बद्री प्रसाद सिंह-
वर्दी का सफर – एक समीक्षा : मैं दि. ६ जुलाई को भाई आर पी सिंह (से.नि. आईजी पुलिस) के ७५ वें जन्मदिन पर उन्हें बधाई देने लखनऊ गया था। मैंने भाई को अपनी लिखी ३ पुस्तकें उपहार स्वरूप भेंट की जिस पर वहां उपस्थित पूर्व डीजीपी श्री यशपाल सिंह जी ने मुझसे पूछा कि मैं कब से लेखक हो गया हूं? मैंने कल उनके घर आकर बताने की अनुमति मांगी।अगले दिन मैं उनके घर जाकर अपनी पुस्तकें उन्हें सादर प्रदान की व उनसे देर तक वार्ता भी की। चलते समय उन्होंने मुझे अपनी पुस्तक “वर्दी का सफर” सस्नेह प्रदान किया ।
श्री यशपाल सिंह जी आईपीएस अधिकारी होने के साथ मृदुभाषी, विनम्र, सज्जन, व्यवहारकुशल एवं दक्ष अधिकारी रहे हैं जिनके अधीन मुझे ३ बार पुलिस सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ था। लखनऊ से लौट कर मैं अन्य कार्यों में व्यस्त होने के कारण तत्काल पुस्तक न पढ़ सका, समय मिलने पर कुछ दिनों से पुस्तक पढ़ रहा था जो आज समाप्त हुई।

इस पुस्तक में यशपाल सिंह सर ने अपनी पुलिस सेवा के खट्टे-मीठे अनुभवों को तो निःसंकोच साझा किया ही है उसके अतिरिक्त पुलिस सेवा की विसंगतियों पर भी करारा प्रहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने अपनी कमियों को छिपाने का रंचमात्र भी प्रयास न करते हुए नये अधिकारियों को उनसे बचने की सलाह भी दी है।
पुस्तक के प्रथम खंड में विस्तृत प्रस्तावना के अतिरिक्त भारत की ब्रिटिश पुलिस का सुंदर खाका प्रस्तुत करते हुए स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात की भारतीय पुलिस की कार्यपद्धति की विशद विवेचना करने का सार्थक प्रयास किया है, साथ ही पुलिस की विश्वसनीयता के संकट का भी तर्कपूर्ण विवेचन करते हुए गवाह एवं गवाही सिस्टम तथा वर्तमान न्याय व्यवस्था एवं संबंधित कानूनों पर भी टिप्पणी करते हुए उसमें व्यापक सुधार की भी आवश्यकता का रेखांकन किया है।
पुस्तक के द्वितीय खंड में अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए पुलिस विभाग में अपनी नियुक्तियों तथा उस काल में उनके द्वारा किए गए अच्छे कार्यों,आने वाली कठिनाईयों का वर्णन करते हुए साथी एवं वरिष्ठ अधिकारियों के व्यवहार पर भी अपनी बेबाक राय रखी है।साथ ही अपने ऊपर लगे आरोपों के मकड़जाल को तोड़कर बाहर आने का करिश्मा भी बगैर लाग-लपेट के बताया है।
श्री सिंह ने पुलिस अधीक्षक गोंडा की पुलिस सेवा में अपने प्रिय सीओ केपी सिंह की मुठभेड़ में हुई मृत्यु पर उठे बवंडर की बेझिझक चर्चा करते हुए उसके सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए सीबीआई की त्रुटि पूर्ण जांच प्रणाली की भी बात की है।इस घटना में उन पर लगे आरोपों ने उनके प्रोफ़ेशनल जीवन को अपूरणीय क्षति पहुंचाई थी जिससे उबरने में उन्हें वर्षों लग गये।
अंत में अपने सेवानिवृत्त जीवन की चर्चा करते हुए राजनीति में प्रवेश के आकांक्षी वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारियों को भी व्यवहारिक सीख दी है।यदि यह सीख मुझे समय से मिल गई होती तो मैं राजनीति के मकड़जाल में फंसने से बच जाता।
श्री सिंह की पुलिस पर लिखी उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “अपराधिक विवेचना” मैंने पढ़ रखी थी, आज यह पुस्तक पढ़ कर अधिक ज्ञान एवं आनंद प्राप्त हुआ।यह पुस्तक आम जन के लिए तो पठनीय है ही, पुलिस अधिकारियों के लिए अधिक लाभप्रद है। पुस्तक गुटेनबर्ग प्रकाशन से प्रकाशित है तथा मूल्य २५० रू. मात्र है।
लेखक को ऐसी पुस्तक लिखने की बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं।
लेखक रिटायर आईपीएस अधिकारी हैं।


