उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में बिजली विभाग की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विभाग पर एक उपभोक्ता के खिलाफ फर्जी बिजली चोरी का मुकदमा दर्ज कराने, महीनों तक मीटर न लगाने और बाद में लाखों रुपये का जुर्माना थोपने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। मामले में पीड़ित परिवार ने विस्तृत जवाब दाखिल कर विभागीय कार्रवाई को पूरी तरह गलत और उत्पीड़नपूर्ण बताया है। आरोप है कि रिश्वत के पैसे न मिलने पर बिजली विभाग प्रतिशोध में गलत और फर्जी मुकदमा लिखाने, लाखों का नोटिस भेजने जैसा नीच कृत्य कर रहा है।

मामला बीबीनगर थाना क्षेत्र के गांव बाहपुर का है, जहां प्रवर्तन दल ने दिसंबर 2025 में छापेमारी कर आरोप लगाया कि परिसर में बिना मीटर के अवैध केबल जोड़कर बिजली चोरी की जा रही थी। एफआईआर में दावा किया गया कि मौके पर 5579 वाट का लोड पाया गया और बिजली अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज कराया गया।
लेकिन अब सामने आए जवाबी दस्तावेजों में उपभोक्ता पक्ष ने बिजली विभाग की पूरी कहानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जवाब में कहा गया है कि जिस व्यक्ति पर बिजली चोरी का आरोप लगाया गया, उसके नाम कोई बिजली कनेक्शन ही नहीं है। घर में पहले से परिवार के सदस्य के नाम वैध कनेक्शन मौजूद है, जिसका बिल नियमित रूप से जमा किया जा रहा है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि विभाग ने खुद उपभोक्ता के आवास पर बिजली मीटर लगाने के लिए सर्वे और सत्यापन किया था, लेकिन मीटर उपलब्ध न होने का बहाना बनाकर महीनों तक मीटर नहीं लगाया गया। आरोप है कि विभागीय अधिकारियों को कई बार प्रार्थना पत्र दिए गए, यहां तक कि अधिशासी अभियंता और पीवीवीएनएल चेयरमैन तक शिकायत भेजी गई, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई।
पीड़ित परिवार का कहना है कि विभाग की लापरवाही और जानबूझकर देरी के कारण उन्हें बिना मीटर बिजली उपयोग करने की स्थिति में रखा गया और बाद में उसी आधार पर बिजली चोरी का मुकदमा दर्ज कर दिया गया। जवाब में यह भी कहा गया है कि विभाग लगातार 3 किलोवाट कनेक्शन के आधार पर हर महीने बिल भेजता रहा और उपभोक्ता उसका भुगतान भी करता रहा। ऐसे में अचानक चोरी का आरोप और तीन लाख आठ हजार 942 रुपये की भारी भरकम वसूली नोटिस जारी करना पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होता है।
दस्तावेजों में यह भी आरोप लगाया गया है कि विभागीय कर्मचारी उपभोक्ता को लगातार दबाव में लेते रहे और मीटर लगाने की मांग करने पर टालमटोल करते रहे। परिवार का दावा है कि यदि विभाग समय पर मीटर लगा देता तो यह पूरा विवाद ही पैदा नहीं होता।
अब इस मामले ने बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब विभाग खुद महीनों तक मीटर उपलब्ध नहीं करा पाया, तब उसी उपभोक्ता पर बिजली चोरी का आरोप कैसे लगाया जा सकता है। यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि नियमित बिल भुगतान के बावजूद उपभोक्ता को “बिजली चोर” घोषित करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो यह केवल एक उपभोक्ता का मामला नहीं बल्कि विभागीय मनमानी और उत्पीड़न का बड़ा उदाहरण है, जिसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
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