
डॉ ओम शंकर-
जनवरी 2017। वही समय जब देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान Indian Institute of Technology Roorkee को नया निदेशक मिला—प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी। यहीं से उस काली कहानी की शुरुआत होती है, जो तीन साल तक चुपचाप चलती रही, सिस्टम देखता रहा और अंत में एक क्लर्क की मौत पर आकर ठहर गई, जबकि जिम्मेदार कुर्सियों पर बैठे लोग आज भी बेदाग बने घूम रहे हैं।
मार्च 2017 से 2020 के बीच IIT-Roorkee के सरकारी खातों से पैसे निकलकर एक निजी सेविंग अकाउंट में जाने लगे। यह खाता था धीरज कुमार उपाध्याय नाम के एक वरिष्ठ सहायक लिपिक का, जो SRIC विभाग में तैनात था। यह कोई एक बार की गड़बड़ी नहीं थी। पूरे तीन वर्षों में तेरह बार ट्रांसफर हुए और कुल रकम पहुँच गई ₹1,05,35,753। ये पैसे छात्रवृत्ति, केंद्रीय अनुदान और निर्माण परियोजनाओं के नाम पर स्वीकृत सरकारी धन थे। सवाल सीधा था—सरकारी खाते से निजी खाते में पैसा कैसे गया? जवाब और भी सीधा है—बिना संस्थागत अनुमति, डिजिटल एक्सेस और उच्च अधिकारियों की चुप्पी या सहमति के यह संभव ही नहीं था।
इन तीन वर्षों में संस्थान के निदेशक थे प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी। अगर यह सब उनकी जानकारी और सहमति से हुआ, तो जिम्मेदारी सीधी बनती है। और अगर उनके हस्ताक्षर से चलने वाले सिस्टम में तीन साल तक एक क्लर्क के खाते में करोड़ से ऊपर का सरकारी पैसा जाता रहा और उन्हें भनक तक नहीं लगी, तो यह घोर अक्षमता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ऐसे व्यक्ति को आज Banaras Hindu University जैसे संस्थान का कुलपति बने रहने का नैतिक अधिकार है।
जून 2020 की शुरुआत में कहानी में मोड़ आया। एक बैंक मैनेजर को लेन-देन संदिग्ध लगे। उसने निदेशक चतुर्वेदी को जानकारी दी। इसके बावजूद कुछ दिनों तक खामोशी रही। इसी दौरान मनपाल शर्मा नाम के एक व्यक्ति को इस घोटाले की भनक लग गई। जब उन्होंने सवाल उठाया, तब जाकर मजबूरी में प्रशासन ने अपने बचाव के लिए धीरज उपाध्याय को बलि का बकरा बनाने की तैयारी शुरू की। आंतरिक जांच हुई और माना गया कि सरकारी पैसा वर्षों से एक निजी खाते में जा रहा था, लेकिन हैरानी यह कि किसी भी सक्षम अधिकारी ने समय रहते इसे रोका ही नहीं।
18 जून 2020 को संस्थान ने पुलिस को तहरीर दी, लेकिन FIR नहीं हुई। FIR दर्ज हुई पाँच महीने बाद, 11 दिसंबर 2020 को, और वह भी तब जब मनपाल शर्मा ने चार दिन पहले जिला अदालत में याचिका देकर निदेशक सहित अन्य अधिकारियों के खिलाफ FIR की मांग कर दी थी। संस्थान की FIR में भी केवल एक नाम था—धीरज कुमार उपाध्याय। निदेशक और अन्य वरिष्ठ अधिकारी पूरी तरह गायब थे।
मनपाल शर्मा ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और साफ कहा कि ₹1.05 करोड़ का घोटाला कोई क्लर्क अकेले नहीं कर सकता। सरकारी धन को निजी खाते में ट्रांसफर करने के लिए निदेशक, डीन, रजिस्ट्रार और अकाउंट्स सेक्शन की भूमिका जरूरी होती है। उन्होंने प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी समेत अन्य अधिकारियों के नाम अदालत को बताए और कहा कि उपाध्याय को जानबूझकर बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
23 दिसंबर 2020 को अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच जरूरी है और उनके खिलाफ FIR दर्ज होनी चाहिए। इसके बाद प्रो. चतुर्वेदी और अन्य अधिकारी बचाव में उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुँच गए। मामला बना Ajit Kumar Chaturvedi & Ors. बनाम State of Uttarakhand। 29 सितंबर 2021 को Uttarakhand High Court ने तकनीकी आधार पर नई FIR को रोका, यह कहते हुए कि एक ही घटना पर दूसरी FIR नहीं हो सकती। लेकिन अदालत ने कहीं भी प्रो. चतुर्वेदी को निर्दोष नहीं कहा। उलटे यह साफ छोड़ा कि यदि जांच में सबूत मिलें, तो मौजूदा FIR में उनके नाम जोड़े जा सकते हैं और पूरक चार्जशीट दाखिल हो सकती है। यह कभी हुआ नहीं।
26 अक्टूबर 2021 को धीरज कुमार उपाध्याय की गिरफ्तारी हुई और एक महीने बाद, 27 नवंबर 2021 को जेल में उनकी संदिग्ध हालात में मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट लटकी रही, CBI जांच नहीं हुई। इस मौत ने उस एकमात्र व्यक्ति को खामोश कर दिया, जो इस पूरे खेल का प्रत्यक्ष गवाह था। फायदा किसे हुआ, यह समझने के लिए ज्यादा दिमाग नहीं लगाना पड़ता।
2023 में दूसरे आरोपी राजेश कुमार को जमानत मिल गई। उपाध्याय के खाते से उसके खाते में गए 15 लाख रुपये को उसने बेटी की शादी का कर्ज बता दिया और मामला हल्का हो गया। इधर प्रो. चतुर्वेदी BHU के कुलपति बन चुके थे।
तथ्य यही हैं कि 2017 से 2020 तक प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी IIT-Roorkee के निदेशक थे। उनके कार्यकाल में ₹1.05 करोड़ का सरकारी धन एक निजी खाते में गया। किसी वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ न FIR हुई, न विभागीय कार्रवाई। न किसी को क्लीन चिट मिली, न जिम्मेदारी तय हुई। व्हिसलब्लोअर का आरोप आज भी कायम है कि बिना संस्थागत मंजूरी यह घोटाला असंभव था।
यह मामला केवल एक क्लर्क की चोरी का नहीं था। यह तीन साल तक चला एक संस्थागत अपराध था। प्रो. चतुर्वेदी कानूनी तकनीकी आधार पर अभियोजन से बच गए, लेकिन उन्हें कभी भी निर्दोष घोषित नहीं किया गया। अदालत ने दरवाज़ा खुला छोड़ा है। सवाल यह है कि सिस्टम कब हिम्मत करेगा उस दरवाज़े से अंदर जाने की।


