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सियासत

बीजेपी समर्थक इन तीन लेखकों से जानिये “ऑपरेशन सिंदूर” के ज़रिए भारत को क्या-क्या हासिल हुआ और पाकिस्तान ने कितना कुछ झेला!

संतोष सिंह-

पाकिस्तान सरकार और पाकिस्तानी लोग बिल्कुल मजेदार लोग हैं। उन्होंने चार लड़ाकू विमान, तीन एयरबेस, रक्षा प्रणाली, एग्यारह आतंकवादी शिविर और उच्च पदस्थ एयरफोर्स अधिकारी, 100 से ज्यादा आतंकवादी/आईएसआई कर्मचारी खो दिए, लेकिन फिर भी कहते हैं कि वे जीत गए।

पूरी दुनिया के समर्थन का दावा कर रहे पाकिस्तान के लिए यह गौरतलब है कि किसी भी मुस्लिम देश ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया, केवल तुर्की ने ही खुलकर नहीं बल्कि एक कार्गो विमान दिया और केवल थर्ड क्लास ड्रोन और गोला-बारूद दिया, जिससे वे केवल तीन दिन तक ही लड़ सके।

यहां तक ​​कि तुर्की के पांच सौ से अधिक ड्रोन स्टॉक की मदद से, भारतीय रक्षा प्रणालियों ने उन सभी को बेअसर कर दिया। उन्होंने फतेह मिसाइल का भी परीक्षण किया, जिसकी रेंज 400 किलोमीटर है। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली को निशाना बनाया लेकिन दिल्ली से 250 किलोमीटर दूर भारतीय रक्षा प्रणाली ने इसको सिरसा में मार गिराया।

तीन दिन के युद्ध में उनकी हालत खराब होने लगी. राजधानी और सारे बड़े शहर भारतीय हमले के जद में आने लगे, एयरबेस बर्बाद होने लगे, गोला-बारूद की कमी होने पर पाकिस्तान ने घुटने टेक दिए और युद्ध विराम की भीख मांगी। उनके सैन्य संचालन महानिदेशक(DGMO) ने युद्ध विराम के लिए भारत के डीजीएमओ को बुलाया क्योंकि वे जानते हैं कि वे लंबे समय तक युद्ध नहीं कर सकते। भारत ने अपनी ताकत दिखाई, यह शर्त भी रखी कि आगे अगर कोई आतंकवादी कार्रवाई हुई तो उस को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा और भारत पाकिस्तान को तबाह करके जवाब देगा। ऐसे में भविष्य में पाकिस्तान किसी और आतंकवादी हमले की साजिश रचने से पहले बहुत गहराई से सोचेगा।

पाकिस्तान को शांति की जरूरत ज्यादा थी क्योंकि वह पहले से ही शीर्ष भिखारी देश है, बर्बाद हो रहा था जबकि भारत जल्द ही शीर्ष 3 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो जाएगा। हालांकि भारत भी युद्ध नहीं चाहता है, लेकिन अगर पाकिस्तान अपनी भ्रमित नव-मुगल महत्वाकांक्षाओं को जारी रखता है तो उन्हें एक और सबक जरूर सिखाना होगा!


राजीव रंजन झा-

एक ही रात में 9 अलग-अलग आतंकी ठिकाने नष्ट करना ठीक नहीं था। पहले पीओके में रोज एक-एक ठोकते, उसके बाद पाकिस्तान के अंदर वाले ठिकानों को हर रोज एक के हिसाब से ध्वस्त करते, तो लोगों को रोज शिलाजीत की एक नयी टैबलेट मिलती। अभी तो ऐसा है जनाब, दोनों तरफ के लोग निराश हैं कि मजा नहीं आया।

ऑपरेशन सिंदूर में इतनी सारी चीजें पहली बार हुई हैं, कि उन्हें गिन पाना भी आसान नहीं है। जो लोग उरी और पुलवामा के बाद हुए सर्जिकल स्ट्राइक को अविश्वसनीय मान रहे थे, जिन्हें लग रहा था कि भारत इतनी बड़ी कार्रवाई कैसे कर सकता है, वे केवल 86 घंटों में हासिल उपलब्धियों के बाद भी निराश हैं!

ऑपरेशन सिंदूर से पहले ही, कूटनीतिक मोर्चे पर सिंधु जल संधि को स्थगित करने जैसा बड़ा कदम उठाया गया, जिसे उठाने की बात लोग बाकायदा लंबे चले युद्धों में भी नहीं कर सके थे। चाहे देश के तमाम खानदानी गुलामों की माँ हों, या भाजपा के परम श्रद्धेय वाजपेयी जी, न 1971 में यह कदम उठाया गया और न कारगिल युद्ध के समय। और यह कदम इतना बड़ा था कि पाकिस्तान पहले से कहता रहा है कि वह सिंधु जल संधि तोड़ने को युद्ध छेड़ने जैसा कदम मानेगा।

पाकिस्तान के पप्पू ने ललकारा कि या तो सिंधु में पानी बहेगा, या फिर खून बहेगा। खून तो बहा, पर पाकिस्तानी सेना के 40 लोगों का और 100 आतंकवादियों का।

एक वाक्य में याद रखें – सिंधु जल संधि स्थगित करना ही पहलगाम हमले का अभूतपूर्व बदला है। कारगिल युद्ध में कई महीनों तक हर दिन अलग-अलग शहरों में भारत के वीर शहीदों के पार्थिव शरीर आ रहे थे।

युद्ध में जाते समय पता रहता है कि नुकसान हमें भी होगा, पर यदि उस समय वाजपेयी सरकार ने वायुसेना को खुली छूट दी होती, सेना को एलओसी पार करने की अनुमति दी होती, तो हमारी सेना को बहुत कम जनहानि झेलनी पड़ती। पर नहीं, एलओसी पार नहीं करना था।

इस बार क्या हुआ है? पाकिस्तान के सैन्य मुख्यालय रावलपिंडी तक हमारे वीर पायलट गर्जना कर आये, तबाही मचा आये। पहले कब हुआ युद्ध की औपचारिक घोषणा के बिना ही? कभी नहीं।

केवल पहलगाम का बदला नहीं लिया गया, कई पुराने अधूरे बदले भी लिये गये। कंधार विमान अपहरण कांड तक का बदला लिया गया, उसमें शामिल रहा आतंकवादी मारा गया।

किसी अभियान की सफलता का आकलन इस बात से नहीं लगाया जाता कि लोगों ने क्या उम्मीदें लगा ली थीं, बल्कि सही कसौटी यह है कि अभियान के लक्ष्य क्या तय किये गये थे। किसी सैन्य अभियान के आरंभ में लक्ष्य की पूरी जानकारी नहीं दी जाती, शत्रु पक्ष को इस अनिश्चितता के दबाव में रखा जाता है कि आगे पता नहीं क्या होने वाला है। क्या पाने के लिए अभियान चलाया गया, इसकी जानकारी लक्ष्य पूरे होने के बाद ही दी जाती है। डीजीएमओ ले. ज. राजीव घई ने 11 मई को एक वक्तव्य में कहा, “ऑपरेशन सिंदूर की परिकल्पना स्पष्ट सैन्य उद्देश्य से की गयी थी, ताकि आतंक के अपराधियों और योजनाकारों को दंडित किया जा सके और उनके आतंकी ढाँचे को नष्ट किया जा सके।” कुछ उत्साही नागरिकों ने इसी अभियान में पीओके, लाहौर, कराची वापस लेने और बलूचिस्तान की मुक्ति के लक्ष्य रख लिये थे, पर सेना के सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट था और उसने उसे प्राप्त किया।


दयानंद पांडेय-

सीज फ़ायर की काली दाल की कैफ़ियत में सवालों के सुलगते सागर

मेरी पसंद और थी , उस की पसंद और
इतनी सी बात पर घर छोड़ना पड़ा l

सेना की अभी हुई प्रेस कांफ्रेंस देख-सुन कर अंजुम रहबर का यह शेर याद आ गया l सेना के प्रवक्ता लोगों का स्पष्ट कहना है कि सेना ने आपरेशन सिंदूर का लक्ष्य पूरा किया l फिर तीन दिन की अपनी बेशुमार उपलब्धियां बताईं l

सेना का लक्ष्य खैर जो भी था , जनता का लक्ष्य अलग था l जनता चाहती थी कि दाऊद , हाफिज सईद , मसूद टाइप आतंकवादी मारे गए होते या पकड़ लाए गए होते l जैसे अमरीका ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने पाकिस्तान के उस के घर में घुस कर मारा और लाश, समुद्र में डुबो दी l

जनता की मंशा थी , पी ओ के को आज़ाद करवा कर भारत में मिला लेना l जनता का लक्ष्य था , पाकिस्तान के दो और टुकड़े करना l बलूचिस्तान भी लेकिन नहीं तोड़ पाए l जनता का लक्ष्य यह भी था कि प्रधानमंत्री का वह कहा कि कल्पना से बड़ी सजा , पाकिस्तान को मिलेगी l

यह लक्ष्य भी नहीं पूरा हुआ l

बाक़ी लक्ष्य यह भी था कि आतंकी पाकिस्तान मिट्टी में मिल गया होता तो आतंक से सर्वदा के लिए छुट्टी मिल जाती l जनता को उम्मीद थी , बहुत थी कि पाकिस्तान बाप-बाप करते हुए त्राहिमाम करता l पर जनता देख रही है कि पाकिस्तानी जनता , विजय जुलूस निकाल रही है l पाकिस्तानी प्रधान मंत्री शहबाज़ शरीफ़ का भाषण भी विजय गाथा के गुरूर में गब्बर बना इतरा रहा है l जब कि बहुत बोलने वाला हमारा प्रधान मंत्री , नरेंद्र मोदी , लंबी है ख़ामोशी, मीलों है तनहाई के गाने सुन रहा है l देशवासियों को दिलासा देने के लिए एक ट्वीट भी नहीं है l तिस पर कोढ़ में खाज यह कि सीज फायर का ऐलान ट्रंप कर देता है l भारत मान जाता है l पर पाकिस्तान सीज फायर की माँ-बहन करते हुए ड्रोन पर ड्रोन की अंत्याक्षरी खेलने लगा l बदले में इधर से बयान बहादुरी जारी रही l

सेना पर टिप्पणी करने की कोई मंशा नहीं है l सैल्यूट है सेना को l सेना के पराक्रम को l पर देश नहीं झुकने दूंगा ! की गगन भेरी आपरेशन सिंदूर में अनुपस्थित क्यों है ? सिंदूर की शान और सौगंध की सुगंध कहीं नील गगन में गुम हो गई लगती है l धरती पर नहीं उतरी l आ
आई एम द्वारा करोड़ों का लोन ज़रूर पाकिस्तान की धरती पर उतर आया l भारत की सारी डिप्लोमेसी का टायर फट गया l

और हाँ , प्रिंट और सोशल मीडिया में राफेल की उड़ान को चीन द्वारा किस तरह जकड़ कर उस की शान को चकनाचूर कर दिया , की चल रही कहानियां सच हैं कि झूठ ? इस पर कौन बोलेगा ? सेना , रक्षा मंत्री कि प्रधानमंत्री ? या यह कहानियां ऐसे ही उड़ती रहेंगी ? राफेल की विफलता ही तो नहीं है , अचानक सीज फायर के फ़ैसले में ? ख़बरों में कहा गया था कि सेना के निशाने पर कुल 21 आतंकी ठिकाने थे पर ध्वस्त 9 ही किए गए l शेष 12 आतंकी ठिकाने कब और कौन ध्वस्त करेगा ? कब तक मुंहतोड़ जवाब देते रहेंगे ? सेमीफ़ाइनल खेलते रहेंगे ?

फ़ाइनल कब खेलेंगे ?

सीज फायर के काली दाल की कैफ़ियत में सुलगते सवालों के अनगिन सागर लहरा रहे हैं l सागर किनारे , दिल ये पुकारे , तू जो नहीं है मेरा कोई नहीं है ! गाना गाने के लिए नहीं l जवाब पाने के लिए l

पर यह जवाब कौन देगा ?

जवाब मिलने तक न्यूज चैनलों पर रिटायर्ड सैनिकों और साक्षर एंकरों द्वारा मुर्गे , कबूतर लड़ाते हुए वीर रस के आख्यान सुनिए और देखिए l सिंदूर जैसे किसी और आपरेशन की प्रतीक्षा कीजिए!

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