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आज के अखबार : चीन के पसीजने, पैट्रोल शुरू होगा की ‘खबर’ के साथ ‘परम सावधानी’ की जरूरत भी है!

संजय कुमार सिंह

आज मेरे ज्यादातर अखबारों में चीन के पसीजने, एलएसी पर पैट्रोलिंग की स्थितियां बनने और चार साल बाद सहमति से इसी महीने इसकी शुरुआत होने की खबर प्रमुखता से है। अकेले, द टेलीग्राफ में लीड का शीर्षक है, चीन के पसीजने पर परम सावधानी। खबर में कहा गया है, सीमा पर डिसएंगेजमेंट और खाली करने की जो प्रक्रिया चल रही है उसमें भरोसा नहीं है। मुख्य खबर के साथ द हिन्दू में भी एक छोटी सी खबर है। इसके अनुसार, यह स्पष्ट नहीं है कि ‘बफ़र ज़ोन’ जारी रहेगा या नहीं। खबर के अनुसार, भारत चीन सीमा वार्ता में साउथ ब्लॉक द्वारा नई शुरुआत की घोषणा के कई दिनों बाद अब जब एलएसी पर अलग होने (डिसएंगेजमेंट) की प्रक्रिया शुरू हो रही है तो विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों ने प्रस्ताव की बारीकियों के संबंध में पूर्ण पारदर्शिता की मांग की है खासतौर से सवाल पूछे जा रहे हैं कि 2020 में पूर्वी लद्दाख में बनाये गये बफ्फर जोन रहेंगे या उन्हें खत्म कर दिया जायेगा। अमर उजाला में यह अलग से एक छोटी खबर है, आर्थिक संबंधों में भारत अभी बरतेगा एहतियात। इसमें सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि नये समझौते पर अमल शुरू होने के बावजूद भारत अभी सतर्कता बरतना जारी रखेगा। पिछले चार वर्षों से जारी तनाव और दोनों पक्षों में विश्वास की कमी को देखते हुए वह बीजिंग के साथ आर्थिक संबंध की दिशा में जल्दबाजी नहीं करेगा।

द टेलीग्राफ की लीड का फ्लैग शीर्षक है, एलएसी से पीछे हटने और अलग होने की प्रक्रिया में भरोसे की कमी है। इमरान अहमद सिद्दीकी की बाईलाइन वाली नई दिल्ली डेटलाइन की खबर के अनुसार, भारतीय सेना लद्दाख में दोनों देशों की सेना के अलग होने की प्रक्रिया को अंजाम देते समय “अत्यधिक सावधानी” बरत रही है। इस बात पर नजर रखी जा रही है कि चीन कितनी गंभीरता से प्रतिक्रिया दे रहा है। रक्षा सूत्रों ने पड़ोसी के साथ “विश्वास की कमी” को रेखांकित करते हुए कहा। ज्यादातर अखबारों में, ‘विश्वास की कमी’ और ‘अत्यधिक सावधानी’ जैसी बातों को प्रमुखता से नहीं बताया गया है। इसीलिए मुख्य खबर इतनी प्रमुखता से छपी है और सभी अखबारों में खबर नई दिल्ली डेटलाइन से बाईलाइन के साथ है। इससे लगता है कि खबर है नहीं, छपवाई गई है। इसे आप प्लांटेड या जान बूझ कर की गई ‘लीक’ कह सकते हैं। इसका मतलब, खबर अधिकृत तौर पर जारी नहीं की गई है और इसीलिए खबर देने वाले अधिकारी का नाम नहीं है। अगर चार साल बाद सहमति हुई है और पैट्रोलिंग फिर से शुरू होने वाली है तो रक्षा मंत्री देश को यह सूचना दे सकते थे। नहीं देने के अपने मतलब हैं। मैं चाहता हूं कि आप उन्हें समझें। सूत्रों के हवाले से छपी आज की खबर में  भविष्य की जरूरत के लिए ‘विश्वास की कमी’ और ‘अत्यधिक सावधानी’जैसी जानकारी भी दी गई है पर उसे किसी ने महत्व दिया और किसी ने नहीं दिया क्योंकि मौके पर गये बगैर इसकी गंभीरता समझना मुश्किल है।

यहां दो बातें महत्वपूर्ण हैं – चार साल पैट्रोलिंग नहीं हुई तो खबर ऐसे नहीं छपी। अब शुरू होने वाली है तो इतनी बड़ी छप रही है जबकि शुरू हो जाती तब छपती और पत्रकारों को ले जाकर दिखाया जाता तो जो लिखा जाता वह भी भरोसेमंद होता। यह अलग बात है कि 10 साल में आम पाठकों को ऐसी ही खबरों की आदत पड़ गई है। हेडलाइन मैनेजमेंट के इस खेल को ज्यादातर लोग नहीं समझेंगे औऱ जो समझेंगे वो इसे बहुत महत्व नहीं देते हैं। कुल मिलाकर यह खबर कम और हेडलाइन मैनेजमेंट ज्यादा है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस खबर की गंभीरता के मद्देनजर दूसरी खबरें पहले पन्ने पर नहीं छप पाई हैं। उनपर आने से पहले इस खबर को पूरी तरह देख लें। द टेलीग्राफ की खबर में आगे कहा गया है, दोनों पक्षों ने डेपसांग मैदानों और डोमचोक पर सहमति के अनुसार तंबू और वॉचटावर जैसी अस्थायी संरचनाओं को हटाना शुरू कर दिया था और वहां “सतर्क आशावाद था कि यह गति भविष्य की वार्ता के लिए विश्वास बनाने में मदद करेगी।” रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने शुक्रवार को कहा, “दोनों देशों के सैन्य कमांडरों ने अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।” उन्होंने आगे कहा, “हम अत्यधिक सावधानी के साथ आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि हमें इंतजार करना होगा और देखना होगा कि चीन इस नीति को कितनी गंभीरता से लागू करता है। हम चीन पर भरोसा नहीं कर सकते हैं और इस बार हम सतर्क हैं… विश्वास की कमी को खत्म  करना चीन पर है।”

इसकी शुरुआत आंशिक तौर पर जून 2020 की गलवान घाटी झड़प से हुई थी जिसमें 20 भारतीय सैनिक और कई चीनी सैनिक मारे गए थे। लड़ाई तब शुरू हुई जब भारतीय सेना की टीम यह जांचने पहुंची कि क्या चीनी “अलग होने और डी-एस्केलेशन प्रक्रिया” के भाग के रूप में तम्बू हटाने के वादे का सम्मान कर रहे थे। भारतीय अधिकारियों ने संकेत दिया है कि ताजा समझौता, जो केवल देपसांग मैदानों और डेमचोक पर लागू होता है, के परिणामस्वरूप चीन कब्जे वाले क्षेत्रों से पीछे हट जाएगा, मई 2020 की घुसपैठ से पहले की स्थिति में वापस आ जाएगा। हालाँकि, चीनी बयान कम स्पष्ट रहे हैं। कहना मुश्किल है कि आज की खबर से भारत सरकार चीन पर दबाव बनाने की कोशिश में है या दो राज्यों में चुनाव के आलोक में अपने लोगों को भ्रमित करना चाहती है। मकसद जो हो, मैं आज की दो खबरों की चर्चा करूंगा जो आज मेरे दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। पहली खबर द हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। यह एक बड़ी और महत्वपूर्ण खबर है। इस खबर के अनुसार, व्यवसायी को जमानत मिलने के बाद दिल्ली के आबकारी मामले के सभी आरोपी अब रिहा हो गये हैं। अखबार ने इसके साथ 19 नामों की सूची छापी है और बताया है कि कौन किस तारीख को गिरफ्तार हुआ और कब जमानत मिली। आप जानते हैं कि वाशिंग मशीन पार्टी के नेता और प्रचारक इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की कार्रवाई बताते रहे हैं और आम आदमी पार्टी के नेताओं को भ्रष्टाचारी कहते रहे हैं। 

खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली आबकारी नीति मामले में व्यवसायी अमनदीप सिंह ढल्ल को जमानत दे दी। इससे इस हाई-प्रोफाइल मामले में जेल में बंद अंतिम व्यक्ति की रिहाई हो गई। इस मामले में  दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके डिप्टी मनीष सिदोदिया सहित आम आदमी पार्टी (आप) के लगभग पूरे शीर्ष नेतृत्व को महीनों तक सलाखों के पीछे रहने पर मजबूर किया। इनमें से सात से अधिक जमानत याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने, लगभग छह को दिल्ली उच्च न्यायालय ने और कुछ अन्य को स्थानीय अदालतों ने मंजूर किया। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जांच से संबंधित अपने जमानत आदेश में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मामले के सभी अन्य आरोपी पहले ही बाहर आ चुके हैं और 300 से अधिक गवाहों के साथ मुकदमा अभी शुरू होना बाकी है। सितंबर में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने आबकारी घोटाले से जुड़े प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जांचे गए मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ढल को जमानत दे दी थी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता की न्यायिक हिरासत जारी रखने से कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा। गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना, हम याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने का निर्देश देते हैं।” जब ढल तिहाड़ जेल से बाहर आएंगे, तो अब समाप्त हो चुकी दिल्ली आबकारी नीति में कथित अनियमितताओं के संबंध में कोई भी व्यक्ति जेल में नहीं होगा।

‘सरकार’ जी से पूछा जाना चाहिये कि इतने लोगों को परेशान करके, इन्हें जेल में रखकर, इनके पीछे सरकारी एजेंसियों को लगाकर और उसमें हुए भारी खर्चे से देश को क्या मिला, सरकार ने देश का कैसा भला किया? आज की दूसरी प्रमुख खबर इंडियन एक्सप्रेस की एक्सक्लूसिव है और दूसरे अखबारों में नहीं होगी। इस खबर से बताया गया है कि बालासोर रेल दुर्घटना के ज्यादातर पीड़ितों ने रेलवे से मिली राहत को चुनौती दी और ट्रिब्यूनल से ज्याद राशि पाई। पीड़ितों में से 76 प्रतिशत प्रभावित 40.6 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति के लिए रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल में गये। 200 से ज्यादा मामलों में रेलवे ने उपस्थित होने का सबूत मांगा जबकि 28 में से 22 अपील अभी भी पटना में  लंबित है। अव्वल तो रेल दुर्घटना होनी ही नहीं चाहिये थी, हो गई तो उसे साजिश नहीं कहा जाना चाहिये और साजिश थी भी तो मुआवजा कम क्यों? यह सब तो हुआ ही, बाद में हुई तमाम रेल दुर्घटनाओं को साजिश का नतीजा ही साबित करने की कोशिश हुई जबकि साजिश को रोकना भी सरकार और रेलवे का ही काम है। दूसरी ओर, मोदी सरकार ने रेल यात्रियों का बीमा शुरू किया है। इस बीमा के रहते यात्रियों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिलने का क्या मतलब लगाया जाये। यही नहीं, नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद जनधन खाते खुलवाये थे और इन खाताधारकों का बीमा भी करवाया था। दुर्घटना और महामारी में मौत के इन मामलों में मुआवजे की राशि खुद मिल जानी चाहिये पर आज तक मुझे ऐसे किसी भुगतान की सूचना नहीं मिली।

यहां मुझे, बंटेंगे तो कटेंगे नारा याद आता है। खबर है कि महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव में इसका उपयोग किया जा रहा है और खबरों की मानें तो इससे माहौल बदलने का प्रयास चल रहा है। समझना मुश्किल नहीं है कि यह हिन्दुओं को एकजुट रखने की कोशिश है जबकि रेल दुर्घटना में कम मुआवजा और उसे साजिश कहना भारतीय जनता पार्टी की सरकार का कारनामा है और सरकार इसीलिए सत्ता में है कि हिन्दुओं ने मुसलमानों से अलग होकर या हिन्दू मुसलमान में बंटकर भाजपा की सरकार चुनी जो रेल दुर्घटना के पीड़ितों को न्यूनतम मुआवजा देते हैं, बीमा तो करवाते हैं लेकिन जरूरत पर उसका लाभ मिला या नहीं उसकी चिन्ता नहीं करते हैं। जरूरत हिन्दू मुसलमान में बंटने की नहीं है। सबको मिलकर अपने लिए अच्छी सरकार चुनने की जरूरत है। कहने की जरूरत नहीं है कि हेडलाइन मैनेजमेंट से लेकर, बंटेंगे तो कटेंगे जैसे पोस्टर भाजपा की चुनावी तैयारियों का भाग है और इसी क्रम में आज इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जिसका शीर्षक है – शिवराज के बेटे कार्तिकेय ने चेतावनी दी, कांग्रेस जीत गई तो एक भी ईंट नहीं लगेगी। खबर के अनुसार वे बुधनी विधानसभा उपचुनाव में बोल रहे थे। यह सीट उनके पिता के सांसद और केंद्र में मंत्री बन जाने से खाली हुई है और विता की सीट पर चुनाव प्रचार का काम सुपुत्र संभाल रहे हैं। वैसे तो भाजपा वंशवाद का विरोध करती रही है पर बेटों को भूलती नहीं है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री भी अपना काम बताने की बजाय कांग्रेस की आलोचना करके ही चुनाव जीतते हैं। शिवराज सिंह के बेटे को चाहिये था कि वे बताते कि भाजपा ने कहां क्या बनवाया है, कितनी ईंट कहां लगवाई है। जनहित के कौन से काम किये हैं या करना चाहते हैं लेकिन वे बता रहे हैं कि कांग्रेस जीत गई तो एक भी ईंट नहीं लगेगी। दुर्घटना में घायल होने वालों के मुआवजे, बीमा की राशि की बात पहले कर चुका हूं और आप जानते हैं कि कोविड के दौरान कोई मुआवजा नहीं मिला। पीएम केयर्स में माल जमा हुआ सो अलग। ऐसे में भाजपा की सरकार रहने से ही क्या भला हो रहा है। हिन्दू खतरे में होगा पर उसे खतरे से निकाला कहां जा रहा है और कैसे कौन निकाले गये है? देश में चुनाव चल रहे हैं, दाना तूफान आया हुआ है जैसी खबरें हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण रह जाती हैं। वरना दि एशियन एज की खबर के अनुसार उड़ीशा में दाना से भारी नुकसान हुआ है जबकि पश्चिम बंगाल बच गया है। इसी तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस के उम्मीदवारों की अंतिम सूची आज जारी हो जायेगी, झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पांचवी सूची जारी की है। विमानों को बम से उड़ाने की धमकी आ ही रही है और आज खबर है कि 25 अन्य विमानों को बम से उड़ाने की धमकी (नवोदय टाइम्स)।

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