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आज के अखबार : भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता का ‘संदेश’, अमर उजाला का प्रचार, तथ्यों की अनदेखी

संजय कुमार सिंह

न्यायमू्र्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होने और तीन सदस्यीय समिति बनाये जाने की खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम से लेकर द हिन्दू और दि एशियन एज में तीन कॉलम की लीड तक छपी है। इंडियन एक्सप्रेस में यह पहले पन्ने पर चार कॉलम की खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है। कोलकाता के अखबार, द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि हिन्दी के अखबारों, अमर उजला में यह सेकेंड लीड, देशबन्धु में तीन कॉलम और नवोदय टाइम्स में दो कॉलम की खबर है। कुल मिलाकर अभी आरोपों की जांच ही होनी है और इसके लिए तीन सदस्यों की समिति की घोषणा भर की गई है। द हिन्दू का शीर्षक है, लोकसभा अध्यक्ष ने हाईकोर्ट जज को हटाने की प्रक्रिया शुरू की। आरोपों की जांच के लिये तीन सदस्यों का पैनल बनाना इसका भाग है। दि एशियन एज का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट के जज होंगे वर्मा (मामले की) जांच के लिए बने तीन लोगों के पैनल के प्रमुख। आज जब एक जज के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई शुरू होने की खबर है तो यह तथ्य है कि देश और व्यवस्था ने सीबीआई के स्पेशल जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत और संबंधित शिकायतों की स्वतंत्र जांच कराने की अपील नहीं मानी थी। फिर भी, एक अन्य जज के घर में उनकी अनुपस्थिति में आउट हाउस में नकदी देखे जाने की चर्चा और वीडियो के आधार पर महाभियोग जैसी कार्रवाई शुरू हो गई है।

अमर उजाला की खबर के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता का संदेश जरूरी है। वैसे तो इसमें कोई शक नहीं है पर जो स्थितियां हैं उनसे लगता है कि न्यायमूर्ति को फंसाया गया है और संदेश शून्य सहिष्णुता का नहीं, जजों के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ता का है। पैसे न लो तो लोया और ले लो तो वर्मा। अभी तक जनता को यह आश्वस्त करने की कोशिश नहीं की गई है कि पैसे उनके ही थे या उन्होंने किन मामलों में कमाये होंगे। भ्रष्टाचार की परिभाषा के तहत रिश्वत लेने के साथ देने की कोशिश करना भी अपराध है। अगर अपराध की शिकायत रिश्वत देने वाले ने नहीं की है और सरकारी गवाह नहीं बना है तो उसका भी पता लगाया जाना चाहिये और उन मामलों पर फिर से विचार होना चाहिये जो रिश्वत ले-देकर सुने गये हैं। ऐसा किये जाने की कोई खबर नहीं है और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की इस दलील पर ध्यान नहीं दिया गया कि पैसे उनके नहीं हैं और आउट हाउस में किसने रखे, उन्हें पता नहीं है और चूंकि वे उस दिन वहां नहीं थे इसलिये यह पता किया जाना चाहिये था कि पैसे वहां कब से रखे हो सकते हैं या उसी दिन रखे गये थे जिस दिन आग लगी। यह सब रिश्वत देकर अपना काम कराने के अपराध की जांच के तहत आता और जरूरी था। जिस तरह सरकारी विभाग बड़े कॉरपोरेट पर कई साल पहले के सैकड़ों करोड़ के बकाया बता रहे हैं और मामले अदालत में पहुंच रहे हैं उसमें पैसे देकर अनुकूल फैसले की कोशिश कोई बहुतों के लिए मजबूरी होगी तो जजों में लोया या वर्मा होने का डर फैलायेगी। शून्य सहिष्णुता का संदेश जितना सफल होगा, डर उतना ज्यादा होगा।

ऐसे में कार्रवाई उस व्यवस्था के खिलाफ भी होनी चाहिये जो जजों को भारी राशि बतौर रिश्वत देती है या देने की स्थिति बनाती है। संभव है यह अभियुक्तों में एक, अमित शाह के होने से हो और अगर ऐसा है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि इससे देश की राजनीति बदल गई है। देश की जनता को यह सब समझने की जरूरत है और इसके साथ यह गौर करने वाली बात है कि मंदिर बनाने वाली सरकार में कैसे लोग हैं या किन्हें महत्व मिला। और बात सिर्फ महत्व की नहीं है। हम देख रहे हैं कि यह सरकार आम लोगों को रोजगार व्यवसाय तो नहीं ही दे सकती है गरीबों के बच्चों की शिक्षा की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था करने वाले जनप्रतिनिधि को जेल में रखती है। उनकी पार्टी की पूरी सरकार पर भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाकर और दूसरे असंवैधानिक तरीकों से उसे चुनाव हराने में भी कामयाब हो जाती है। शक है कि महाराष्ट्र और हरियाणा ऐसे ही तरीकों से जीता गया है तथा बिहार जीतने की कोशिश है। इसके लिए चुनाव आयोग (और नये घोषित अधिकार) ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी सरकार के समर्थन वाले दिखाई देते हैं। ऐसे में देश की स्वतंत्र समझी जाने वाली न्यायपालिका पर सरकार का दबाव चर्चा औऱ चिन्ता का विषय है। खासकर तब जब उपराष्ट्रपति के इस्तीफे का कारण न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकता है। और बात सिर्फ इस्तीफे की नहीं उनके लापता हो जाने की भी है जो जीते जी लोया होने के बराबर है।  

दूसरी ओर, इस व्यवस्था में रिश्वत से कमाने वाले जज के खिलाफ कार्रवाई (जो अभी शुरू ही हुई है) से जजों के लिए यह समझना और तय करना मुश्किल हो जायेगा कि पैसे न लेकर ईमानदारी से काम करना ठीक है या पैसे लेकर जो कहा जाये वही करना। हालांकि, ईमानदारी से काम करके संदिग्ध मौत को चुनना भी आसान नहीं होगा। जैसा मैं पहले कह चुका हूं, मुझे पता नहीं है और खबरों से नहीं लगता है कि जज वर्मा के भ्रष्टाचार और उसकी जांच का कोई मामला है। ऐसे में संसद की बनाई समित की जांच से पहले उनकी जो बदनामी हुई है (या कराई गई है) उससे तो यही लगेगा कि पैसे नहीं लेकर लोया होने से अच्छा है कि पैसे लेकर वर्मा हुआ जाये। लोकसभा अध्यक्ष की बनाई समिति का फैसला तो जब आयेगा तब आयेगा अभी तो मीडिया ट्रायल में जज वर्मा दोषी ठहराये जा चुके हैं। मुझे लगता है कि व्यवस्था की इस गड़बड़ी को ठीक करना जरूरी है जहां कोई पूर्व तड़ी पार गृहमंत्री बन जाये और सरकार गिरोह की तरह काम करे। इससे व्यवस्था कहां और कैसे सुधरने वाली है। भले सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की बात करे। वैसे तो पांच सात साल बाद सरकारी बकाया निकालना भी भ्रष्टाचार का मामला हो सकता है और बहुत संभावना है कि तब पैसे लेकर मामला दबा दिया गया हो। बाद वाले ने इसके लिए फिर पैसे मांगे हों, सौदा नहीं पटा हो तो नोटिस जारी हुआ हो और उसे अदालत से रुकवाने की कोशिश में भ्रष्टाचार की बीमारी न्याय व्यवस्था को भी जकड़ ले या ली हो। जज वर्मा के मामले में जांच करके इस बात की पुष्टि की जानी चाहिये थी कि उन्होंने किन मामलों की सुनवाई की जिनमे पैसे मिल सकते थे और उस मामले में किन लोगों ने पैसे दिये होंगे और क्या फैसला सही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता तो तभी होगी जब रिश्वत देने वाले के खिलाफ भी कार्रवाई हो।

आजतक डॉट इन की 19 अप्रैल 2018 की खबर के अनुसार, जस्टिस लोया बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख मामले की सुनवाई कर रहे थे। 2005 में सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर को गुजरात पुलिस ने अगवा किया और हैदराबाद में हुई कथित मुठभेड़ में मार दिया था। सोहराबुद्दीन मुठभेड़ के गवाह तुलसीराम की भी मौत हो गई थी। मामले से जुड़े ट्रायल को सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र ट्रांसफर कर दिया था। इस मामले की सुनवाई कर रहे जज का तबादला हो गया तो यह मामला जज लोया के पास आया। एक दिसंबर, 2014 में जस्टिस लोया की नागपुर में मौत हो गई थी। जिसे संदिग्ध माना गया था। इसका कारण यह था कि उनपर अमित शाह (मौजूदा गृहमंत्री) के पक्ष में फैसला करने के लिए दबाव था और रिश्वत की भी पेशकश की गई थी। जस्टिस लोया की मौत के बाद जिस जज ने इस मामले की सुनवाई की, उन्होंने अमित शाह को बरी कर दिया था। बीबीसी की एक खबर के अनुसार, 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और इस केस में नाटकीय बदलाव हुए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इस केस को सुन रही मुंबई सीबीआई कोर्ट ने अमित शाह सहित इस केस से जुड़े सीनियर पुलिस ऑफिसर और राजनेताओं को ट्रायल से पहले ही बरी कर दिया। 2019 में अमित शाह केंद्रीय गृहमंत्री बनाये गये।

15 जनवरी 2020 की द प्रिंट की एक खबर के अनुसार, महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने जज लोया मामले को फिर से खोलने का संकेत दिया था। तब राज्य में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की सरकार थी। बाद में यह सरकार कैसे गिराई गई और भाजपा की सरकार कैसे बनी रही तथा बाद में महाराष्ट्र का चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने क्या सब किया वह अलग कहानी है। जज लोया की मौत पर पत्रकार निरंजन टाकले की एक किताब भी है, हू किल्ड जज लोया। इस पृष्ठभूमि में अदाणी के खिलाफ हिन्डनबर्ग की रिपोर्ट की जांच नहीं कराने, सेबी प्रमुख के खिलाफ कोई मामला नहीं बनने जैसे मामलों के बाद न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की दलील नहीं सुनना और उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई जल्दबाजी में की जा रही लगती है। जो भी हो, आज की इस खबर के बाद दूसरी खबरों की चर्चा बेमतलब है क्योंकि हम देख रहे हैं और जानते हैं पैसे वालों के पीछे ईडी को कैसे लगाया और परेशान किया गया है। अदाणी मामले में सवाल करने वालों का क्या हुआ था। गैर कानूनी इलेक्टोरल बांड से वसूली से संदिग्ध मामलों की जांच नहीं हुई। हाल की एक खबर के अनुसार, केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा को बताया था कि, “जनवरी 2015 से जून 2025 के बीच प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग प्रिवेंशन एक्ट 2002 (पीएमएलए) के प्रावधानों के तहत 5,892 मामलों की जांच की है।” चौधरी ने कहा कि जून 2025 तक विशेष अदालतों ने इन मामलों में (सिर्फ) आठ सजा आदेशों में 15 व्यक्तियों को दोषी ठहराया है। यही नहीं, पिछले साढ़े दस सालों में मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े अपराधों के लिए विशेष अदालतों के समक्ष 49 मामले बंद करने के लिए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है।

इसके अलावा, तथ्य यह भी है कि विपक्षी दलों के जनप्रतिनिधियों ही नहीं मुख्यमंत्रियों के खिलाफ भी मामले बने और जांच चली जो साबित नहीं हुए और कुछ लोग सत्तारूढ़ दल में शामिल हो गये हैं। उनके मामले या तो खत्म हो गये या ठंडे बस्ते में पड़े हैं। खबर यह भी है कि दो मुख्यमंत्रियों को गिरफ्तार करने वाले ईडी अधिकारी कपिल राज स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़ गये हैं। राज्यसभा में दिये गये सरकार के जवाब में ईडी की ओर से दाखिल क्लोजर रिपोर्टो के कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है। अदालतों ने यह माना है कि यदि प्राथमिक मामला किसी न्यायालय के समक्ष है, तो पीएमएलए मामला अपने आप समाप्त हो जाएगा। इसका मतलब यह भी है कि जबरन लोगों को जेल में रखने के लिए पीएमएलए मामले बनाये गये। जब तक साबित न हो या कोई आरोप न लगाये मानना पड़ेगा कि यह सब वसूली के लिए नहीं था और सामान्य कार्रवाई थी। इसके बावजूद सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता का संदेश देना चाहती है और मेरे नौ अखबारों में कम से कम एक, अमर उजाला ने उपशीर्षक के रूप में इसका प्रचार किया है। यह सब तब जब सुप्रीम कोर्ट पूछ चुका है कि ईडी का ‘इस्तेमाल’ क्यों किया जा रहा है? राजनीतिक लड़ाई मतदाताओं के सामने लड़ी जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने ईडी से यह सवाल तब किया था जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी के खिलाफ एमयूडीए मामले में अपील की गई थी। यह अपील हाईकोर्ट द्वारा आरोपों को खारिज किए जाने के बाद की गई थी। सुप्रीम कोर्ट पूछ चुका है कि ईडी का ‘इस्तेमाल’ क्यों किया जा रहा है? राजनीतिक लड़ाई मतदाताओं के सामने लड़ी जानी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने ईडी से यह सवाल तब किया था जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी के खिलाफ मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) मामले में अपील की गई थी। यह अपील हाईकोर्ट द्वारा आरोपों को खारिज किए जाने के बाद की गई थी। ईडी ने  (एमयूडीए) द्वारा साइटों के आवंटन के संबंध में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की पत्नी पार्वती और राज्य मंत्री बिरथी सुरेश के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों को खारिज करने के कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्रीय एजेंसी द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया। इससे पहले मई में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा तमिलनाडु स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन के खिलाफ जांच पर रोक लगाते हुए कहा था, ईडी सभी सीमाएं पार कर रहा है और आप देश की संघीय संरचना का पूरी तरह उल्लंघन कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि मीडिया में और सोशल मीडिया में भी इन मामलों की चर्चा उतनी नहीं हुई जितनी राहुल गांधी के सच्चे भारतीय होते वाले मामले की हुई थी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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