacrifice by pagans. And so has Vaishnavism and Jainism. Its more about plurality of thoughts than imposition. Saving environment will be a long list, right from throwing off this phone.

सुशोभित- My God, you are so wrong on so many points.

  1. Which condemning has ever solved a problem and yet people condemn because they must take a moral stand.
  2. There is no place for pluralism in my book if the pluralism sleeps in bed with organised religions. One religion can burn hundreds of acres of forests and claim this is our religious practice. Other can slaughter humans, as some tribals do. Third will block the railroads for seven days claiming a territory as sacred to them. And you will let them do it all in name of pluralism. There is no place for pluralism. Modern human civilization works on well defined monolithic principles. Law is universal not plural. Constitution is well defined. Human values can’t be altered if some tribe wants to rape few girls for a certain ritual. Problem is this all is happening with animals hence you turn blind eye. When humans will be hurt you will throw away your cloak of pluralism and talk about universal laws. Will Sati pratha be allowed in the name of pluralism?
  3. Animal rights is not an environmental discourse for god’s sake, not for me, not for vegans. It is based on the principle of compassion and non violence. Gandhi wasn’t vegetarian for environmental purpose. I will even go on to say that if by killing animals carbon emission is reduced, even then you can’t kill animals because for the same reason you won’t kill humans, will you.

Murder of an animal is as heinous as murder of a man. Change my mind. Give me some logic. Tell me where it is written in the book of nature that humans have a right to life but animals don’t. And if the powerful will write the rule books and decree the murder of weak and submissive then why condemn Nazis, they had the same idea. Superior race must kill the weak. Same idea.

प्रवीण झा- Sushobhit Its not the age-old unending debate I will get into. Vegans/Vegetarians have developed a good, logical and scientific basis. No blood-bath, no sacrifice, no nature-harm is such a wonderful thing, that anybody would appreciate.

But, if you see the ground-reality. We had umpteens of ponds in North Bihar because fishery was an important business. People cultivate the animals by breeding them, they don’t hunt from wild any more. But, of course, these logics have a basic flaw of violence or killing. So, lets be kind, sweet and smiling in all our behaviours.

My point was for religious people. People who don’t believe in religion, can define their own. But, if you follow a tradition, you follow it. Giving up religion or age-old tradition is a different issue. One is free to chose any religion which avoids sacrifice in-toto. Hinduism is not one of them.

सुशोभित- Praveen Jha I have no love for Hiduism. Destroy it as much as you want. But if someone, who pretends to be a liberal humanist, comes up and somehow try to brush the animal abuse under some carpet and shows it makes no difference to him and basically suggests that it’s ok if we kill animals for religious or non religious purposes, then I will fight that person. I have witnessed the plight of animals, I have seen their sufferings and heard their cries and I have imagined myself in that position.

Humans, after pretending to be liberals, have no right to hurt animals. Only way to hurt animals is to give up on all notions of civilization and law and justice and accept the idea that any powerful will kill any weak anytime and nothing can be done about it.

प्रवीण झा- Sushobhit Hinduism and Indian culture is pretty animal-loving. There have been religious sects who have obeyed vegetarianism. Even non-veg Hindus consume much less as compared to others. On the other hand, atheists (won’t use liberal here) are often non-vegetarians.

I agree to your philosophy prima facie, and we all define our individual lifestyle. Liberalism has enough of hypocrisy in it, ascetism would be the goal at some point of life.

सुशोभित- Praveen Jha Thanks for saying that. I am atheist but not materialistic atheist who would consume meat protesting against religions. I am more kind of Buddhist atheist in the sense that there is no God and organised religions are a massive scandal. Concern for animals is a personal thing for I have seen them suffering and I can’t see any reason why they should go on suffering. Every human being should take a decision whether I must make an animal suffer or not. Everyone must come up with a no as much as he could.

संदीप नय्यर- Sushobhit I find it funny when atheists talk about absolute morality. If there’s an absolute morality then there has to be a God or a universal consciousness. Otherwise there can be only subjective morality.

सुशोभित- Sandeep Nayyar I know there is no God and I know religions are a fraud and I have no idea what is the purpose of life and universe and yet, somehow, I have no intention of killing anyone. If I kill no God will punish me in hell, and if I kill smartly I can deceive law and order. But yet, I don’t want to kill. Contrary I would try to save. What for? Basic human goodness and kindness, a universal feeling. You don’t need a fiction called God for it

संदीप नय्यर- Sushobhit religions also have subjective morality only. All religions are tribal in nature and have a lot of contradictions. One muslim may find killing a kafir or mushrik justified while another would believe that killing an innocent man is akin to killing the entire humanity. So I am not talking about religious morality. But for something to be absolutely true there has to be a universal mind to hold it as the absolute truth, otherwise there can only be a subjective truth.

सुशोभित- Sandeep Nayyar Sir, who told you that? You mean people are not killing each other just because religion has stopped them to and if they will come to know that there is no God they will run riot?

Come on. Atheists are a million times more ethical than religious murderers.

संदीप नय्यर- Sushobhit fine. That’s your subjective morality. You have all rights to it. But you may not have rights to force it on someone else unless you accept it as a objective and universal morality accepted by the collective human conscience.
Question is whether there can be a universal human conscience without the existence of a universal mind. I think not.

सुशोभित- Sandeep Nayyar Your opinion of humans seems terribly low. I have no hopes from humans but even I don’t think that only God is holding them from tearing apart each other. No way. There were communities well before invention of God. In Soviet Union and communist countries, there was perfect law and order. Man can easily live without God. In fact he will do better once he is the captain of his on conscience.

चंदन कुमार सिंह- आज की ये पोस्ट तो कालजयी प्रकृति की है, Sushobhit और प्रातः स्मरणीय अजीत भारती जी भी बहस में कूदे पड़े हैं। लिहाजा बहस के इस महासागर में एक मग विचार मेरी तरफ से भी रहेगा।

  1. भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं और हर राज्य के अंदर दर्जनों तरह की धार्मिक मान्यता वाली आबादी रहती है। लिहाजा सबको शाकाहारी बनाने की सोच आदर्श तो हो सकती है लेकिन अगले हजार साल तक व्यावहारिक नहीं हो सकती।
  2. हमारे घर में धर्मपत्नी कट्टर शाकाहारी हैं और पुत्री समेत हम प्रचंड मांसाहारी, वो नवरात्र में उपवास रखती हैं और हम घर से बाहर दबा कर अंडा मुर्गा खाते हैं। ना हम उनको टोकते हैं और ना वो हमें मना करती हैं। जब एक घर में इतनी अलग च्वाइस चल सकती है तो देश में क्यों नहीं ?
  3. खाने पीने की आदतें उस क्षेत्र के भूगोल, अर्थव्यवस्था और आसानी से उपलब्ध विकल्पों पर निर्भर करती हैं, मिथिला और बंगाल में जमकर बारिश होती है तो वहां डगर डगर पोखर बने हुए हैं जहां न्यूनतम खर्च में माछ और भात खाया जाता है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में आर्य समाज और कई बाबाओं, डरों का प्रभाव रहा है लिहाजा यहां कुछ जातियों में शाकाहार पर जोर दिखता है।
  4. हमारे स्वर्गीय पिताजी मांसाहारी थे, ननिहाल मिथिला में है तो घर में सब्जी कम और मछली ज्यादा बनती थी। बचपन से लेकर जो खाने पीने की आदत हमारे घरवालों ने लगाई म हुई है, वो मैं किसी सा** के कहने पर नहीं बदलूंगा।
  5. सेहत के लिए शाकाहार उत्तम होता है, इसमें कोई शक नहीं है। एक बार जिद में आकर साल भर नॉनवेज नहीं खाया था तो 5 किलो वजन बढ़ ही गया था। अगर सेहत की फिक्र है तो मांसाहार छोड़ दीजिए, लेकिन जबरिया लागू कराने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी।
  6. अभी जो दिल्ली और कुछ इलाकों में मीट की दुकानें बंद कराने की कवायद है, वो शुद्ध रुप से सियासी मसला है। हर प्रोडक्ट के हलाल सर्टिफिकेशन का विरोध करने के लिए राइट विंगर्स ने नवरात्र पर नॉनवेज दुकानें बंद कराने का प्रयोग शुरु किया है। बकरीद पर कुर्बानी का विरोध असल में होली पर पानी बचाने और दिवाली पर पटाखे ना फोड़ने का संदेश देनेवाले चू*** की बकर का रिटैलिएशन मात्र है।

संदीप नय्यर- मैं कभी कभी माँस खाता हूँ मगर मैं स्वयं को माँसाहारी नहीं मानता। ठीक उसी तरह जिस तरह कि मैं कभी कभी शराब पीता हूँ किंतु मैं स्वयं को शराबी नहीं मानता। माँस मेरा मुख्य आहार नहीं है। किंतु विकल्पों के अभाव में कभी कभी खा लेता हूँ। कभी कभी जीभ भी लपकती है जिस पर नियंत्रण न रख पाने का मैं अपराधी हूँ।

जवानी के दिनों में मैं शिकार किया करता था। पास एक छर्रे वाली बंदूक होती थी। मैं चिड़ियों का शिकार किया करता था। आज उस बात का अपराधबोध होता है। जिन्होंने मेरा कुछ न बिगाड़ा आखिर मैंने उन्होंने क्यों मारा? और बिगाड़ा भी होता तो क्या मारना ज़रूरी था? क्या माँस खाते हुए भी मुझे अपराधबोध होता है? जिन्होंने मेरा कुछ न बिगाड़ा उन्होंने मैं क्यों मरवाता हूँ? प्रश्न का उत्तर यह है कि मैं माँसाहार को किस रूप में देखता हूँ। यदि मैं मानता हूँ कि माँस मेरा आहार है, यदि मैं मानता हूँ कि मेरे शसक्त अस्तित्व के लिए माँस अनिवार्य है तो शायद मुझे कोई ग्लानि न हो। माँस अनिवार्य है या नहीं इस पर विवाद हो सकते हैं किंतु यदि मेरी सोच माँस की अनिवार्यता की है तो शायद मुझे कोई ग्लानि न हो। किंतु क्या किसी पशु या पक्षी को तड़पता हुआ मरता देख मेरा दिल नहीं पसीजता? क्या मुझमें कोई दया भाव नहीं आता कि उसे भी जीने का अधिकार है और उसे कष्टप्रद मृत्यु देने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। मैं इस प्रश्न से संघर्ष नहीं करता। मैं मानता हूँ कि मुझमें पर्याप्त दया भाव है। माँसाहार मुझे ग्लानि से भर देता है।

क्या ऐसी ही ग्लानि हर माँसाहारी को होती होगी। क्या पशु पक्षियों के प्रति ऐसा ही दयाभाव हर मनुष्य में होता होगा? मुझे नहीं पता। तो फिर मैं माँसाहार को वस्तुपरक रूप से बुरा कैसे मान सकता हूँ? मुझे पशुओं का कत्ल करने वाला निर्दयी लग सकता है किंतु क्या वह वस्तुपरक रूप से निर्दयी है? यह तय करने का मुझे क्या अधिकार है? माँसाहार के प्रति मेरे भाव व्यक्तिगत ही हो सकते हैं। तब तक जब तक कि मैं यह न मानूँ कि कोई वैश्विक चेतना माँसाहार को गलत मानती है। माँसाहार के वस्तुपरक रूप से गलत होने के लिए किसी न किसी वैश्विक चेतना में उसका गलत होना आवश्यक है अन्यथा माँसाहार के प्रति किसी भी मनुष्य के विचार उसके व्यक्तिगत विचार ही हो सकते हैं जिसे उसे किसी अन्य पर थोपने का कोई अधिकार नहीं है। सेक्युलर हुमनिस्म मूलभूत रूप से त्रुटिपूर्ण है।

अब हमारे समय के सबसे बड़े वैज्ञानिक रॉजर पेनरोज़ कह रहे हैं कि नैतिकता के मूल्य ब्रह्माण्ड के गर्भ में हैं। क्या उन मूल्यों के अनुसार माँसाहार गलत है, निर्दयता का परिचायक है? यह हम कैसे जान पाएँगे?

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भारत के 78 प्रतिशत लोग वधिक और रक्तपिपासु हैं! ☛ https://www.bhadas4media.com/bharat-ke-mansahari/

मांसाहार भारत में फ़ैशन बन गया है! ☛ https://www.bhadas4media.com/mansahar-ka-faishan/


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